रविवार, 25 दिसंबर 2011

महेश वर्मा की कविताएँ

[इस बार महेश वर्मा की कुछ कवितायेँ. महेश हमारे समय के उन कुछ ही कवियों में शुमार हैं जिनके पास बिम्ब-रचना की कोई बाध्यता नहीं है, जिनकी कवितायेँ एक तस्वीर को बनाये बिना ही जेहन में घर कर जाती हैं. उनके पास उनका अपना माध्यम ही इतना सधा हुआ है कि विषय को केंद्र में रखकर वे सारी बातें कर जाते हैं. एक तरह से महेश की कवितायेँ दुहरे अर्थ की धारक हैं, इस दुहरे अर्थ का शायद अकेला लाभ यह है कि आपको कविता से जूझना नहीं पड़ता और कविता ख़ुद-ब-ख़ुद ही फ़ैल जाती है. युवा कविता में महेश वर्मा एक ताज़ातरीन लहज़ा लेकर आये हैं, जो अपनी क्षेत्रीय यवनिकाओं से परिपूर्ण है और राजनीति में गहरी दख़ल रखता हैं. बुद्धू-बक्सा महेश वर्मा का आभारी.]


सदी के बीच में

चीख़ें अभी बुझी नहीं हैं और मांस जलने की चिरायंध
किसी डियोडरेंट से नहीं जाने वाली, 
पुराने जख़्मों की बात करना फैशन से बाहर की कोर्इ चीज़ है-
हम दरवाज़ा बंद करना चाहते हैं
उस ओर और इस ओर के लिये.

कोर्इ क्या करे लेकिन इन बूढ़ों का
जो मृत्यु के भीतर रहते थे और अब
उसे पहन लिया है त्वचा की जगह.

एक और बूढ़ा जो हमेशा पेट के बल सोता है धरती पर
वह अपने सीने के छेद में मिटटी भर लेना चाहता है-वहां अब बारूद है।
एक और बूढ़ा बचपन का गीत याद करना चाहता है और
उल्टी करने लगता है इतिहास.

हमारे पास पुराने घर हैं जहां
दीवारों से राख झर रही होती है और खाली कमरों में भी नही गूंजती आवाज-

हम क्या करें इसका जहां गुलाब रोपने की खुरपी 
निकाल लाती है एक कोमल हडडी.

हमारे पास मोमबत्तियाँ हैं और दवाइयाँ

हम दरवाज़ा बंद करना चाहते हैं
अपनी ओर और उस ओर के लिये.

राख़

ढेर सारा कुछ भी तो नहीं जला है इन दिनों
न देह न जंगल, फिर कैसी यह राख़ हर ओर ?

जागते में भर जाती बोलने के शब्दों में,
किताब खोलो तो भीतर पन्ने नहीं राख़!

एक फुसफुसाहट में गर्क हो जाता चुंबन

राख़ के पर्दे,
राख़ का बिस्तर,

हाथ मिलाने से डर लगता
दोस्त थमा न दे थोड़ी सी राख़।

बहुत पुरानी घटना हो गर्इ कुएँ तालाब का पानी देखना,
अब तो उसको ढके हुए हैं राख़।

राख़ की चादर ओढ़कर, घुटने मोड़े
मैं सो जाता हूँ घर लौटकर
सपनों पर नि:शब्द गिरती रहती है-राख़।

किस्सागो

एक बार ऐसा हुआ
कहकर एकबार जब वह रूका 
तो ऐसा हुआ कि उसे कुछ भी याद नहीं आया
अभी इतने किस्से थे बताने को 
कि गुज़र जानी थीं हज़ार रातें जब वह रूका-
वह खोजता रहा रेगिस्तान, जंगल,
समय और आकाश के भीतर, वह खोजता रहा
और बाहर बैठे रह गये सुनने वाले बहुत सारे लोग

फिर ऐसा हुआ एक बार कि बहुत सारे लोग
मदद को चले गये उसके पीछे उसके भूलने की जगहों पर
और भूल गये किस्सागो का चेहरा
अपने ग्रह आकाश और स्मरण समेत
खो गये सारे लोग, एक भूले हुए किस्से की ख़ातिर
फिर बाहर भूल गये लोग यह सारा किस्सा

ऐसा हुआ एक बार.



8 टिप्पणियाँ:

prabhat ranjan ने कहा…

तीनों कविताएँ अच्छी लगीं. लेकिन किस्सागो विशेष लगी.

बेनामी ने कहा…

priya siddhant : main aap kii teeka-teep se sahmat hoon. Dilli mein Giriraj or Nirupam ke aayojan mein n keval pahlee baar Mahesh ko saakshaat sunane ka mauka mila balki unse aatmiya bhent bhi ho saki. bas, mahesh ko apne par kadi nazar rakhnii hogi ki unki kaavya-bhaasha mannerism mein n badal jaay.
aap sab kii rachnaatmak sakriyata fale-foole yahi--prarthna hai,
piyush daiya

Udan Tashtari ने कहा…

उत्तम रचनायें...पढ़वाने का आभार.

पारुल "पुखराज" ने कहा…

राख़-- अलग लगी और बहुत अच्छी भी

अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…

महेश से संपर्क कोई डेढ़ साल पुराना है जब असुविधा पर उनकी कविताएँ लगाई थीं. फिर तमाम जगहों पर उन्हें पढ़ना हुआ. आपने जो टीप में लिखा है उससे सहमति है. पीयूष दइया जी ने जो कहा उस ओर महेश को लगातार ध्यान देना होगा. बहुत अच्छी भाषा कई बार कवि को भटकाती भी है. वह अपनी ही भाषा का कैदी हो जाता है. अच्छी बात यह है कि उन्हें राजनीति की भी गहरी समझ है. उन्हें ढेरों शुभकामनाएँ...

अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…

हाँ इन कविताओं में मुझे पहली विशेष रूप से भाई.

addictionofcinema ने कहा…

मैंने आज तक महेश की कोई खराब या बहकाने वाली कविता नहीं पढ़ी, उनकी कविताओं की जो सबसे अच्छी बात है वाह है भाषा, विचारों और बाकी सभी अंगों का संतुलन...उन्हें बहुत बधाई , ऐसा ही लिखते रहें

kumar anupam ने कहा…

Mahesh Ki Kavitaien Sabdon Nahin Anudhwaniyon Mein Niwas Krti Hain Yh Khte Huye Main Mahesh K Anubhav-Sansar k Snghanit Yatharth Ka Sakchat Kr Pata Hun Aur Shayad aap Bhi. Un K Shabdon Se 1 Sahmi Huyi Jeevan Gandh Uthti hai Jo Hamein Sochne Pr Majboor Kr Deti Hai.

"Kissago" Zayada Pasand aayi. Badhai.