रविवार, 29 जनवरी 2012

मृत्युंजय की कविता

[मृत्युंजय की ये कविता इस दौर में सबसे अधिक गूंजने वाली कविताओं में से एक है. आसानी से व्याप्त हो रही धर्म आधारित राजनीति के नियमों को जितनी कठिनाई से नकारा जा सकता है, उनका ज़िक्र ये कविता करती है. इस कविता की ज़रुरत हमें महसूस होती है जैसे इस वक़्त इसे हमारे साथ होना चाहिए. ये विरोध के स्वरों से उपजी कविता है, और इसी प्रक्रिया में कविता उन स्वरों की अनुगूंज से भी आगे निकल जाती है. गोरख पाण्डेय के क़ाफ़ी समय बाद ऐसा एकाकी और जन-स्वर सुनने को मिल रहा है. मृत्युंजय गोरख पाण्डेय की प्रेम-सिक्त विरोध भाषा का कुछ हद तक सफ़ल निर्वहन करते हैं. बुद्धू-बक्सा मृत्युंजय का आभारी.]



रथ-यात्रा

नायक ने खसखसी दाढी में झुंझलाते,
ललचाते हुए कहा-
'जेहि जय होय सो स्यंदन आना'
एक बार फिर से प्रबलावश्यकता है
म्लेच्छ-वंश-नाश की
गो-द्विज-पूंजीपति हित
पूरे ही देश में फैलाओ वह प्रयोग
योग-योग तिर्यक त्रिशूल योग
मौक़ा है जनता के कंधे पर चढ जाओ

जनता की हत्या का स्वर्ण-जटित समय जान 
भागे अनुयायी, निज-निज सूबे से ले आये
नफरत और घृणा के गोल-गोल पहिये
काली टोपी आयी, ध्वज आया केसरिया

बजरंगी, श्रीराम-शिवसेना और विहिप
चार-चार घोड़े, जो पुतली के हिलते न हिलते
कुचल दिया करते हैं लाख-लाख मुंड
घोड़ों का चारा हैं गुरबा-गरीब
प्रेमीजन, मुसलमान और स्त्री
युक्त सैन्यभ्यास के पुण्यभाव की वल्गा

आया सारथि, जिसे अनुभव था
आग में जलाने और सीडी के बम का,
कैसे विधर्मी के पेट में मार सके बच्चा
बलत्कार औ हत्या
मिला-जुला पुण्य-फल कमाने का
सद्भाव-हत्या का

नायक के हाथों में ढाल थी विकास की
खड्ग उच्च-बोध का
जिबह हुई बाबरी मस्जिद की अस्थियां  
वज्र थीं.
मध्यवर्ग-तरकश में रक्षित थे जतन से
हत्या, बर्बरता और क्रूरता के शर.

हिटलर की प्रसंशा
गुरु गोलवरकर के दिव्य वचन
उत्प्रेरण मीन काम्फ
उर भीतर गहरे में छिपा हुआ

तैयारी पूरी है
रानी ने जय कहा...

जो भी कहीं मांग-जांच खाता है
दीन अति दरिद्र
सोता है जाकर मसीत में
आज, उसी के वध से, शुरू हो यात्रा
संतो ने नाद किया दिल्ली में.

3 टिप्पणियाँ:

मोहन श्रोत्रिय ने कहा…

"जो भी कहीं मांग-जांच खाता है
दीन अति दरिद्र
सोता है जाकर मसीत में
आज, उसी के वध से, शुरू हो यात्रा
संतो ने नाद किया दिल्ली में."
बहुत दिनों के बाद इतनी सधी हुई कविता देखने को मिली है, सांप्रदायिक उन्माद फैलाने के एजेंडे पर. मृत्युंजय को बधाई.

अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…

मृत्युंजय को पढ़ना हमेशा अच्छा लगता है. तेज तीखी और धारदार...

geetesh ने कहा…

मृत्युंजय की कविता गहरे राजनैतिक,सामाजिक बोध से जुडी हुई है जो वर्तमान समय के दायें खतरे को समझने में हमारी मदद करती है. बड़े बड़े भाषणों , गोष्ठियों,सेमिनारों और बहसों का विकल्प है यह कविता . इससे कविता की ज़रूरत और ताकत दोनों का ही पता चलता है. 'छपास' से दूर दूर रहने वाले कवि की कविता हम तक पहुँचाने के लिए शुक्रिया