रविवार, 25 दिसंबर 2011

महेश वर्मा की कविताएँ

[इस बार महेश वर्मा की कुछ कवितायेँ. महेश हमारे समय के उन कुछ ही कवियों में शुमार हैं जिनके पास बिम्ब-रचना की कोई बाध्यता नहीं है, जिनकी कवितायेँ एक तस्वीर को बनाये बिना ही जेहन में घर कर जाती हैं. उनके पास उनका अपना माध्यम ही इतना सधा हुआ है कि विषय को केंद्र में रखकर वे सारी बातें कर जाते हैं. एक तरह से महेश की कवितायेँ दुहरे अर्थ की धारक हैं, इस दुहरे अर्थ का शायद अकेला लाभ यह है कि आपको कविता से जूझना नहीं पड़ता और कविता ख़ुद-ब-ख़ुद ही फ़ैल जाती है. युवा कविता में महेश वर्मा एक ताज़ातरीन लहज़ा लेकर आये हैं, जो अपनी क्षेत्रीय यवनिकाओं से परिपूर्ण है और राजनीति में गहरी दख़ल रखता हैं. बुद्धू-बक्सा महेश वर्मा का आभारी.]


सदी के बीच में

चीख़ें अभी बुझी नहीं हैं और मांस जलने की चिरायंध
किसी डियोडरेंट से नहीं जाने वाली, 
पुराने जख़्मों की बात करना फैशन से बाहर की कोर्इ चीज़ है-
हम दरवाज़ा बंद करना चाहते हैं
उस ओर और इस ओर के लिये.

कोर्इ क्या करे लेकिन इन बूढ़ों का
जो मृत्यु के भीतर रहते थे और अब
उसे पहन लिया है त्वचा की जगह.

एक और बूढ़ा जो हमेशा पेट के बल सोता है धरती पर
वह अपने सीने के छेद में मिटटी भर लेना चाहता है-वहां अब बारूद है।
एक और बूढ़ा बचपन का गीत याद करना चाहता है और
उल्टी करने लगता है इतिहास.

हमारे पास पुराने घर हैं जहां
दीवारों से राख झर रही होती है और खाली कमरों में भी नही गूंजती आवाज-

हम क्या करें इसका जहां गुलाब रोपने की खुरपी 
निकाल लाती है एक कोमल हडडी.

हमारे पास मोमबत्तियाँ हैं और दवाइयाँ

हम दरवाज़ा बंद करना चाहते हैं
अपनी ओर और उस ओर के लिये.

राख़

ढेर सारा कुछ भी तो नहीं जला है इन दिनों
न देह न जंगल, फिर कैसी यह राख़ हर ओर ?

जागते में भर जाती बोलने के शब्दों में,
किताब खोलो तो भीतर पन्ने नहीं राख़!

एक फुसफुसाहट में गर्क हो जाता चुंबन

राख़ के पर्दे,
राख़ का बिस्तर,

हाथ मिलाने से डर लगता
दोस्त थमा न दे थोड़ी सी राख़।

बहुत पुरानी घटना हो गर्इ कुएँ तालाब का पानी देखना,
अब तो उसको ढके हुए हैं राख़।

राख़ की चादर ओढ़कर, घुटने मोड़े
मैं सो जाता हूँ घर लौटकर
सपनों पर नि:शब्द गिरती रहती है-राख़।

किस्सागो

एक बार ऐसा हुआ
कहकर एकबार जब वह रूका 
तो ऐसा हुआ कि उसे कुछ भी याद नहीं आया
अभी इतने किस्से थे बताने को 
कि गुज़र जानी थीं हज़ार रातें जब वह रूका-
वह खोजता रहा रेगिस्तान, जंगल,
समय और आकाश के भीतर, वह खोजता रहा
और बाहर बैठे रह गये सुनने वाले बहुत सारे लोग

फिर ऐसा हुआ एक बार कि बहुत सारे लोग
मदद को चले गये उसके पीछे उसके भूलने की जगहों पर
और भूल गये किस्सागो का चेहरा
अपने ग्रह आकाश और स्मरण समेत
खो गये सारे लोग, एक भूले हुए किस्से की ख़ातिर
फिर बाहर भूल गये लोग यह सारा किस्सा

ऐसा हुआ एक बार.



शनिवार, 10 दिसंबर 2011

शिरीष कुमार मौर्य की कविताएँ

(सामने हैं शिरीष कुमार मौर्य की तीन कविताएँ. कविता "व्योमेश को चिट्ठी" आत्मकथ्य की स्वीकारोक्ति से उपजने वाली कविता है, जहाँ चिट्ठी की शुरुआत काव्यात्मक अंत में बदल जाती है. साहित्य में जो परम्पराएं हम विकसित होते देख रहे हैं, ये उन्हें एक क़रारा जवाब है. किसी व्यक्ति के कवि में तब्दील होने की प्रक्रिया पर यह हिन्दी की शायद अकेली रचना है और उस प्रक्रिया से इतना अथाह प्रेम शायद शिरीष के यहाँ ही संभव है. किसी रचनाकार और साथ ही साथ उसमें उपस्थित 'व्यक्ति' को जज़्ब करने के जो प्रलाप हैं, वह "व्योमेश को चिट्ठी" है. प्रकृति से दूर होने और प्रकृति में होने की तुलनात्मकता और नामवर सिंह की उपस्थिति व्योमेश से मुख़ातिब हो रहे प्रेम की परिभाषा है. यहाँ एक नक़ार की भी उपस्थिति है जहाँ से 'कविता' और 'प्रतिभा' में संशय व्याप्त हो जाता है. "मैं तुम्हें याद कर रहा हूँ" में एक अजीब-सी उलझन से हमारा सामना है, जहाँ याद करना प्रकृति के साथ शामिल होना है. इस शामिल होनें में धिक्कार, साहस और बेक़द्री की व्यंजनाएं हैं. शिरीष की कविताओं में शब्द unfold हो जाते हैं और कविता को और समृद्ध कर जाते हैं. यहाँ पर कवि जलती हुई आँखें मलता सूर्यास्त में शामिल हो जाता है. बुद्धू-बक्सा शिरीष का आभारी.)

वॉन गॉग - स्टारी नाईट
व्योमेश को चिट्ठी                                                                                                                                                              

क्या कर रहे हो प्यारे?
कैसे हैं हाल तुम्हारे?
अपनी तो बस कट रही है यार
और जो कट रही है
उसे हर वक़्त जि़न्दगी कहना ज़रूरी तो नहीं ?

मैं सोचता रहता हूँ
अकसर
कितनी अलग जगहों पर रहते हैं हम
भीतर-भीतर जुड़े हुए लेकिन
मेरे लिए
तुम्हारा दिल रोता हो शायद
जैसे मेरा रोता है तुम्हारे लिए

इन्हीं पहाड़ों से निकलती है गंगा
प्यारे
जहाँ मैं रहता हूँ
जो बलखाती
पछताती
अपनी ही पवित्रता से पिटी हुई
तुम्हारे शहर तक पहुँचती है
कभी झाँक कर देखोगे उसके मटमैले जल में
तो दिख जाएगा
तुमको मेरा साँवला और भारी चेहरा

तुम भटकते हो अपने शहर की गलियों में कहीं
धुँआ छोड़ता पुराना स्कूटर लिए
और मैं बाँज और देवदार और चीड़ के जंगलों में भटकता हूँ
और प्रदूषण के नाम पर
न जाने कितनी आहों से भरी
अपनी साँस भर छोड़ता हूँ

एक जैसी नहीं हैं हमारे रहने की जगहें
और जीवन भी हम शायद अलग तरह का जीते हैं
लेकिन इतना तो तय है
प्यारे
हम ज़हर एक ही पीते हैं

इस जनपदीयता से ऊपर उठ देखें तो
एक ही है हमारा देश
हमारा भेष
एक ही हमारे संकट
हमारा समाज
हमारा ज़बरदस्ती किया जाता
वैश्वीकरण
एक ही हमारी हिन्दी पट्टी
एक ही हमारे मुहावरे                                                        
एक ही हमारे डर
        जहाँ कहीं भी रहते हों प्यारे
        दरअसल
        हम एक ही हैं
        इस विपुला पृथिवी पर

हमारे सपने शायद अलहदा हों
और मेरे भीतर तो वे बचे भी हैं बहुत कम -
बस कुछ ख़ास चुनिन्दा ही
तड़पते हुए दिल के पर्दे में निहाँ जहाँ से उनकी आवाज़ भी आना
अब मुमकिन नहीं
तुम्हारे भीतर होंगे वे ज़रूर फिलहाल एक भीड़ की शक़्ल में
एक-दूसरे को धकियाते हुए

विचार
लेकिन एक ही है प्यारे हमारे भीतर
बीसियों मोटी-मोटी जड़ों वाले बरगद की तरह
न जाने कब से
नोचते-खसोटते
तोड़ने-उजाड़ने को उसे झूलते-कूदते रहे उस पर
कई-कई शाखामृग
लेकिन वह और भी मज़बूत होता गया
पकता गया
हमारी उम्र के साथ-साथ ही

प्यारे
अब भी उस बरगद की मोटी-मोटी डालियों से
ज़मीन की ओर
लटकती-बढ़ती चली आती हैं
कई-कई सारी पतली और कमसिन जड़ें
धरती में घुसकर
जीवन का रस पीने को आकुल

तुम्हारे पास प्रकृति नहीं है शायद ज़रूरत भर की भी
लेकिन
मेरे पास वह है ज़रूरत से ज़्यादा
किसी विरासत की तरह
जिसे तुम्हारे जैसा छोटा भाई कभी-भी माँग सकता
अपने लिए

हमारे दोस्त एक ही हैं प्यारे
बेखटके हम देख सकते हैं एक-दूसरे की ओर पीठ करके भी
दुनिया को
चारों तरफ़ से

और युवा कविता की इस कोलाहल भरी दुनिया में
अगर मुझे कोई अधिकार दिया जाए                                            
तो अपनी कविता के इस अनाम मंच से घोषणा करना चाहता हूँ मैं
कि हर नये-पुराने लेखक की तरह
व्योमेश के पास हैं
नामवर जी, प्यार करता हूँ जिनसे टूटकर हिंदी की इस असम्भव दुनिया में
और एक अद्भुत आदर से भरा दिल जिनके लिए -
वही पुराने एकछत्र रियासतदार
बरसों से बैठे उसी पुराने जर्जर तख़्त पर जिसे परिभाषा में हम आलोचना कहते हैं
वैसी ही शानो-शौकत के साथ
आज भी वैसे ही बाअदब बामुलाहिजा सलाम बजा लाते हैं उन्हें
दिल्ली
मुम्बई
बनारस
और इलाहाबाद

मेरे पास भी हैं वे
भरे हुए प्यार और दुलार से
कहते हुए
चार बरस पुराने एक मंच पर -
‘‘शिरीष कुमार मौर्य को खोजने का सुख संयोगवश मिला
मेरे लिए यह ऐसी ही उपलब्धि है
जैसे कि चालीस बरस पहले धूमिल को देख सका !’’

तो प्यारे इस तरह मैं हूँ चालीस साल पुरानी यादों में बरबस ही ले जाता उन्हें
और तुम्हारे पास फिलहाल नहीं है
उन्हें लुभाने लायक ऐसी कोई भी कविता

कविता की जगह मैं कह सकता था प्रतिभा
लेकिन
प्रतिभा मैंने जानबूझकर नहीं कहा

और क्या कहूँ पहाड़ की छाती पर मौजूद 21 जून 2007 की
इस पटपटाती रात में

इतना ही
कि इस ज़्यादा लिखे को तुम बहुत कम समझना
हो सके तो अपनी चिट्ठी में
तुम भी
      एक विपर्यय के साथ
                    बस इतना ही लिखना !


मॉनेट - निम्फीज़


मैं तुम्हें याद कर रहा हूँ

मैं तुम्हें याद कर रहा हूँ
जीवन और मृत्यु
और इन दोनों के बीच की ढेर सारी अबूझ ध्वनियों से भरी
मेरी भाषा
रह-रहकर
तुमको पुकारती है

मैं तुम्हें याद कर रहा हूँ
उन सभी चीज़ों के साथ जो तुमसे बहुत गहरे जुड़ी हैं
तुम इसे मेरा बनाया एक भ्रम भी कह सकती हो
या फिर याद करने का एक अधिक गाढ़ा और चिपचिपा तरीका
जो तंग करता है
खीझ उठता है जिससे मन
जिसे कभी छोड़ा नहीं जा सकता
और अपनाया भी नहीं जा सकता
हर किसी के साथ

उसी अद्भुत और आत्मीय तरीके से
मैं तुम्हें याद कर रहा हूँ

और जानता हूँ कि यह सिर्फ मेरा तरीका नहीं है
तुम्हारा भी है
***
बहुत सारी बर्फ गिरी है यहाँ
लगभग 7000 हज़ार फीट पर
जहाँ मैं रहता हूँ फिलहाल
शब्दहीन यह गिरती ही जाती है पहाड़ों पर
पेड़ों पर
मकानों पर
लोगों पर
विचारों पर
और बेतार इधर से उधर आती-जाती यादों पर

उसके बोझ से चरमराती टूटती हैं डगालें
ज़मीन पर गिरते चटखते हैं बिजली के तार
पाइपों में जम जाता है पानी

रक्त बहता ही रहता है लेकिन नसों में
निर्बाध
चलता रहता है कारोबार
पहुँच ही जाते हैं अपने काम पर काँपते हुए मेहनतकश कामगार
खेलते ही रहते हैं बच्चे
और उतना ही बरजती जाती हैं उन्हें उनकी माँएँ
किसी भी सम्भावित चोट-चपेट के खिलाफ
उमड़ते-घुमड़ते आते हैं
बादल
झाँकता ही रहता है लेकिन रह-रहकर
उन्हें चीरता
सूर्य हमारे इस गोपनतम
दुर्लभ जीवन का
जिससे बिखरती धूप का रंग
हमारे रिश्ते की तरह साफ़ और सुनहरा है
उतना ही गुनगुना और
गर्वीला भी
***
अभी
मेरे जीवन में वसन्त है पूरे उफान पर और पूछना चाहता हूँ मैं
कि क्या तुम थोड़ा-सा लोगी?

तुम्हारे भीतर की आँधी में लगातार झर रहे हैं पत्ते और माँगना चाहता हूँ मैं
उन में कुछ सबसे नाज़ुक
सबसे पीले
क्या तुम मुझको दोगी?
***
कुछ दिन में फागुन आएगा
              और आएंगी गमकती हवाएँ वे
सिन्दूरी रंगत वाली
गए बरस तुमने जिनके बारे में मुझको बतलाया था
यों यह रंग भी सबको दिखाई कब देगा !

शायद हम मिलेंगे दुबारा
अपने-अपने भीतर एक बियाबान लिए
जहाँ बहुत चुपचाप दौड़ते होगे कुछ खरगोश छोटी-चमकीली आँखों वाले
एक झाड़ी से दूसरी झाड़ी के बीच
शरण्य की खोज में
हम उन्हें एक-दूसरे की ज़मीन पर आसरा देंगे

जीव-जगत में पशु-पक्षियों के लिए तुम्हारा प्यार
और मनुष्य जाति को धिक्कार
मुझसे छुपा नहीं है

अगर कभी मैं बदल पाया तुम्हारे हिस्से की दुनिया
तो सबसे पहले बदल दूँगा
इस धिक्कार को
जो तुम्हें थोड़ा अमानवीय और आवेगहीन बनाता है
कितना आश्चर्यपूर्ण है यह कि तुम्हारे लिए अभी और प्रकट होना है दुनिया को
और मेरे लिए इसे अब बन्द होते जाना है
              गो तुम मुझसे 9 बरस पहले आयीं इसमें
तब भी बहुत कुछ है जो तुमसे पोशीदा लेकिन मुझ पर नुमाया है

बहुत दुख है यहाँ
बहुत अपमान
बेक़द्री रिश्तों की
थेथर आँसुओं की धार
बेहद डराता है यह जगह-जगह से टूटता
बिखरता
झूटों और मक्कारों से भरा संसार

लड़ने के नाम पर इस सबके खिलाफ
मैंने सिर्फ प्रेम किया है
क्योंकि इससे ज़्यादा साहस के साथ
                  और कुछ किया ही नहीं जा सकता
किसी भी समय और काल में
कोई दूसरा तरीका नहीं बदल देने का
                  दिन-दिन निष्ठुर होती जाती इस दुनिया को
सिवा इसके कि आप वह करें जो कहीं नहीं है
फैल जाने दें उसे
ढाँप लेने दें कम से कम आपके सिर के ऊपर भर का
थोड़ा-सा आसमान

आज
मेरे पास एक सीधी और सच्ची लड़की का
जोश और दिलासा से भरा
जीवन भर का साथ है
जहाँ थकने लगते है कदम
दुखने लगता है हृदय
वहाँ मरहम लगाता हमेशा एक ऊष्मा भरा हाथ है

और तुम वहाँ अकेली हो जीवन की झंझा में
निपट अकेली

अपनी इस सर्वोच्च उपलब्धि और तुमसे जुड़ी एक छोटी-सी हताशा के साथ
मैं तुम्हें याद कर रहा हूँ
बार-बार!

क्या तुम्हे भी अपनी यादों में सुनाई दे रही है
कितनी ही ध्वनियों से भरी
मेरी यह शब्दहीन आवाज़ ?


रूबेंस - सेंट अगस्तीन


शामिल

आजकल न मैं किसी उत्सव में शामिल हूँ                                              
न किसी शोक में
न किसी रैली-जुलूस में                    
किसी सभा में नहीं
न किसी बाहरी ख़ुलूस में

मैं आग में शामिल हूँ आजकल  
लाल-पीली-नीली हुई जाती लपटों में नहीं  
भीतरी धुएँ में  
जलती हुई आँखें मलता मैं सूर्यास्त में शामिल हूँ                                                      
जिसके बारे में उम्मीद है                                                                        
कि कल वह सूर्योदय होगा

***

शनिवार, 26 नवंबर 2011

सूरज की कविताएँ

(पिछले कुछ समय से हम सूरज की कविताओं का सामना कर रहे हैं. सूरज की कविताओं में व्याप्त तेवर अनूठा है और उस तेवर के अपने समय के साथ हुए तीखे समझौते भी अनूठे हैं क्योंकि कविताओं में जो लहज़ा सूरज इस्तेमाल में लाते हैं वह बिम्ब की रचनात्मकता की ओर ज़्यादा इंगित नहीं करता बल्कि वह अपनी बात रखने का एक पुख्ता ज़रिया साबित हो जाता है. सूरज साहित्यिक चोरियों पर बात करते हैं तो कहानी से कविता में हुई चोरियों का ज़िक्र कर जाते हैं. बनारस के इस कवि का बुद्धू-बक्सा आभारी.)





आग की आवाज या जलने की आवाज 
( साहित्यिक चोरियों के लिए ) 

बादल और पानी में फर्क अधिक है. आग और जलने में कम. कविता, कहानी , प्रेम, ईर्ष्या आदि के फर्क रेशे बराबर हैं. नामालूम. बादल समुन्दर से, पौधों से या हमारे शहरी शरीर से पानी चुराता नहीं, लेता है. बताकर. कवि सूचनाओं के मामले में गैरजिम्मेदार होते हैं अगर चोर नहीं होते. कोई कहानी आग की आवाज नहीं होती. पर कविता भी जलने की आवाज तब तक नही होती जब तक कोई कहानी आग की आवाज न हो जाए. चौदह पंक्तियाँ कहानी से कविता में टहलते हुए आ जाती हैं और स्थाई तौर पर कविता में बस जाती हैं. कहानी के पुल पाए उजड़ जाते हैं, गिर जाते हैं. कविता के साथ कवि का नाम इतना भयाक्रांत करने वाला होता है कि कहानी पत्रिका से निकल भागती है. आवेग अब कहीं नहीं मिलता. कवि के कान शब्द की ताल ढोते हैं. आवाज उनके लिए नहीं, भावों के लिए एक जगह है जहाँ वे आक्रांत कवियों से छुपे रहते हैं. 

जीवन या कहानियों में मामला गम्भीर और अश्लील इसलिए भी है कि चोरियाँ वहाँ दिन दहाड़े होने लगी हैं. अश्लीलता के अपने वकील और अपनी ही अदालते होती हैं.   


जलता हुआ पेड़ राष्ट्रीय दृश्य है
 
साँवली नदी कृशकाय इतनी कि
नदी नहीं
छाया नदी या
परछाईं स्मृति के लकीर की
 
ताप के ताए दिन में चहुँओर से पहुंचते रास्ते
जिनका कोलतार चिपककर
इतिहास के भाल से
सुगन्धियों पर ग्रहण लगाता
कि
बरगद का एक पेड़
जो कभी इस तरह था कि
‘है’.
है और जल रहा है.
बीच से सुलग रहा उम्मीद की तरह
हरा यह वृक्ष - दृश्य
 
धुँआ तैरता बरगद के पत्तों पर जो दूध भात
थामते अगली जीवितपुत्रिका के त्योहार पर और
माँए अपने पुत्रों के जीवन की
मंगलकामना कर तोड़तीं
व्रत 
 
धुएँ ने रोक ली पत्तों की साँस कि
किस हतभाग्य ने लगाई यह आग कि
ऐसा जलना किस मनुष्य को भाया कि
उसकी खोज नही हुई कि
वाकया फिर वही, नदी पर खत्म कि 
 
जल इतना कम कि
नदी छिपाती
जरूरतमन्दो से बालू के सर्पिल पाटों में
भूल चुके जल परस कूल किनारे नदी के
   
जलता हुआ पेड़
राष्ट्रीय दृश्य है, नाचने से इंकार करता मोर
राष्ट्रीय पक्षी है, लापता शेर
राष्ट्रीय पशु.

बुधवार, 9 नवंबर 2011

कवि के साथ - आलोक धन्वा

[ये हैं आलोक धन्वा के तीन कविताएँ. उनके संग्रह 'दुनिया रोज़ बनती है' से. कविता "बकरियाँ" में उस अनंत की व्याख्या मिलती है, जहाँ चरवाहे का होना नामुमकिन है. उस अनंत की परिभाषा में सुख नहीं है, क्योंकि तीखी ऊंचाइयों पर पीपल के पेड़ नहीं होते, इसलिए शायद सुख नहीं होता...फ़िर भी यहाँ हरियाली की अप्रत्यक्ष पैरवी है. "भूखा बच्चा" इस समय की सबसे मार्मिक कविताओं में से एक है, बच्चे की आँत होने का बिम्ब शायद आलोक धन्वा के यहाँ ही मुमकिन था जिसमें जलआकार या जलउत्तेजना बनकर रहा जा रहा है. भूखे बच्चे की तमाम दिक्कतें प्रकृति-प्रक्रियाओं से तुल्य हैं. यहाँ शायद इस बात का अवसाद व्याप्त है कि भूखे बच्चे के लिए मैं कुछ नहीं हूँ. आलोक धन्वा नींद को आवारा बना देते हैं और उससे उसी दशा में संवाद करते हैं. युवा-कविता पर इस कवि का कितना प्रभाव है, बताने की ज़रूरत नहीं. बुद्धू-बक्सा आलोक धन्वा का शुक्रगुज़ार.]



बकरियाँ
अगर अनंत में झाड़ियाँ होतीं
तो बकरियाँ अनंत में भी हो आतीं
भर पेट पत्तियाँ टूँग कर वहाँ से
फ़िर धरती के किसी परिचित बरामदे में 
लौट आतीं

जब मैं पहली बार पहाड़ों में गया
पहाड़ की तीख़ी चढ़ाई पर भी 
बकरियों से मुलाक़ात हुई
वे क़ाफ़ी नीचे के गाँवों से
चढ़ती हुई ऊपर आ जाती थीं
जैसे-जैसे हरियाली नीचे से 
उजड़ती जाती गरमियों में

लेकिन चरवाहे कहीं नहीं दिखे 
सो रहे होंगे
किसी पीपल की छाया में
यह सुख उन्हें ही नसीब है.

भूखा बच्चा
मैं उसका मस्तिष्क नहीं हूँ
मैं महज़ उस भूखे बच्चे की आँत हूँ.

उस बच्चे की आत्मा गिर रही है ओस की तरह

जिस तरह बाँस के अँखुवे बंजर में तड़कते हुए ऊपर उठ रहे हैं
उस बच्चे का सिर हर सप्ताह हवा में ऊपर उठ रहा है
उस बच्चे के हाथ हर मिनट हवा में लम्बे हो रहे हैं
उस बच्चे की त्वचा कड़ी हो रही है
हर मिनट जैसे पत्तियाँ कड़ी हो रही हैं
और
उस बच्चे की पीठ चौड़ी हो रही है जैसे कि घास
और 
घास हर मिनट पूरे वायुमंडल में प्रवेश कर रही है

लेकिन उस बच्चे के रक्त़संचार में 
मैं सितुहा-भर धुँधला नमक भी नहीं हूँ

उस बच्चे के रक्तसंचार में 
मैं केवल एक जलआकार हूँ
केवल एक जल उत्तेजना हूँ.

नींद
रात के आवारा 
मेरी आत्मा के पास भी रुको 
मुझे दो ऐसी नींद 
जिस पर एक तिनके का भी दबाव ना हो 

ऐसी नींद 
जैसे चांद में पानी की घास.

सोमवार, 31 अक्तूबर 2011

रचना प्रक्रिया - १ : ‘जंक्शन’ पर

चन्दन पाण्डेय


(चन्दन पाण्डेय किसी परिचय के मोहताज़ नहीं हैं. कहानी में युवाओं के सशक्तिकरण के लिए नए रास्तों का निर्माण करते हैं और अपनी पृष्ठभूमि, परिवार और नौकरी से होकर आती व ज़मीन से जुड़ी हुई कहानियाँ लिखते हैं. यह जो है, उनकी कहानी 'जंक्शन' के Behind the Scenes को हमसे बांटता है. बुद्धू-बक्सा चन्दन पाण्डेय का आभारी.)
      
        इजाडोरा डंकन को आप सब बखूब जानते होंगे. सुप्रसिद्ध नृत्यांगना थीं. एक शोर यह भी है कि आधुनिक नृत्य का परवर्तन उन्होने ही किया. पर यहाँ इनके उल्लेख का सीधा सरल उद्देश्य है. इनके जीवन की एक घटना रचना प्रक्रिया से जुड़े सवालों के लिए बेहद मददगार साबित होती है.
        
        इजाडोरा के ईश्वर उन्हें करवट करवट जन्नत बक्शें कि एक पत्रकार ने उनसे पूछा : आप नृत्य क्यों करती है ? यह सवाल डंकन के लिए पेचीदा था जबकि वे नृत्यकला में पारंगत और प्रसिद्ध हो चुकी थीं. जरा देर विचारने के बाद डंकन ने अनूठा ही जबाव रखा : अगर यह जानती तो फिर नाचती ही क्यों ?

        कमोबेश यही अहवाल अपना भी है.

        रचना प्रक्रिया या लिखने के कारण जैसे प्रश्नों के कई कई जबाव विभिन्न मौकों पर सूझते हैं. किसी भी कहानी के लिखे जाने की कोई एक वजह कभी नहीं रही. ‘जंक्शन’ को ही लें. मुझे आज तक इस कहानी के लिखे जाने का उद्देश्य स्पष्ट नही हुआ. यह जरूर है कि अपनी आज तक की रचनाओं में यह मुझे बेहद पसन्द है.
        आजकल जो भाव मन में चल रहा है उससे लगता है कि यह कहानी मैने उस स्त्री के लिए लिखी होगी जिसका पति कथा के भीतर मार दिया जाता है. पर जब लिखना शुरु किया था तो मन में एक छवि थी. बचपन में देखी हुई. आलू की रोपाई के दिन हर साल अक्टूबर में आते थे. जिस चलचित्र को लिखने की मंशा थी वो यह कि कैसे बाबा या पापा आलू की क्यारियों में आलू की आँख बैठाने के बाद उसे क्यारी पर पास की मिट्टी चढ़ाने के बाद पैरों से गोल करते हैं. तरीका यह कि दोनों तलवों के बीच में हल्के दबाव के आसरे क्यारी की मिट्टी को अर्धगोलाकार करते जाना है. यह किसी लोकनृत्य जैसा होता है. धीमा परन्तु लय के साथ. यह कठिन होता था कारण कि हमने जब भी कोशिश की, आधे से अधिक जाते जाते जाँघ भर जाते थे.
        कभी सद्यारोपित आलू के खेत करीब से देखें, आपको उसकी बनावट, एक किस्म की लयकारी, आपको आकर्षित करेगी. ऐसा ही कोई दिन था जब बाबा, चाचा लोग और पापा आलू के खेत में लगे हुए थे तब भारी शोर शराबा उठा. बुआ ( पापा की चचेरी बहन ) तो बाद में रास्ते में मिली होंगी, खबर पहले आ चुकी थी कि उनके भाई ( पापा के चचेरे ) को बिजली मार गई है. जितने लोग भी खेत पर थे सब दौड़े, क्यारियों की परवाह किये बिना दौड़ पड़े.
        उसके बाद मुख्य कथा बेहद तकलीफदेह पर अच्छे परिणाम वाली रही. वो फिर कभी कि कैसे चाचा बचा लिए गए कि कैसे दस बारह मिनट में डेढ़ पौने दो मील कुछ लोग एक इंसान को खाट पर लिए लिए दौड़ गए थे कि आज वो शख्स जीवित और स्वस्थ है, तीन बच्चे हैं.
        इसमें गौण कथा, या जीवन, यह है कि मेरे घर के सभी लोग आलू की क्यारियों के साथ मुझे भी खेत पर ही भूल आए थे. मैं सात साढ़े सात साल का था, स्कूल नया नया जाना शुरु किया था. वो भी चाचा की साईकिल पर और इस तरह जिस दिन वो किसी काम में व्यस्त होते, हमें स्कूल नही जाना पड़ता था. यह अच्छी बात थी.
        पर उस दिन मैं खेत में निरा अकेला रह गया था. दूर दूर तक कोई नहीं देख रहा था. बहुत दूर एक पीपल था, जो अभी पिछले दिनों ही कटा है. दूर कहीं, कुछ कुत्ते दिख रहे थे, जिनमें से एक दो को ही पहचानता था बाकी सब दूसरे गाँव से आए लग रहे थे. मैं इतना डरा हुआ था कि मेरी आवाज ही गुम हो गई थी. रोने की लकार भी नहीं बँध पा रही थी. कुत्तों से मैं डरता था. लोग कहते थे कि कुत्तों के सामने धीरे चलना चाहिए. यह तरीका अपनाया तो पाया कि और कुछ हो न हो, मैं अपना डर ही कई गुना बढ़ा जरूर रहा हूँ.
        मैं आलू के खेतों के बीच से ही वापस आया. मेड़ की घास के बनिस्बत यह सुविधाजनक था. घर आया तो अम्मा के पास रोने लगा. मेरे रोने का सबने ध्यान दिया और खुले मुँह मेरी भावुकता की ताईद हुई कि मैं इसलिए रो रहा हूँ क्योंकि चाचा को बिजली छू गई है. मैं इतना नाराज और डरा हुआ था कि मैंने उस समय किसी की गलतफहमी दूर नहीं की. बड़े होने पर जब घर में और अम्मा को स्पष्ट किया तो किसी को मेरा रोना याद भी नही था. सबने कहा : हुआ होगा.

        बात मैं जंक्शन कहानी की कर रहा था. मेरे मन में चलचित्र यही था कि एक आदमी आलू की क्यारियाँ मुकम्मल करने पर भिड़ा है और उसे कोई बुरा समाचार सुनाया जा रहा है. कहानी में, सुमेर के पिता आलू की क्यारियों को गोल कर रहे हैं तब उन्हें यह सूचना मिलती है कि उनका बेटा मार दिया गया है और उसकी लाश थाने पर है. हाँ यह जरूर है कि कहानी के मगरूर पात्र मेरी सारी बात नहीं सुनते सो इस बार भी; सुमेर के पिता दौड़ते नही हैं. वे इस खबर का ही प्रतिरोध करते हैं. हालाँकि कहानी में मौका ऐसा नहीं था कि मैं आलू के क्यारियों वाली अपनी बात लिख सकूँ पर उस चित्र को उकेरा है.
        पहले जब यह कहानी लिखना शुरु किया तब यह शुरुआती दृश्य था. कहानी का आईडिया ‘जंक्शन’ ही था. एक ही समय में अलग अलग दिशाओं में जाते हुए रास्ते. पर पहले ड्राफ्ट के वक्त मैं खुद भी इसका एक पात्र था, जो कि बाद के ड्राफ्ट्स में बदलता गया. 
        पहले मैं यकीन नहीं मानता था कि कहानी अपना रास्ता खुद चुनती है. अपना शिल्प भी. मैं सोचता था,जो मर्जी चाहूँ लिख सकता हूँ. ‘सुनो’ कहानी के बाद यह धारणा बदलने लगी थी और ‘जंक्शन’ ने इस विचार से को पूर्णत: खत्म कर दिया. हुआ यह कि कहानी अपने हिसाब से लिख चुका था तब एक यात्रा का मौका मिला.
        दरअसल यह कहानी बनारस से गाँव की अनेक यात्राओं के दौरान तैयार हुई है. इन्हीं किन्ही यात्रा में किसी ने बातों बातों बताया था कि बलिया जिले के लिए फौज की भर्ती अलग से होती है कारण कि इसे बदमाश जिला माना जाता है. इससे जुड़ी तो नहीं पर वर्षों पहले की स्मृति में लखनऊ की वह घटना थी, जिसमें भर्ती के दौरान सेप्टिक टैंक टूटने से कई अभ्यर्थी डूब कर मर गए थे.
         छोटी बहन रिम्पल को बी.एड. की प्रवेश परीक्षा दिलाने गोरखपुर गया हुआ था. जैसा कि कहानी में है, जीवन में भी लौटते हुए में गाड़ी विलम्ब से थी. कहानी का ‘लोकेल’ भटनी और लाररोड के बीच का है पर जीवन में यह घटना औड़िहार स्टेशन पर घटी थी.
        इन्टरसिटी, औड़िहार जंक्शन पर खड़ी थी और बहुत देर किए जा रही थी. पता चला कि पवन एक्स्प्रेस आ रही है. पहले वही जाएगी. बहुत सारी सवारियों के साथ हम भाई बहन भी प्लेटफॉर्म पर इस उम्मीद से चले आए कि पवन पकड़ लेंगे. पवन आई और चूकि रात का मौका था इसलिए हम साधारण डब्बे में चढ़ गए. इस गाड़ी में मुम्बई जाने वालों की भीड़ पहले ही बनी हुई थी. मैने एक भाई से आग्रह कर रिम्पल को जगह दिला दी और खुद बाहर आ गया. तैयारी यह थी कि घंटे सवा घण्टे का रस्ता है सो अपन दरवाजे पर खड़े हो लेंगे.
        जब मैं रिम्पल के लिए चाय लेकर भीड़ से बचते बचाते अन्दर जा रहा था तब तक दो हट्टे कट्टे  लोग सामने से बेहद तैश में आते हुए दिखे, जिससे चाय छलक गई और मेरा हाथ जल गया. मैने एक गाली दी जिसे शायद उन महानुभावों ने सुना नहीं और आज उस घटना के बाद खैर ही मनाता हूँ कि उन लोगों ने मेरी दी हुई गाली शायद सुनी नहीं. वे दोनों गाड़ी से बाहर उतर लिए और बहन को चाय थमा कर मैं भी बाहर आ गया.
        आज भी उस घटना की लेश बराबर स्मृति भी सिहरन मचा देती है.
        पल सवा पल बाद की बात रही होगी जब आठ दस जने उस बोगी में चढ़े और सबने गौर किया कि ये क्या माजरा है? तब तक खैराबाद और ताहिरपुर के दो अधेड़ सज्जनों से मेरी हेल मेल हो चुकी थी. कुछ देर बाद पीटने की, रोने की,चीखने चिल्लाने की आवाज उस बोगी से आने लगी. घटना स्थल पहुँचने से पहले हम जान चुके थे कि आस पास के लोग बिहारी मजदूरों को मार पीट कर अपनी बहादुरी दिखा रहे हैं. यह सब बेहद कम समय में हो गया.
        हम जब अन्दर पहुँचे, तो थप्पड़ों, घूसों और बेल्ट की वीभत्स आवाज गूँज रही थी. तभी, सब फौजी अपराधियों ने चिलाना शुरु किया : नीचे उतार, सालों को. अपराधियों के दल की कौन कहे, हमें तो यह भी नहीं मालूम चला कि बचाने वालों का दल कब बन गया. हम सब भी करीब दस की संख्या में थे और आए दिन होती आई ऐसी घटना के उस खास नुक्ते से वाकिफ थे. साल भीतर ही भीतर दो अलग अलग घटनाओं में दुल्लहपुर तथा सादात में, मामूली वजहों के कारण, दो लोगों के गाड़ी से बाहर उतार कर जान से मार दिया गया था.
        कहानी से उलट, हम सबने इन बिहारी मजदूरों को रेल से नीचे नहीं उतरने दिया. पर हमने लड़ाई नहीं लड़ी. बाबू, भईया कहा. प्रार्थानाएँ कीं. पैर तक पकड़े. पर इन सबसे वे बदमाश कहाँ मानने वाले थे लेकिन हमारे गोल में लोग बढ़ते गए तब उनके अन्दर भय पैठा. वे उन मजदूरों को बाहर नही उतार पाए और गाली देते हुए तथा अपने फौजी होने की बात बताते हुए उतर गए. वे सब के सब दिखने में बेहद बलिष्ठ और लगभग दानवाकार थे. कहानी में मजदूर की हत्या इसलिए हो जाती है क्योंकि एक मजदूर को बचा लेने की घटना ने हम सबको इतना उद्देलित किया कि वहीं के वहीं सभी लोग बात करने लगे थे ; अगर सादात और दुल्लहपुर में भी लोगों ने कोशिश किया होता तो शायद वे दोनों लोग बच जाते, जो जाने कौन थे.
         इस घटना का सबसे विकट पहलू यह था कि मेरी बहन, रिम्पल, बार बार मुझे पीछे खींच रही थी और उसका रोना शायद सबसे अधिक उभर कर सामने आ रहा था. उसके रोने और मुझे इस झगड़े में शामिल न होने देने की कार्रवाई से दूसरे लोग भी प्रभावित हुए. वह बाद तब तक रोती रही जब तक की रेल चल नहीं पड़ी और गोमती नदी पार नही हो गई.
         जिन लोगों पर हमला हुआ था उनमें से एक का कान फट गया था और कई को बेहद गहरी चोटें  आई थी. वे सभी लोग जो कहीं न कहीं उन मजदूरों की लाचारी से जोड़ रहे थे,चुप थे. गाड़ी में यह सन्नाटा बनारस तक साथ आया.   
         यहाँ रुक कर मैं ‘आभासी’ पूर्वांचल ( उत्तर प्रदेश का पूर्वी हिस्सा ) के गाजीपुर, मऊ, चन्दौली , गोरखपुर और आजमगढ़ जैसे जिलों की एक खास बात बताना चाहूँगा, जो शायद कुछ को बुरी लगे. मैं चाहता भी यही हूँ. देवरिया इनसे अलग नही है पर जाने क्या कारण है, बाबा राघवदास के सुधारवादी आन्दोलन या कुछ और वजह, कि देवरिया इन जिलों से कम हिंसक है. वहाँ जमीन के बटवारे भी इतने क्रूर नही है जितना गाजीपुर, मऊ, गोरखपुर, चन्दौली और आजमगढ़ के.
इन खास जिलों के सवर्ण अब भी उसी भाव में जीते हैं जो आजादी के पहले का बताया जाता है. विशेषकर राजपूत, भूमिहार, यादव, कुछ ब्राहमण और कुछ मुसलमान अब भी उसी हेकड़ी में रहते हैं.  कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता. सारे काम आदर से देखे जाने चाहिए पर एक बात कहने के लिए माफी चाहूँगा कि इन जिलों के ज्यादातर सवर्ण फौज में ड्राईवर, खलासी, हजाम, रसोईया या धोबी का काम करते हैं, अधिकारियों या मामूली सिपाहियों की डाँट सुनते हैं, खीसे निपोरते हैं. अगर ये सवर्ण बहुत ऊंचा कर गए तो राज्य पुलिस या फौज में सिपाही लग जायेंगे.
        यही लोग जब लाम से वापस आते हैं तो इनकी हेकड़ी देखिए, इनकी चाल देखिए. जमीन से दो अंगुल उपर ही चलते हैं. या शायद छ: अंगुल. मैने एक समूचे साल जमनिया से बनारस आ जा कर पढ़ाई की है. सहारा रेल का ही था. इस दरमियान जो सुना, देखा, गुना उससे मैं अपने इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ और कायम हूँ.
        यही फौजी और इनके नात गोतिया तथा उनके भी नात गोतिया अपने क्रोध को एक पल के लिए भी काबू नही कर पाते अगर वह किसी गरीब या मजलूम पर है. इसलिए ही हर साल बनारस से मऊ के बीच और बनारस से दिलदारनगर के बीच रेल यात्राओं में ऐसी मारपीट और हत्याओं की दस बारह घटनाएँ हो ही जाती हैं. यह सिवाय सामंती मान अभिमान के दूसरा कुछ नहीं है. ऐसे में ये जो जमीन्दार हैं और मौका पड़ने पर झुकने की कला में भी माहिर हो चुके हैं, उनकी क्रूरता भी अब नए पैमाने गढ़ रही है, वरना आप ही बताएँ कि बैठने की जगह मात्र के लिए क्या किसी को जान से मारा जा सकता है. मेरा यह मानना है कि इन सामंतों का मान मर्दन बेहद अनिवार्य है, एक बार, दो बार, तीन बार ..तब तक, जब तक कि इनके अन्दर से यह गाँठ न निकल जाए.
        (मैं एक बार पुन: यह कहना चाहूँगा कि धोबी, हजाम या कोई भी काम उतना ही सम्मानीय है जितना कि दूसरे और मेरा कोई भी मत इन कार्यों से जुड़े लोगों के खिलाफ नही है.)

        इस घटना के प्रत्यक्षदर्शी होने से मेरे भीतर काफी कुछ बदला, जो शायद यहाँ बता पाना सम्भव नहीं, पर हुआ यह कि जब मैं घर पहुँचा उस वक्त रात के एक या डेढ़ बज रहे थे और मैने बाकी बची पूरी रात में इस घटना को हू ब हू लिखने की कोशिश करता रहा.
        बात आई गई नहीं हो सकी और अंतत: जंक्शन कहानी लिखते हुए यही घटना मुख्य बिन्दु बनी, जिससे कहानी में नारा रचा जाता है. मनई नामक ग्राम देवता सृजित होते हैं, उनके लिए गीत लिखे जाते हैं, उनके चौरे बाँधे जाते हैं. इन्हीं सूत्रों पर कहानी आगे बढ़ती हैं, जहाँ वो अभ्यर्थी समूह भी आता है जिन्हें फौज में भर्ती होना है.
        या वह बैंक जो अपनी जगह से इसलिए हटाया जा रहा है, जो मुनाफा नही कमा रहा. उसे शहर का रास्ता दिखाया जा रहा है. जो सहकारिता की चीजे थीं और जन सुविधा की,उनसे मुनाफा पहली और आखिरी उम्मीद कैसे होने लगी पता ही नहीं चला. अब ये गाँव वाले है, जो बैंक से जुड़े काम काज के लिए एक कोस चलते थे, उन्हें चार पाँच कोस चलना होगा. एक हिन्दी प्रदेश का ही जन्मा पुलिस अधिकारी है जो हिन्दी से इस कदर अपरिचित है, जिसे अपनी भाषा का इतना भी नहीं रियाज कि हिन्दी बोलते हुए कब प्रश्नवाची लगाना है और कब विस्यमादिबोधक. 

जंक्शन का कथा शिल्प: इस कथा से मैं इतना गहरे जुड़ गया था कि एक पात्र ही बन गया. पहली और आखिरी कहानी जिसकी घटनाओं से मैं बेहद परिचित था फिर भी जिन्हें लिखने में भारी मुश्किल हुई. इसलिए ही शायद कहानी के भीतर एक कहानी है, जिसे (अ)नायक सुना रहा है. (अ)नायक इसलिए कि वह हर जगह मौजूद भले है पर शामिल नहीं. नायक वे हैं, जो शामिल हैं और चौतरफा शिकार हो रहे हैं. यह (अ)नायक भी कहानी के अंत अंत तक नायक में तब्दील होता जा रहा है, जिसने कथावाचन का काम चुना है और कमाल यह कि कथावाचन जैसे मामूली काम के लिए वो सजायफ्ता है, उसे गिरफ्तार कर लिया गया है. जहाँ तक सवाल इस ‘जंक्शनं’ की भाषा का है, वह स्वत: स्फूर्त है. उनकी ही भाषा है, जिनकी कहानी. कहानी के उन हिस्सों में सम्वाद नहीं के बराबर है, जहाँ एक ही समाज के लोग हैं. एक ही समाज में रचे बसे लोग बेहद सम्वाद कम इस्तेमाल करते हैं.

        आखिरी बात यह कि लखनऊ में सेप्टिक टैंक फूटने और अभ्यर्थियों के उसमें डूब कर मर जाने की जो घटना घटी थी, उस वक्त मैं भी लखनऊ था. मैं भर्ती के लिए नही गया था पर मेरे गाँव से कुछ लड़के आए गए थे और उनकी परीक्षा पहले ही हो चुकी थी. शाम में जब हम इमामबाड़ा टहल रहे थे, तब एक सान्ध्य दैनिक में यह हृदयविदारक खबर पढ़ी. अगले दिन के अखबारों मे भी यह खबर थी. रही होगी करीब 2000 या 2001 की बात पर जब कहानी लिख रहा था यानी 2008 में, तब मैंने कई लोगों से इस घटना की दर्याफ्त की और सबने एक सुर में ऐसी किसी भी घटना की जानकारी होने से इंकार किया. मेरे पास समय और साधन नहीं था कि लखनऊ जाकर इसकी पुनर्पड़ताल करूँ, पर स्मृति थी. भरोसेमन्द स्मृति.


रविवार, 9 अक्तूबर 2011

ग़ालिब और शमशेर



ग़ालिब ख़ुद एक बड़ा हीरो है अपनी व्यापकता के केंद्र में, जो कि स्पष्ट एक आधुनिक चीज़ है. व्यक्ति का निर्वाध अपनापन. हर बात में अपने व्यक्तित्व को - अपने निजी दृष्टिकोण को सामने रखना. मैं ख़ुद किस पहलू से सोचता हूँ, किस ढंग से महसूस करता हूँ, यह उसके लिए महत्त्व की बात है. 

हर बात की तह में जाने की - अपने विशिष्ट तौर पर उसका मर्म समझाने की - उसकी कोशिश सर्वत्र प्रकट है. 

उसकी मुसीबतें, उसका संघर्ष, जिसको यह कभी छिपाता नहीं....उसके शब्दों में हू-ब-हू आधुनिक-सा लगता है. अजब बात है. उसमें आज के, आधुनिक साहित्यकार की-सी पूरी तड़प और वेदना के बीच, एक तटस्थ यथार्थवादी दृष्टि है. उसका यथार्थवाद निर्मम है. मुक्तिबोध और निराला, अपने भिन्न संस्कारों के अस्त-व्यस्त परिवेश में, उसको कुछ-न-कुछ  प्रतिबिंबित करते हैं. निराला का यह प्रिय शेर था - 

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ायल
जब आँख ही से न टपका तो फ़िर लहू क्या है.

क्या ताज्जुब है जो उसके युग ने उसको नहीं पहचाना.

लोगों ने सही कहा है कि जो शख्स एक अरसे से अंग्रेज़ी अमलदारी और क़ानून-व्यवस्था और नीतियों को निकट से और विचारपूर्ण दृष्टि से देखता आ रहा हो, जो कलकत्ते के वातावरण को भी खासी-अच्छी तरह सूंघ आया हो, वह जीविका के लिए मुग़ल दरबार से बँधा रहकर भी, अपनी चेतना में पिछले युग से कभी जुड़ा हुआ नहीं रह सकता. इस अर्थ में ग़ालिब अपने युग में अकेला था.

कुछ जैसे निराला को रवीन्द्रनाथ से होड़-सी रही, ग़ालिब भी पूर्ववर्ती उस्तादों की श्रेणी में सगर्व अपने को रखता था. 

शायद एक चीज़ जो स्थायी है वह कला है - और वह है ग़ालिब के लिए ग़ालिब की अपनी कला. इस कला में मर्म में स्थित कवि पूर्णतया आश्वस्त निर्द्वंद और अमर-सा दिखता है. कम-से-कम स्वयं को, अपनी दृष्टि में. ..... और बहुत बाद में हमको भी वह वैसा ही दिखता है.

ग़ालिब का सूफी भाव सूफियों की परम्परा से एकदम भिन्न और मात्र उसका एकदम अपनी ही मालूम होता है. अगर ग़ालिब के सूफी-भाव की स्थिति का विश्लेषण किया जाए तो वह शायराना रिवायत क़तई न होते हुए भी, कहीं अनीश्वरवादी और कुछ-कुछ अस्तित्ववादी सूफीवाद निकलेगा. यह परिभाषिकता आधुनिक है. 

अपनी कला पर ग़ालिब का कितना दृढ़ विश्वास है. अपने सर्वोपरि होने से उसे किंचित भी सन्देह नहीं. देखिये, उसका सेहरा देखिए. उसकी फ़ारसी ग़ज़ल, जिसमें उसने भविष्यवाणी की है कि आगामी युगों में ही उसकी पहचान हो सकेगी, हालांकि तब बहुत से मूर्ख भी उसको समझने-समझाने का दावा करेंगे. अपने समकालीन विद्वान् मौलाना आजुर्दा को वह तमककर कहता है - अगलों के गुणगान करते तुम नहीं थकते, मगर तुम्हारी आँखों के सामने जो महाकवि बैठा अपनी अमर रचना सुना रहा है, उसको पहचानने की शक्ति नहीं रखते, कितने आश्चर्य की बात है!

मुझे लगता है कि ग़ालिब की दिलचस्पी किसी भी प्रकार के आदर्शवाद में नहीं थी, थी तो केवल इन्सान में. उसके विडम्बनापूर्ण मगर हौसलेमंद जीवंत नाटक में. और इसलिए कि आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसां होना!

यह कम कौतुक की बात नहीं कि हिन्दी-संसार में ग़ालिब के लिए अलग ही खाना है और शेष उर्दू के लिए अलग. जहाँ उर्दू से बिलगाव की भावना है, ग़ालिब से नहीं. इतने दुरूह कवि होते हुए भी ग़ालिब हिन्दी पाठकों के अपने हो गये. ऐसा क्यों है? इसका जवाब देना आसान नहीं है.


(गद्य-खंड शमशेर बहादुर सिंह की "कुछ और गद्य-रचनाएँ" से. ग़ालिब पर इस तेवर और इस स्वाद की टिप्पणी सिर्फ शमशेर के यहाँ मुमकिन मालूम होती है.)

गुरुवार, 22 सितंबर 2011

मंगलेश डबराल की कविताएँ


[मंगलेश डबराल की संगीत से जुड़ी स्मृति उनके व्यक्तित्व जितनी सरल और उनकी कविता जितनी विस्मयकारी है. संगीत की स्मृति को हम कभी जज़्ब नहीं कर पाते हैं, लेकिन संगीत की स्मृति का प्राकृतिक अनुवाद केवल मंगलेश डबराल के पास होता आया है. किसी राग की स्मृति को वे संगीतकार को सुनने की याद से देखते हैं, जिससे उस राग के सभी आयाम अपने समूचे उपलब्ध ब्रह्माण्ड में फैलते है. किसी भी राग के अस्तित्व को दर्शाता यह वाक्य सबसे अनूठा है कि "ज़्यादातर लोग यमन का शरीर ही गाते रहते हैं", यमन अति-साधारण रागों की सूची से आता है, लेकिन इसे गाने को लेकर लोगों का अनमनापन इसे इसकी 'साधारण-सूची' से भी लगभग निष्कासित कर देता है और कुछ इसी तरह वे राग मारवा के लिए भी लिखते हैं और इसकी नीरसता के लिए मारवा का दुःख-पंथी होना बताते हैं - "लोगों को अब यह राग ज़्यादा रास नहीं आता/ कोई व्यर्थ के दुःख में नहीं पड़ना चाहता". मंगलेश डबराल के यहाँ राग शुद्ध कल्याण किसी स्थापत्य का हिस्सा है और हर बार जन्म लेता है. जिन रागों का ज़िक्र वे अपनी कविता में करते हैं, वे अकसर निलंबित राग होते हैं - ख़याल गायकी से उन रागों का लगभग निष्कासन हो चुका होता है क्योंकि वे राग अपने स्वरूप में इतने सरल होते हैं कि वहाँ पर दूसरे कठिन रागों का अतिक्रमण हो जाता है. इसीलिए अपनी कविता 'प्रतिकार' में वे लिखते हैं : 

जो कुछ भी था जहाँ-तहाँ हर तरफ़ 
शोर की तरह लिखा हुआ
उसे ही लिखता मैं
संगीत की तरह.

मंगलेश डबराल जैसे मूर्धन्य का हमारे पास होना हमेशा हमें समृद्ध करता आया है. बुद्धू-बक्सा पर उनकी संगीत से जुड़ी रचनाएं आगे भी प्रकाशित की जाएँगी. बुद्धू-बक्सा मंगलेश डबराल का आभारी रहेगा.]



राग दुर्गा                                            
(भीमसेन जोशी के गाये इस राग को सुनने की एक स्मृति)

एक रास्ता उस सभ्यता तक जाता था
जगह-जगह चमकते दिखते थे उसके पत्थर
जंगल में घास काटती स्त्रियों के गीत पानी की तरह
बहकर आ रहे थे
किसी चट्टान के नीचे बैठी चिड़िया
अचानक अपनी आवाज़ से चौंका जाती थी
दूर कोई लड़का बांसुरी पर बजाता था वैसे ही स्वर
एक पेड़ कोने में सिहरता खड़ा था
कमरे में थे मेरे पिता
अपनी युवावस्था में गाते सखि मोरी रूम-झूम
कहते इसे गाने से जल्दी बढ़ती है घास

सरलता से व्यक्त होता रहा एक कठिन जीवन
वहाँ छोटे-छोटे आकार थे
बच्चों के बनाए हुए खेल-खिलौने घर-द्वार
आँखों जैसी खिड़कियाँ
मैंने उनके भीतर जाने की कोशिश की
देर तक उस संगीत में खोजता रहा कुछ
जैसे वह संगीत भी कुछ खोजता था अपने से बाहर
किसी को पुकारता किसी आलिंगन के लिए बढ़ता
बीच-बीच में घुमड़ता उठता था हारमोनियम
तबले के भीतर से आती थी पृथ्वी की आवाज़

वह राग दुर्गा थे यह मुझे बाद में पता चला
जब सब कुछ कठोर था और सरलता नहीं थी
जब आखिरी पेड़ भी ओझल होने को था
और मैं जगह-जगह भटकता था सोचता हुआ वह क्या था
जिसकी याद नहीं आयी
जिसके न होने की पीड़ा नहीं हुई
तभी सुनाई दिया मुझे राग दुर्गा
सभ्यता के अवशेष की तरह तैरता हुआ
मैं बढ़ा उसकी ओर
उसका आरोह घास की तरह उठता जाता था
अवरोह बहता आता था पानी की तरह.



राग मारवा                                            
(अमीर खां और पन्नालाल घोष को सुनने की स्मृति)

बहुत दूर किसी जीवन से निकल कर आती है 
राग मारवा की आवाज़ 
उसे अमीर खां गाते हैं अपने अकेलेपन में 
या पन्नालाल घोष बजाते हैं
किसी चरवाहे की-सी अपनी लम्बी पुरानी बांसुरी पर
वह तुम्हारे आसपास एक-एक चीज़ को छूता हुआ बढ़ता है
उसके भीतर जाता है उसी का रूप ले लेता है
देर तक उठता एक आलाप धीरे-धीरे एकालाप बन जाता है
एक भाषा अपने शब्द खोजने के लिए फड़फड़ाती है
एक बांसुरी के छेद गिरते-पिघलते बहते जाते हैं
उसमें मिठास है या अवसाद
यह इस पर निर्भर है कि सुनते हुए तुम उसमें क्या खोजते हो

मारवा संधि-प्रकाश का राग है 
जब दिन जाता हुआ होता है और रात आती हुई होती है 
जब दोनों मिलते हैं कुछ देर के लिए 
वह अंत और आरम्भ के बीच का धुंधलका है 
जन्म और मृत्यु के मिलने की जगह
प्रकाश और अन्धकार के गडूड-मडूड चेहरे 
देर तक काँपता एक विकल हाथ ओझल हो रहा है
एक आँसू गिरते-गिरते रुक गया है
कहते हैं मारवा को किसी आकार में समेटना कठिन है
वह पिघलता रहता है दूसरे रागों में घुल जाता है
उसमें उपज और विस्तार पैदा करना भी आसान नहीं
उसके लिए भीतर वैसी ही कोई बेचैनी वैसा ही कोई विराग चाहिए
तुम उसे पार्श्व-संगीत की तरह भी नहीं सुन सकते 
क्योंकि तब वह सुस्त और बेस्वाद हो जाता है
गायक-वादक सब जानते हैं 
लोगों को अब यह राग ज़्यादा रास नहीं आता
कोई व्यर्थ के दुःख में नहीं पड़ना चाहता
इन दिनों लोग अपने ही सुख से लदे हुए मिलते हैं

फ़िर भी भूले-भटके सुनाई दे जाता है 
रेडियो या किसी घिसे हुए रेकॉर्ड से फूटता शाम के रंग का मारवा 
अमीर खां की आवाज़ में फैलता हुआ
या पन्नालाल घोष की बांसुरी पर उड़ता हुआ
आकार पाने के लिए तड़पता हुआ एक अमूर्तन
एक अलौकिकता जो मामूली चीज़ों में निवास करना चाहती है 
पीछे छूटे हुए लोगों का एक गीत
जो हमेशा पीछे से आता सुनाई देता है 
और जब कोई उसे सुनता न हो और कोई उसे 
गाता-बजाता न हो तब भी वह गूंजता रहता है
अपने ही धीमे प्रकाश में कांपता हुआ मारवा.


राग शुद्ध कल्याण                                     
(भीमसेन जोशी को सुनने के बाद)

एक मिठास जो जीवन में कम होती जा रही है
अकसर शुद्ध कल्याण में मिलती है
उसका साफ़ मीठा पानी चमकता रहता है
उसकी छोटी-बड़ी नदियाँ जगह-जगह फैली हैं 
उसका ज्वार चंद्रमा को गोद में ले लेता है
उतरती हुई उसकी लहरें बहुत नीचे चली जाती हैं
पृथ्वी के गर्भजल तक
और तुम जब इस पृथ्वी की सतह पर निरर्थक डोलते हो
लकड़ी पत्थर घासफूस और कुछ टूटी-फूटी चीज़ों की तरह
तो वह तुम्हें हल्का और तरल बनाता हुआ अपने साथ ले जाता है 
किसी स्थापत्य का हिस्सा बनने के लिए

अपनी कल्पना के यथार्थ में हर संगीतकार
इस राग को कई तरह से रचता आया है 
जैसे बार-बार अपनी ही सुन्दरता को प्रकाशित करता हो 
बारीक़ी से उसे तराशता हुआ 
जब तक एक-एक स्वर की कला समूचे राग की कला न हो जाये
स्वरों के स्थापत्य में चमक उठता है एक-एक स्थापत्य स्वर 
और तब बहुत प्राचीन होते हुए भी वह इतना नया लगता है 
जैसे उसका जन्म पहली बार हो रहा हो
हर संगीतकार उसकी पूर्णता तक पहुँचने से पहले ही लौट आता है
दूसरी आवाज़ों के लिए उसे छोड़ता हुआ 

शुद्ध कल्याण सुनते हुए तुम उसके आर-पार देख़ सकते हो
तुम्हारे अपने ही स्वर उसमें गूंजते हैं 
भले ही तुमने उन्हें पहले कभी न सुना हो 
और तुम उन्हें अकेले भी नहीं सुन रहे हो 
कोई तुम्हारे साथ है तुम्हारे भीतर 
तुम्हारा कोई अंश जो सहसा तुम्हें पहली बार दिखाई दिया है 
स्वरों की एक बौछार बार-बार तुम्हें भिगो देती है 
वह तुम्हारा सारा कलुष धो रही है
ऐसे ही किसी क्षण में तुम उसे गा उठते हो
क्योंकि उसमें इतनी कोमलता है
क्योंकि तुम ख़ुद उस कोमलता के बहुत पास पहुँच चुके हो
कि उसे गाये बिना नहीं रह सकते 
अपनी किसी व्यथा किसी वासना में
चन्द्रमा तक अपनी आवाज़ उठाने की कोशिश करते हुए 
आधी-अधूरी वह जैसी भी हो वही है जीवन की बची हुई मिठास.


शुक्रवार, 9 सितंबर 2011

गोरख के पाँच


[गोरख एक जन बुद्धिजीवी थे, आर्गेनिक इंटलेक्चुवल और इसी पारिभाषिक शब्द के वजन पर वह जन-कवि थे. दोनों छोरों की शक्तियों से लैस और आत्महंता हद तक संवेदनशील, प्रतिबद्ध. अपने समय के अधुनातम दर्शन अस्तित्ववाद से जूझना एक तरफ,  दूसरी ओर मार्क्सवादी सिद्धांतों को जीवनानुभव से जोड़ना. उर्दू-संस्कृत के काव्यशास्त्र की गहरी समझ से लैस और लोकगीतों की लय में रमे हुए. गोरख आधुनिक हिन्दी के उन विरल कवियों में  हैं जिनकी  कविताओं का लोकगीत बन जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ. (मूलतः शमशेर जी का विश्लेषण है यह!) गहरी सम-वेदना का ज्ञान गोरख की कविता को करुणा के पारस में बदल देता है. इस करुणा के साथ ही विकसित होती है प्रतिबद्धता. कोई अलग से थोपी हुई  नहीं. यह संवेदन से विचारधारा तक पहुंचने का रास्ता है. गोरख के ही शब्दों में- 'तुम्हारी आँखें हैं/तकलीफ का उमड़ता हुआ समंदर/ जितनी जल्दी हो सके  इस दुनिया को बदल देना चाहिए.’ केदार जी की ‘उसका हाथ अपने हाथ में लेते हुए मैंने सोचा/ दुनिया को इस हाथ की तरह गरम और सुन्दर होना चाहिए’ जैसी कविता पर गोरख की कविता भारी पड़ती है क्योंकि वह कर्म-सौंदर्य से दीप्त है. यह एक्टिव और पैसिव का अंतर है. - मृत्युंजय]



समझदारों का गीत

हवा का रुख कैसा है,हम समझते हैं
हम उसे पीठ क्यों दे देते हैं,हम समझते हैं
हम समझते हैं ख़ून का मतलब
पैसे की कीमत हम समझते हैं
क्या है पक्ष में विपक्ष में क्या है,हम समझते हैं
हम इतना समझते हैं
कि समझने से डरते हैं और चुप रहते हैं।


चुप्पी का मतलब भी हम समझते हैं
बोलते हैं तो सोच-समझकर बोलते हैं हम
हम बोलने की आजादी का
मतलब समझते हैं
टुटपुंजिया नौकरी के लिये
आज़ादी बेचने का मतलब हम समझते हैं
मगर हम क्या कर सकते हैं
अगर बेरोज़गारी अन्याय से
तेज़ दर से बढ़ रही है
हम आज़ादी और बेरोज़गारी दोनों के
ख़तरे समझते हैं
हम ख़तरों से बाल-बाल बच जाते हैं
हम समझते हैं
हम क्योंबच जाते हैं,यह भी हम समझते हैं।


हम ईश्वर से दुखी रहते हैं अगर वह
सिर्फ़ कल्पना नहीं है
हम सरकार से दुखी रहते हैं
कि समझती क्यों नहीं
हम जनता से दुखी रहते हैं
कि भेड़ियाधसान होती है।


हम सारी दुनिया के दुख से दुखी रहते हैं
हम समझते हैं
मगर हम कितना दुखी रहते हैं यह भी
हम समझते हैं
यहां विरोध ही बाजिब क़दम है
हम समझते हैं
हम क़दम-क़दम पर समझौते करते हैं
हम समझते हैं
हम समझौते के लिये तर्क गढ़ते हैं
हर तर्क गोल-मटोल भाषा में
पेश करते हैं,हम समझते हैं
हम इस गोल-मटोल भाषा का तर्क भी
समझते हैं।


वैसे हम अपने को किसी से कम
नहीं समझते हैं
हर स्याह को सफे़द और
सफ़ेद को स्याह कर सकते हैं
हम चाय की प्यालियों में
तूफ़ान खड़ा कर सकते हैं
करने को तो हम क्रांति भी कर सकते हैं
अगर सरकार कमज़ोर हो
और जनता समझदार
लेकिन हम समझते हैं
कि हम कुछ नहीं कर सकते हैं
हम क्यों कुछ नहीं कर सकते हैं
यह भी हम समझते हैं।



बंद खिड़कियों से टकराकर

घर-घर में दीवारें हैं
दीवारों में बंद खिड़कियाँ हैं
बंद खिड़कियों से टकराकर अपना सर
लहूलुहान गिर पड़ी है वह

नई बहू है, घर की लक्ष्मी है
इनके सपनों की रानी है
कुल की इज्ज़त है
आधी दुनिया है
जहाँ अर्चना होती उसकी
वहाँ देवता रमते हैं
वह सीता है, सावित्री है
वह जननी है
स्वर्गादपि गरीयसी है

लेकिन बंद खिड़कियों से टकराकर
अपना सर
लहूलुहान गिर पड़ी है वह

कानूनन समान है
वह स्वतंत्र भी है
बड़े-बड़ों क़ी नज़रों में तो
धन का एक यन्त्र भी है
भूल रहे हैं वे
सबके ऊपर वह मनुष्य है

उसे चहिए प्यार
चहिए खुली हवा
लेकिन बंद खिड़कियों से टकराकर
अपना सर
लहूलुहान गिर पड़ी है वह

चाह रही है वह जीना
लेकिन घुट-घुट कर मरना भी
क्या जीना ?

घर-घर में शमशान-घाट है
घर-घर में फाँसी-घर है, घर-घर में दीवारें हैं
दीवारों से टकराकर
गिरती है वह

गिरती है आधी दुनिया
सारी मनुष्यता गिरती है

हम जो ज़िंदा हैं
हम सब अपराधी हैं
हम दण्डित हैं ।



फूल और उम्मीद

हमारी यादों में छटपटाते हैं
कारीगर के कटे हाथ
सच पर कटी ज़ुबानें चीखती हैं हमारी यादों में
हमारी यादों में तड़पता है
दीवारों में चिना हुआ
प्यार।

अत्याचारी के साथ लगातार
होने वाली मुठभेड़ों से
भरे हैं हमारे अनुभव।

यहीं पर
एक बूढ़ा माली
हमारे मृत्युग्रस्त सपनों में
फूल और उम्मीद
रख जाता है।



समाजवाद

समाजवाद बबुआ, धीरे-धीरे आई
समाजवाद उनके धीरे-धीरे आई

हाथी से आई, घोड़ा से आई
अँगरेजी बाजा बजाई, समाजवाद...

नोटवा से आई, बोटवा से आई
बिड़ला के घर में समाई, समाजवाद...

गाँधी से आई, आँधी से आई
टुटही मड़इयो उड़ाई, समाजवाद...

काँगरेस से आई, जनता से आई
झंडा से बदली हो आई, समाजवाद...

डालर से आई, रूबल से आई
देसवा के बान्हे धराई, समाजवाद...

वादा से आई, लबादा से आई
जनता के कुरसी बनाई, समाजवाद...

लाठी से आई, गोली से आई
लेकिन अंहिसा कहाई, समाजवाद...

महंगी ले आई, ग़रीबी ले आई
केतनो मजूरा कमाई, समाजवाद...

छोटका का छोटहन, बड़का का बड़हन
बखरा बराबर लगाई, समाजवाद...

परसों ले आई, बरसों ले आई
हरदम अकासे तकाई, समाजवाद...

धीरे-धीरे आई, चुपे-चुपे आई
अँखियन पर परदा लगाई

समाजवाद बबुआ, धीरे-धीरे आई
समाजवाद उनके धीरे-धीरे आई



एक झीना-सा परदा था

एक झीना-सा परदा था, परदा उठा
सामने थी दरख़्तों की लहराती हरियालियाँ
झील में चाँद कश्ती चलाता हुआ
और ख़ुशबू की बाँहों में लिपटे हुए फूल ही फूल थे

फिर तो सलमों-सितारों की साड़ी पहन
गोरी परियाँ कहीं से उतरने लगीं
उनकी पाजेब झन-झन झनकने लगी
हम बहकने लगे

अपनी नज़रें नज़ारों में खोने लगीं
चाँदनी उँगलियों के पोरों पे खुलने लगी
उनके होठ, अपने होठों में घुलने लगे
और पाजेब झन-झन झनकती रही
हम पीते रहे और बहकते रहे
जब तलक हल तरफ़ बेख़ुदी छा गई

हम न थे, तुम न थे
एक नग़मा था पहलू में बजता हुआ
एक दरिया था सहरा में उमड़ा हुआ
बेख़ुदी थी कि अपने में डूबी हुई

एक परदा था झीना-सा, परदा गिरा
और आँखें खुलीं...
ख़ुद के सूखे हलक में कसक-सी उठी
प्यास ज़ोरों से महसूस होने लगी.

(इससे पहले धूमिल. साथ की कला-कृति 'द स्क्रीम' एद्वार्द मुंक की है.)

सोमवार, 15 अगस्त 2011

आयोजन - २ : शताब्दी-स्मरण - शमशेर





हृदय में भरकर तुम्हारी साँस-
किस तरह गाता,
(ओ विभूति परंपरा की!)
समझ भी पाता तुम्हें यदि मैं कि जितना चाहता हूँ,
महाकवि मेरे !

(पंक्तियाँ 'निराला के प्रति' से)






इस बार डी.डी. भारती द्वारा आयोजित शताब्दी-स्मरण के शमशेर अंक(वाराणसी) की रिपोर्ट आपके सामने है. तारीख़ : 30 जुलाई और जगह : शहर का अकेला रंगमंच थिएटर - नागरी नाटक मंडली, समय : शाम 5:30. तयशुदा समय से कार्यक्रम शुरू हो गया है. अभी तो आरंभिक औपचारिकताएं हैं, मसलन - दीप प्रज्ज्वलन, माल्यार्पण... अब मंच पर मंगलेश डबराल, ज्ञानेंद्रपति, व्योमेश शुक्ल और काशीनाथ सिंह मौजूद हैं. संचालन का जिम्मा व्योमेश शुक्ल के कन्धों पर है. आगे छपे वक्तव्य रचनाकारों के अपने वक्तव्यों के अंश हैं, इन्हें शत-प्रतिशत जेनुइन रखा गया है.


{अब व्योमेश शुक्ल हैं.}

व्योमेश शुक्ल                                                                                       
शमशेर बहादुर सिंह, तमाम आलोचकीय प्रयत्नों के बाद भी हिन्दी के सबसे कम समझे गये कवियों में से हैं. शमशेर की कविता में किसी को वैष्णव किस्म के लीलाभाव के दर्शन होते हैं, उनकी कविता की ऐंद्रिकता पर कोई बड़े सामंती ढंग से रीझने पर आमादा है, उस पर मुग्ध होने वालों की एक बड़ी कतार है, यही हमारे सर्वोत्तम आलोचकों की सीमाएं हैं.

शमशेर की कविता उस तरह से हाथ में नहीं आती, वह अग्रगामी है, उपलब्ध से अलग जाती है और दूर तक चली जाती है. शमशेर की कविताओं में युगीन सुविधाओं के इन्कार और कठिन के रतजगे हैं, वह मौन, संगीत और नूर की कविता है. ऐसी कविता की शक्तियों और सीमाओं को, उसकी प्रक्रियाओं को, उसके भीतर बन रहे समीकरणों को उतार पाना, उसका नामकरण कर पाना, बहुत दुश्वार और challenging है.

शमशेर की कविता को शमशेर की अपराजेय मनुष्यता से जोड़कर देखने का भी हिन्दी में एक तरह से अभाव है. वह दृष्टि जो शमशेर के मनुष्य से शमशेर के कवि को जोड़कर देख़ पाती,  हिन्दी में वह वर्चस्वशाली दृष्टि तो नहीं ही बन पायी है.

शमशेर के यहाँ मौजूद भाषा के झमेले और कविता के कॉमनसेंस से टकराने वाला विवेक, या कह लें विमुखता, उन्हें और कठिन कर देते हैं. शमशेर का उत्तराधिकार, अंततः जटिलता का उत्तराधिकार है.
****
{अब हमारे प्रिय कवि मंगलेश डबराल सामने हैं.}

मंगलेश डबराल                                                                                      
"लौट आ ओ फूल की पंखुड़ी
फ़िर फूल पर लग जा"
मेरी समझ से फूल की सम्पूर्णता ही इस कविता का अर्थ है. एक फूल की पंखुड़ी उससे बिछुड़कर उसे अपूर्ण कर दे रही है, पंखुड़ी से फ़िर आ लगने के लिए कहना, दरअसल सौन्दर्य की सृष्टि की सम्पूर्णता के लिए आग्रह करना है.

शमशेर की कविता में इस तरह के सन्दर्भ बहुत सारे हैं जहाँ कई अपूर्ण चीज़ें मिलकर एक पूर्ण चीज़ की रचना करती हैं, तो इस पूर्णता के कवि शमशेर हैं और ये पूर्णता असल में शमशेर को सौन्दर्य और प्रेम से लेकर मजदूरों तक, उनके श्रम तक, संघर्षों और क्रांतियों तक ले जाती रही है. शमशेर की कविता अमूर्त से मूर्त की ओर जाती है और इन दोनों में आवाजाही करती है, इन दोनों को शायद हम अलग-अलग नहीं कर सकते और यहीं पर शायद उन्हें समझने की समस्यामूलकता सामने आती है.

शमशेर ने (रघुवीर सहाय से) कहा था कि मैं एक कवि में तीन चीज़ें आवश्यक मानता हूँ, प्राणवायु, मार्क्सिज़म और आवाम में एक कवि की छवि यानी वह छवि जो कवि एक आवाम में देखना चाहता है, और शायद ये तीनों चीज़ें शमशेर की कविता में अंत तक मौजूद रही हैं.

आज जिन कवियों की जन्मशती हम मना रहे हैं, उनमें शमशेर का 'कैचमेंट एरिया' - नदी का जलागम क्षेत्र - सबसे बड़ा है और यह विशालता ही 'अम्न का राग' जैसी कविता को विश्व-शान्ति की सबसे बड़ी कविता बनाती है.

शमशेर को 'कवियों का कवि' कहा गया है, लेकिन शमशेर की कविता में बहुत कम 'काव्यात्मकता' है. 'काव्यात्मक' कविता शमशेर नहीं लिखते हैं, वे 'संवेदनात्मक' कविता लिखते हैं. कवि दो तरह के होते हैं - काव्यात्मक और ग़ैर-काव्यात्मक, अज्ञेय काव्यात्मक हैं और शमशेर ग़ैर-काव्यात्मक, लेकिन इसके उलट मान लिया गया है. अज्ञेय का शब्द-चयन और काव्य-शिल्प बेहद सधा हुआ है, इसके उलट शमशेर का शिल्प बहुत ऊबड़-खाबड़ और रूखा है, हालांकि वे सौन्दर्य के महान कवि हैं, फ़िर भी शिल्प में बहुत तराश नहीं है. उनकी कविता में अचानक ही उर्दू के शब्द, वैदिक शब्द, फ़ारसी के शब्द और तद्भव/ बोली के शब्द मिलते रहते हैं.

भाववाद और भौतिकवाद की द्वंदात्मकता शमशेर में हमेशा मौजूद रही है. आलोचक पंकज चतुर्वेदी के हिसाब से शमशेर के यहाँ प्रकृति एक भिन्न सत्ता है, नागार्जुन, अज्ञेय, केदारनाथ अग्रवाल के यहाँ की प्रकृति से बिलकुल अलग. शमशेर के यहाँ प्रकृति मनुष्य को अलग रखकर बात नहीं करती, वहाँ मनुष्य की उपस्थिति अनिवार्य है.

जिस तरह 'आकाश' और 'समुद्र' शमशेर की कविता में बार-बार आते हैं, उसी तरह शमशेर आकाश और समुद्र की तरह हिन्दी कविता में हमेशा बने रहेंगे.
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{एक छोटे-से संचालन-वक्तव्य के बाद कवि ज्ञानेंद्रपति सामने हैं.}

ज्ञानेंद्रपति                                                                                             
रामविलास शर्मा नें कहा है कि शमशेर की कविता में वही मूल्यवान है, जो पद्य नहीं है, गद्य है...वह चाहे उनके निबंधों में हो, या कविताओं में.

शमशेर की कविता में गद्य का जो विन्यास है, वह कई दफ़ा प्द्याभ्यासी और अपने को मंचीय कविता में डाल चुके लोगों को मुश्किल में डालता है.

मुक्तिबोध नें कहा है कि शमशेर ने चित्रकार के सिंहासन पर अपने कवि को प्रतिष्ठित कर लिया है. कविता शब्दों में नहीं लिखी जाती है, वह वाक्यों में लिखी जाती है, लेकिन शमशेर के चित्रकार के कवि को क्रिया-पदों की ज़रूरत नहीं रह जाती - जैसा शमशेर के गद्य में होता है - और कविता वाक्यों में नहीं शब्दों में लिखी जाती है फ़िर शब्दों के बीच के अंतराल में शब्द फैलते हैं. शब्दों का सजीवीकरण जितना शमशेर के यहाँ है, उतना हिन्दी कविता में और किसी के पास नहीं है. शमशेर की कविता 'सुबह' के पत्थर की तरह शमशेर के यहाँ शब्द पसरते हैं, अपने आप. शमशेर शब्दों पर नहीं, उनके अंतरालों पर रुकते हैं और यहीं पर उन्हें समझने की समस्या उत्पन्न होती है. इसी समस्यामूलकता को हिन्दी में 'शमशेरियत' नाम दिया गया है. यह शब्द 'शमशेरियत' ही बताता है कि शमशेर का जो भाषिक-व्यवहार और काव्य-विवेक है, वह कितना ख़ास है.

विजयदेवनारायण साही कहते हैं कि 'शमशेर के यहाँ वस्तुपरकता की आत्मपरकता और आत्मपरकता की वस्तुपरकता है'. यह एक तरह से शमशेर की द्वंदात्मक काव्य-दृष्टि से सम्बन्ध है. शमशेर की कविता का द्वन्द, शमशेर के भीतर का द्वन्द है.

सौन्दर्य शमशेर की केन्द्रीय चिंता है, यह सौन्दर्य केवल प्राकृतिक सौन्दर्य नहीं है, सामाजिक सौन्दर्य भी है. शमशेर के सौन्दर्य का अवतार, प्राकृतिक घटना नहीं है, वहाँ मानव की उपस्थिति भी अनिवार्य है. शमशेर का कवि तो सौन्दर्य अभिलाषी है, लेकिन उसका धरातल क्या है? उसकी चाहत क्या है? उसका धरातल सौन्दर्य को 'देखना' है, उसका observation कवि का धरातल है. उस सौन्दर्य-चेतना के पीछे आभार के रूप में जो प्रेम की भावना है वह मूल्यवान है.

'एक आदमी दो पहाड़ों को अपनी कुहनियों से ठेलता हुआ' जैसे बिम्ब अत्यंत भव्य हैं. हालांकि, भव्य बिम्ब की रचना करना महत्वपूर्ण कवि-कर्म है, लेकिन इस तरह के द्वंदात्मक, दुरूह और भव्य बिम्ब कहीं और नहीं मिलते.

शमशेर की कविता में रूपक नहीं हैं, वहाँ रूप के भाव हैं.

अपनी कविता 'निराला के प्रति' में शमशेर जिस तरह निराला को चाहते हैं, उसी तरह हम शमशेर को बहुत चाहते हैं, समझना तो एक अलग बात है.
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{सभागार में मौजूद धैर्यहीन दर्शक-दीर्घा से कुसमय बजी ताली ने ज्ञानेन्द्रपति को बीच में ही अपनी बात रोकने को कह दिया.}

काशीनाथ सिंह                                                                                      

{मूल बिन्दुओं और तथ्यों पर बात करने से पहले काशीनाथ सिंह ने अपने द्वारा शमशेर को 'तीन बार देख़े जाने' के बारे में बता रहे हैं, जिसका ज़िक्र यहाँ शायद ज़रूरी नहीं है.}

'प्लाट का मोर्चा' की भूमिका 'पाठकों से' में शमशेर नें तीन बातें कही हैं. पहली बात, इस संग्रह में 'जी की बात सी करने' की कोशिश की है, हम जानते हैं - कहानी वाले - कि कहानी में जी की बात सी करने की गुंजाइश बहुत कम होती है, कविता में तो होती है. दूसरी बात, ये कि यह संग्रह कुल मिलाकर प्रगतिशील नहीं है....इतना ही होता तो गनीमत है.....आगे शमशेर नें लिखा है कि कुछ लोग जो मुझे प्रगतिशील समझते हैं, वे अपनी राय को संशोधित कर लें. और, इस बात से शमशेर और प्रगतिशीलता के सम्बन्ध को नये सिरे से समझने में मदद मिल सकती है. अब तीसरी बात, छायावादी युग के अंत का व्यक्तित्व बोल रहा है.

एक बार मैनें नामवर सिंह जी से पूछा कि अभी जिन कवियों की जन्मशती मनाई जा रही है, उन्हें आप एक क्रम दीजिये! तो नामवर जी नें जो क्रम दिया उसमें उन्होंने पहले अज्ञेय, फ़िर शमशेर, नागार्जुन और फ़िर केदारनाथ अग्रवाल को रखा.

ज़ाहिर है कि कहानियां कहने की चीज़ हैं, रचने की नहीं. शमशेर नें कहानियां रची हैं, कही नहीं, एक संपन्न भाषा होते हुए भी. शमशेर की सभी कहानियों में एक बात लगभग समान दिखाई देती है, वह है अकेलापन और उपेक्षित रह जाने का भाव.

शमशेर एक प्रगतिशील कवि थे, जो सामाजिकता से लगाव रखते थे. अगर आप शमशेर का गम्भीर व्यक्तित्व और शांतपन देखते तो ये आश्चर्य ज़रूर होता कि उनकी कविताओं के विषय लोक-सांस्कृतिक रहे हैं. उनकी कविता के ये कठिन बिम्ब जब मेरी समझ में नहीं आते, तो आम पाठक की समझ में क्या आयेंगे?
****
{अब कार्यक्रम के सार-संवाद सत्र के समापन पर व्योमेश शुक्ल पुनः आए.}

व्योमेश शुक्ल                                                                                        
नामवर जी की नव-सूची से त्रिलोचन की कविता बेसाख्ता याद आई कि प्रगतिशील कवियों की नई लिस्ट निकली है, उसमे त्रिलोचन का नाम नहीं है. कवियों की एक लिस्ट निकले और उसमें कवि का नाम न हो. तो, जब कोई ऐसी सूची बने, जिसमें अपना कोई सर्वोत्तम कवि न हो, तो यह कितने गौरव और ख़ुशी की बात होगी, क्योंकि कवि अपनी अद्वितीयताओं के साथ किसी सूची में अट नहीं सकते.

****
इसके बाद शमशेर की कविताओं का असफल मंचन और शमशेर पर वृत्तचित्र और उनके दो गीतों की संगीतमय प्रस्तुति की गई.

(इसके पहले आप बहुभाषी रचना पाठ की रिपोर्ट आयोजन स्तम्भ में पढ़ चुके हैं. शमशेर की तस्वीर एक जिद्दी धुन/ सबद से .)

शनिवार, 30 जुलाई 2011

ब्लैक-रिचनेस ऑफ शागिर्द

 
एयर बैग - काला, लाल, भूरा

पैसा - एयर बैग में - 20...40...50 लाख, 10....15....25 करोड़

काले रंग की SUV

हनुमान

हनुमंत - नाना पाटेकर

गोलियां ढेर सारी

भ्रष्टाचार भी ढेर सारा

अनुराग कश्यप - कमज़ोर

तिग्मांशु धूलिया - उससे भी कमज़ोर

'हासिल' - एक अच्छी फ़िल्म और भरोसा रखने के लिए क़ाफ़ी

'शागिर्द' - अधपका आम


कुल मिलाकर तिग्मांशु धूलिया की फ़िल्म शागिर्द देखने के बाद आप यही समझ पाते हैं और फ़िल्म को इन्हीं बातों पर खड़ा पाते हैं. 'हासिल' बहुत सारी चीज़ों का एक सुनियोजित संकलन थी और इसी के बूते पर छात्र राजनीति और प्रेम के क्लैश का विवरण स्पष्ट हो सका. बस, इसी की कमी शागिर्द में है.

अभी के समय से दस साल पहले वाली भ्रष्टाचार और राजनीति आधारित फ़िल्मों की शागिर्द पर बीहड़ छाप है. कारण जो भी हो, लेकिन तिग्मांशु अभी के समय को फ्रेम में नहीं उतार पाए हैं. क्योंकि अजीबोगरीब तरीक़े से हो रही जासूसी और फ़िर अद्भुत कार पलटा देने वाली गोलीबारी न तो इस समय की राजनीति और ना ही फ़िल्मों की पहचान है. अभी की राजनीति में इससे ज़्यादा जटिल भ्रष्टाचार है, लेकिन वह इतना खुला और उधड़ा हुआ तो कतई नहीं है...उसमें कठिनाइयां हैं, लेकिन उनका जो बेसिक स्ट्रक्चर है, वह फ़िल्म में दिखाए गये घुमावदार स्ट्रक्चर से अलग है. 

हनुमंत सिंह(नाना) दिल्ली पुलिस, क्राइम ब्रांच के एक सीनियर इंस्पेक्टर हैं. घोर भ्रष्टाचारी, हाज़िर जवाबी और तुरत-फुरत शक़ करने वाला इंस्पेक्टर. अब आप यहाँ पर भी कुछ नया नहीं देख़ पायेंगे, पूरी फ़िल्म भर हनुमंत सिंह का चरित्र एकदम खांटी 'नाना पाटेकर मूड' को लिए चलता है. 'यशवंत' और 'शागिर्द' के नाना पाटेकर में इतना ही फर्क़ है कि 'यशवंत' में नाना भ्रष्टाचार विरोधी थे लेकिन शागिर्द में नाना ऐसे पुलिसवाले की भूमिका में हैं, जो अपने जूनियर मोहित से यह तक कह देता है कि लूट के पैसे में हिस्सा लो वर्ना इस्तीफ़ा दे दो. हनुमंत 'मेनियाक' है, जो पागलों की तरह पुराने गाने सुनता रहता है और गानों की फ़िल्म के नाम, निर्देशक का नाम, संगीतकार और गीतकार का नाम याद रखता है....लेकिन इस दीवानगी का सबसे नाटकीय पहलू ये है कि वह एनकाउन्टर के ऐन पहले ड्रग डीलर्स के दरवाज़े पर खड़ा होकर उनके टीवी से गाने सुनता है, पत्नी से लड़ाई के दौरान भी और अपनी मौत पर भी वह गाने सुनता रहता है...फ़िर मरता है.

एनकाउन्टर स्पेशलिस्ट की तरह लगने वाले हनुमंत सिंह की टीम में पहले तीन....फ़िर चार लोग हैं. चौथा मोहित है जो अपने किरदार में एक ठेठ फ़िल्मी 'पुलिसिया' कड़कपन और ईमानदारी लेकर आता है जो उसके दोमुंहे रूप के लिए कुछ ठीक लगता है.

फ़िल्म में मोहित का इकतरफा प्यार है, एक हाई-प्रोफाइल जर्नलिस्ट के साथ....अब जर्नलिज़्म की बात जब आती है तब इस फ़िल्म में दिखाई गई 'झटपट पत्रकारिता' की पोल खुली हुई पता चलती है. फ़िल्म में दिखाए गए पत्रकार अव्वल दर्ज़े के बेवकूफ़, आन्दोलन के लिए आमादा और 'न्यूज़-रिच्ड' हैं लेकिन अभी की पत्रकारिता का सत्य क्या है, ये सभी जानते हैं - अभी के पत्रकार 'न्यूज़-हंग्री', तेज़-चालाक और आन्दोलन के लिए समय की प्रतीक्षा करने वाले हैं.

हनुमंत एक मंत्री के लिए काम करता है, जो भविष्य में विदेश-मंत्री बनने वाला है(अगर लाल-रंग सामने न पड़ा तो), मंत्री के किरदार के साथ एकदम सही समझौता हुआ है, सारा कुछ, सारे नुमाइंदे और पैसे की बंदरबांट 'मंत्री' वाले तत्व को सही ठहराते हैं. मंत्री का किरदार सबसे मूल बिन्दु पर जहाँ चूकता है वह है उसका किसी पर भी भरोसा ना करना(हालांकि, ये तो कहानी की मांग है....फ़िर भी), यही भरोसे का अभाव हनुमंत को उसकी 'प्राइवेट ड्यूटी' से भटका देता है...साथ ही साथ यही अभाव चुपके से मोहित को हनुमंत के पिछवाड़े लगा देता है. मंत्री ज़रा-सा और कमज़ोर साबित होता है जब उसके ध्यान राजनीति के बजाय बाक़ी सभी चीज़ों पर होता है.

अप्रत्यक्ष रूप से कहानी जिसके इर्द-गिर्द घूम रही है वह है बंटी भईया(अनुराग कश्यप), जो प्रकाश झा की फ़िल्मों के राजनीतिक गुंडों की तरह लगता है....सीधे-सीधे 'अपहरण' के अजय देवगन की तरह, तो इस तरह से ये फ़िल्म 'प्रकाश झा' से प्रेरित लगती है. बहरहाल, अनुराग कश्यप फ़िल्म के किरदार के किस मूड को कैरी करके चलते हैं, पता नहीं चल पता और इसी के साथ एक बहुत अच्छे निर्देशक की अभिनय-कला की पोल खुल जाती है. बंटी भईया ठेठ गुंडा है, जो मंत्री के लिए काम करता है और अंत में उसी के हाथों मारा जाता है. इस समय में कोई भी गुंडा सिर्फ़ गुंडा नहीं होता है, या तो वह एक नेता, या कोयला व्यापारी नहीं तो फ़िर बहुत बड़ा ठेकेदार होता है, सिर्फ़ गुंडा होना - अगर यू.पी. के सन्दर्भ में ही बात करें तो - 7-8 साल पहले का मुन्ना बजरंगी, विनीत सिंह या त्रिभुवन सिंह होना है. तो, थोड़ा सा रफ़-वर्क अनुराग को करना चाहिए था, अपने अभिनय को लेकर - अगर वे कुछ-कुछ आशुतोष राणा या मनोज बाजपेयी हो जाते तो 'शायद' बात बन जाती.

तीन पत्रकारों का अपहरण(जिनमें मोहित की 'प्रेमिका' भी शामिल है) होता है और बंटी भईया के साथ दो जेहादियों की रिहाई और 15 करोड़, फ़िर 25 करोड़ की मांग की जाती है. कुल मिलाकर कहानी एक कठिन और बेहद नाटकीय रूप ले लेती है और जब ये पता चलता है कि इसके पीछे हनुमंत सिंह था तो उसी क्षण फ़िल्म से रूचि ख़त्म हो जाती है, क्योंकि ऐसे समय में आप ये जान जाते हैं कि आपको सिर्फ़ घुमाया जा रहा है.

आप किस पर शक़ करेंगे, किस बिना पर शक़ करेंगे और फ़िल्म ख़त्म होने के बाद भी, कहानी के बारे में क्या सोचेंगे.....ये तो कहना मुश्किल है...लेकिन इस बार अग़र आप तिग्मांशु धूलिया से नाराज़ होते हैं, तो आप सही हैं. फ़िल्म पर प्रकाश झा, अनुराग कश्यप और कुछ विदेशी फिल्मकारों का प्रभाव साफ़ दिखता है. राजनीति और पुलिस में व्याप्त भ्रष्टाचार अपने मौजूदा लेवल से बहुत ऊंचा है और इसी को दिखाने में फ़िल्म ब्लैकनेस से रिच हो गयी है.

तिग्मांशु....यू हैव टू डू बेटर....