रविवार, 1 मई 2011

बोर्ख़ेस और निर्मल वर्मा

दुनिया, दुर्भाग्यवश, असली है....मैं दुर्भाग्यवश बोर्ख़ेस हूँ...
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एक तरह से यह शोचनीय बात थी - बोर्ख़ेस उन इने-गिने लातिन-अमेरिकी लेखकों में हैं, जिन्होंने अंग्रेजी साहित्य और संस्कृति से बहुत कुछ ग्रहण किया है, जिन्हें सही अर्थों में 'ऐंग्लोफिल' लेखक कहा जा सकता है. अपने में यह दिलचस्प बात है - और हलकी-सी व्यंग्यात्मक भी - कि जो अंग्रेजी लेखक ख़ुद आज अपने देश में पुराने और अपठनीय हो चुके हैं - स्टीवेंसन और चेस्टर्टन - बोर्ख़ेस-जैसे 'आधुनिक' लेखक समय-समय पर उनके प्रति अपना आभार प्रकट करना नहीं भूलते, या शायद यह लन्दन की धुँध है - अदृश्य संकेतों और रहस्यमय खतरों से भरी हुई - जो बोर्ख़ेस को बरबस अपनी ओर खींचती है ? बातचीत के दौरान बोर्ख़ेस ने उन चीज़ों का उल्लेख किया, जो उन्हें शुरू से ही मोहित और आतंकित करती आ रही हैं - धुँध, रात, महानगर. ये 'चीज़ें' एक अजीब ढंग से लातिन-अमेरिकी प्रतीकों से जुड़ी हैं - आईने, भूलभुलैया और चाकू. "चाकू की अपनी एक निजी रहस्यमय ज़िन्दगी है," बोर्ख़ेस ने कहा, "खून और हिंसा की एक ऐसी 'प्राइवेट' लिपि उससे जुड़ी है, जो अनायास हमारे भीतर उनके प्रति सम्मान की भावना जाग्रत करती है." चाकू मानो एक ऐसे सार्वजनिक कर्म को उद्घाटित करता है, जिससे व्यक्तिगत नियति का फैसला होता है. अपनी एक कविता में वे लिखते हैं: .

मैनें अपनी नियति को पा लिया है.
अपनी अन्तिम लातिन-अमेरिकी नियति को.
सख़्त लौह का प्रहार,
मेरी छाती चीरता हुआ.
गले पर,
मेरा अपना पहचाना चाकू.
 
लेकिन 'चाकू' बहुत आत्मीय है, बहुत मांसल, "उससे मुझे डर नहीं लगता," बोर्ख़ेस ने कहा, "डर असल में मुझे आइनों से लगता है - बचपन से मैं उनसे डरता आया हूँ. उन्हें देखकर मुझे एक भयानक अनुभव होता है, जैसे मैं कहीं फंस गया हूँ और बाहर नहीं निकल सकता. आईने को देखकर यह मायावी भ्रम होता है, जैसे कहीं मेरे प्रतिरूप का अस्तित्व है, जैसे हर प्राणी का अपना एक प्रतिरूप है, जिसके कारण हर चीज़ संदिग्ध, अवास्तविक और प्रश्नवाचक बन जाती है."

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स्मृति की समस्या समय से जुड़ी है - और बोर्ख़ेस की लगभग सब कहानियों में समय रेगिस्तान की तरह फैला है - अपनी समस्त मृगतृष्णाओं और मरीचिकाओं के साथ - यथार्थ से अलग नहीं, लेकिन यथार्थ का हिस्सा भी नहीं. वह उस ताश के 'जोकर' की तरह है, जिसे खेल में कुछ भी बनाया जा सकता है, क्योंकि अपने में वह कुछ भी नहीं. जो कुछ भी नहीं, वह सबकुछ हो सकता है. बोर्ख़ेस का समय प्रूस्त का 'घुमावदार' समय नहीं है, जिसके चरमबिन्दु 'अनायास स्मरण' के क्षणों द्वारा आलोकित होते हैं, मानो समूचा अतीत रोशनी के खम्भों द्वारा छोटे-छोटे फासलों में बाँटा जा सकता है. बोर्ख़ेस की दृष्टि में स्मरण करना अपने को धोखा देना है - क्योंकि ऐसी कोई चीज़ नहीं, जिसे हम 'अतीत; कह सकें - या दूसरे शब्दों में अतीत केवल शाश्वत वर्तमान का ही अंश है, जहाँ उसका अलग अस्तित्व अर्थहीन हो जाता है. प्रूस्त की दुनिया 'समानताओं' की दुनिया है, जहाँ एक चीज़ दूसरी चीज़ की याद दिलाती है, जहाँ एक स्मृति प्याज के छिलके की तरह दूसरी स्मृति से बाहर आती है.....इन 'समानताओं' ने ही एक समय बॉदलेयर को इतना त्रस्त किया था. बोर्ख़ेस चूंकि समय को खण्डों में विभाजित नहीं करते, इसलिए इन 'समानताओं' को भी स्वीकार नहीं करते. "एक क्षण दूसरे क्षण के 'समान' नहीं है -  वह हूबहू वही है, जो पहला क्षण था." जब दो क्षण बिलकुल एक जैसे हों, तो समानता का प्रश्न नहीं उठता - जब आने वाला क्षण एकदम वही हो, जो बीतनेवाला क्षण था, तब समय का अस्तित्व ही नष्ट हो जाता है.

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साक्षात कभी होता नहीं है, लेकिन वह कभी भी हो सकता है, यह उम्मीद आख़िर तक बनी रहती है, आख़िर तक बनी रहनी चाहिए. दुनिया के 'सुख' होते नहीं, इस उम्मीद पर 'बनते' हैं. बोर्ख़ेस ने एक जगह कहा है, "संगीत, सुख की स्थितियां, पौराणिक कथाएं, समय से लदे चेहरे, गोधूली के धुंधलके, कुछ स्थान - ये सब हमें कुछ बताना चाहते हैं या इन्होने हमें कुछ बताया था जो हमें ओझल नहीं करना चाहिए था या वे हमें कुछ बताने वाले हैं. साक्षात की यह तात्कालिक संभावना, जो कभी पूरी नहीं होती - ऐसी है, जिससे सौन्दर्य का सृजन होता है."

लातिन-अमेरिकी लेखकों में शायद बोर्ख़ेस ही ऐसे हैं, जो यूरोप की परम्परा की यहूदी परम्परा की यातनाग्रस्त जिज्ञासा के सबसे निकट आते हैं. यह शायद स्वाभाविक भी था. एक एर्जनटीन होने के नाते उन्हें अन्य लातिन-अमेरिकी लेखकों की तरह (जिनमें आक्टोवियो पाज उल्लेखनीय हैं) पीछे मुड़-मुड़कर अपनी इंडियन परम्परा को नहीं खोजना पडा - क्योंकि उनके देश में ऐसी कोई परम्परा थी ही नहीं. वे मुक्त रूप से अपने को यूरोपीय परम्परा से संपृक्त कर सकते थे - क्योंकि उन पर अपने अतीत का कोई बोझ नहीं था - लेकिन 'बाहर के आदमी' होने के नाते उन पर यह बंधन भी नहीं था कि वे उस परम्परा के प्रति वफादार रहें, वे अपने अतीत से मुक्त थे तो यूरोप के बाहर भी थे. मुक्ति का यह एहसास ही है कि वह इतने गौरव और विश्वास के साथ कह सकते हैं:

        "चमत्कार करने की सुविधा से देवता वंचित भले ही रहे हों, लेखक नहीं, लेखक हमेशा अतीत को बदल सकते हैं.....काफ़्का की तरह वे ख़ुद अपने से पहले आनेवालों की रचना कर लेते हैं."


(निर्मल वर्मा के संग्रह "सर्जना पथ के सहयात्री" से लिया गया अंश. इसके पहले बुद्धू-बक्सा पर आप ब्रेख्त पर निर्मल वर्मा को पढ़ चुके हैं.)

4 टिप्पणियाँ:

नीरज बसलियाल ने कहा…

thanks for the post.

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) ने कहा…

इसके लिये शुक्रिया रहेगा...

ravindra vyas ने कहा…

bahut sunder aur marmik!

सागर ने कहा…

I salute you sir