सोमवार, 16 मई 2011

रहमान व मोत्ज़ार्ट के बहाने कुछ बेसुरा-बेताल

गीत चतुर्वेदी


एआर रहमान फिल्मों को ध्यान में रखकर धुनें नहीं बनाते। वे धुनें बनाते रहते हैं, क्योंकि वे किसी भी समय उनके पास आ जाती हैं। उन्हें वे अपने पास सुरक्षित रखते हैं। जब किसी निर्माता या निर्देशक को अपनी फिल्म के लिए धुनों की जरूरत होती है, तो रहमान उसे वे धुनें मेल कर देते हैं। निर्देशक अपनी पसंद की धुनें बता देता है और फिर रहमान उस धुन को अलग-अलग तरीक़ों से विकसित करते हैं। ‘युवराज’ के लिए सुभाष घई ने वैसी ही धुनें मांगी थीं और उन्होंने जो धुनें रिजेक्ट कीं, उन्हें रहमान ने एक दूसरे निर्देशक को भेज दिया। उस दूसरे निर्देशक को एक धुन बहुत पसंद आई। उस पर गाना बनाया गया और उस गाने को ऑस्कंर मिला। वह धुन थी ‘जय हो...’ और निर्देशक थे डैनी बॉयल।

ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं, जिनसे यह देखने में आता है कि अच्छी चीजों को शुरुआत में रिजेक्शन झेलना ही होता है। चाहे वह बड़ा कलाकार हो, या बड़ा वैज्ञानिक, हर कोई शुरू में उपेक्षित रहा और उसका सबसे बड़ा संघर्ष इसी उपेक्षा को खत्म कर अपनी लियाक़त साबित करने का रहा। रहमान के संदर्भ में हमेशा मुझे मोत्जार्ट याद आता है। रहमान एकाध बार रिजेक्ट जरूर हुए हों, पर वह उपेक्षित तो नहीं ही रहे। बचपन में एक समय जब उनके पास म्यूजिक मिक्सर खरीदने के पैसे नहीं थे, तो उनकी मां ने बहनों की शादी के लिए जमा रखे गहने बेचकर उन्हें खरीद दिया। उनकी मां को इतना भरोसा था कि उनका बेटा ऐसे कई गहने खरीद लेगा बाद के बरसों में। उसके बाद रहमान को किसी बड़े आर्थिक संकट से नहीं जूझना पड़ा था। वह पहले पार्ट टाइम और बाद में फुल टाइम कई लोगों के सहायक रहे। संघर्ष व गुमनामी के दिनों में भी उनके पास वे कारें रहीं, जिन्हें दूसरे मध्यवर्गीय लोग अच्छी तनख्वाह और अघा देने वाली फुटकर सफलताओं के बाद हासिल कर गौरवान्वित होते हैं। 'रोजा' के बाद एक भी मौक़ा ऐसा नहीं आया, जब रहमान को ख़ुद को साबित करने की ज़रूरत पड़ी हो। ख़ुद उनका मानना है कि रोजा के पहले और बाद में सिर्फ यह फ़र्क़ आया था कि पहले ज्यादातर लोग मेरी बात को तवज्जो नहीं देते थे, बाद में देने लगे।

जीनियसों के जीवन के संघर्ष एक जैसे नहीं होते, हालात एक जैसे नहीं होते। कोई चीज़ एक जैसी होती है, तो वह है अपनी कला के प्रति समर्पण, पुराने के प्रति प्रेम और नये की खोज का जुनून।

उनकी अपनी सांगीतिक शख्सियत की बुनावट बहुत हद तक पश्चिमी हैं। उनमें जितना पूरब का सूत है, उतना ही पश्चिम का ऊन है। उत्तर का रेशम और दक्षिण की नारियल-जटाएं हैं। वह आज के उन विरले कलाकारों में हैं, जो किसी एक सांस्कृ।तिक जड़ से अपना पोषण नहीं पाते, बल्कि वह एक साथ कई संस्कृकतियों से जीवद्रव्य प्राप्त करते हैं। इसीलिए उनको सुनते हुए जितना केरल के खेत याद आते हैं, उतना ही यूरोप का  शास्त्रीय संगीत।

इसीलिए अगर रहमान से मोत्जार्ट झलकता हो, तो गुरेज नहीं होना चाहिए। हालांकि रहमान को उनके जीते-जी जितनी सफलता मिल गई है, उतनी मोत्जार्ट को मिल गई होती, तो शायद वह ज्यादा जिंदा रहते, और बड़ी रचनाएं करते और हम सिंफनी के पांचवें हिस्से की सुंदरताओं और शास्त्रीयताओं को बेहतर समझ पाते। मोत्जार्ट उन शुरुआती लोगों में से थे, जो सिंफनी के पांचवें चरण पर काम कर रहे थे और उसे लेकर बहुत महत्वाकांक्षी थे, लेकिन गरीबी और छोटी जिंदगी ने उन्हें मोहलत न दी। बाद में कमोबेश बीथोफ़न ने इसमें कुछ जोड़ा।

वह सारी उम्र उन लोगों द्वारा मिली उपेक्षाओं से लड़ते रहे, जो उनके संगीत के नाखून बराबर भी नहीं थे। आज हम यह बात आसानी से कह सकते हैं कि मोत्जार्ट उन सबसे बड़े थे, पर उस जमाने में यह बात बहुत खुलकर नहीं कही जाती थी। उनकी निंदा करने वाले, समय-समय पर उन्हें अपमानों और साजिशों में फंसा देने वालों का पूरा एक गिरोह था। आपका दुश्मन ही सबसे अच्छी तरह जान रहा होता है कि आपमें कितने गुण हैं और आपकी सर्वश्रेष्ठ योग्यता क्या है। उसी हिसाब से वह आपके लिए जाल बुनता है। मोत्जार्ट जीनियस थे। जीनियस को मिला सबसे बड़ा अभिशाप होता है कि वह ताउम्र मिडीयॉकरों से लड़ता रहे। हर युग में ऐसा होता है।

एक समय ऐसा था, जब मोत्जार्ट के संगीत से पहले उनकी हंसी की गूंज लोगों तक पहुंचती थी। जब वह हंसते थे, तो लोग उन पर हंसते थे। वह राजपरिवारों की नफ़ासत भरी हंसी नहीं थी, वह एक उजड्ड उन्मुक्त बचपने की हंसी थी। जीनियस कभी अपने बचपने से बाहर नहीं आ पाता। नफ़ासत और संजीदगी मिडियॉक्रिटी का मुखौटा होते हैं। मोत्जार्ट अपने संगीत में बहुत संजीदा थे। उनके नोट्स में आप एक असफल हरकत खोज सकते हैं, लेकिन एक भी हल्कीा हरकत नहीं खोज सकते। एक ही पीस में वह दस इम्प्रोवाइजेशन कर सकते थे और वे सभी परफेक्ट की श्रेणी में होते थे। लेकिन जब आप निजी तौर पर उनसे मिलते, तो वह एक मज़ाकि़या, उन्मुक्त और शालीनताओं से लगभग बेपरवाह शख़्स थे। उनके पिता भी उनकी इन हरकतों को उनका बचपना मानते थे। महानता बंद मुट्ठियों की चीज़ होती है। जब आप किसी के सामने मनुष्य की तरह खुल जाते हैं, तो आप वैसे ही होते हैं- एकदम बच्चे। मोत्जार्ट जैसे बच्चे। मिडियॉकर भी हमेशा अपने लिए एक बंद मुट्ठी रखते हैं, पर वह कभी किसी के सामने खुलती ही नहीं। वह महानता की मुट्ठी नहीं होती। महानता की मुट्ठी खुलने के लिए कुछ लोगों का ख़ुद चुनाव कर लेती है,  जैसे पर्सीफ़ोनी दफ़न हो जाने को अपने लिए ज़मीन का चुनाव ख़ुद करती है.

जब आइंस्टीन, मोत्ज़ार्ट पर सबसे चर्चित किताब लिख रहे थे, तो उनका मानना था कि उनके संगीत की सारी पवित्रता इसी कारण है कि उनका स्वभाव ईश्वरीय शिशुओं की तरह था- निर्द्वंद्व, बेख़ौफ़ और अन्-आतंकित। वह किसी से ख़ौफ़ नहीं खा सकते थे। दूसरे का ख़ौफ़ रचनात्मकता का सबसे बड़ा शत्रु है। जब वह बाख़ के नोट्स की किताब खोजने के लिए दुकानों में भटकते थे, तब भी बाख़ उनके लिए कोई आतंक नहीं थे। वह हायडन का जितना सम्मान अपने भीतर कर सकते थे, उनके संगीत की नक़ल बनाकर उतना ही मख़ौल भी कर सकते थे। यह सब उनकी गर्वीली पवित्रताएं थीं। आदि शंकराचार्य ने 'अपराधक्षमास्तोत्र' में इसे ‘नैतच्छठत्वं...’ कहा है। यानी एक ऐसी बालसुलभ शठता, जिसमें बालक अपनी ही जननी से परिहास करता है। मोत्ज़ार्ट की जननी संगीत थी, संगीत की स्मृति थी। वह इन्हीं स्मृतियों से शठता करते-करते संगीत करते थे।

नवंबर 1775 में मोत्जार्ट ने एक ख़त में अपने पिता को लिखा था- 'जब मैं हंसता हूं, तब वे मुझ पर हंसते हैं। जब मैं पियानो पर बैठता हूं, तब वे भावहीन हो जाते हैं।'

उनके समय के संगीतकारों को लगता था कि वह जान-बूझकर इस तरह हंसते हैं, ताकि आसपास मौजूद लोगों को हंसने के उनके आनंद से ज्यादा इस बात का भान हो कि वह हंसी दूसरों का मज़ाक़ उड़ाने के लिए निकली है। मोत्जार्ट के समकालीन और अब लगभग विस्मृत संगीतकार सालिएरी को बहाना बनाकर पुश्किन जो नाटक लिखा था और जिस पर पीटर शैफ़र ने 'अमैदियस' बनाई, उसके आखिरी दृश्य में सालिएरी कहता है, ‘तुम मुझ पर हंसो, खुलकर हंसो। इस तरह हंसो कि मुझे अपनी मिडियॉक्रिटी का अहसास हो जाए। पर एक दिन मैं तुम पर हंसूंगा, ज़ोर-ज़ोर से हंसूंगा। लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। आखि़री हंसी तो अमैदियस की ही रही।’

आखि़री हंसी या 'द लास्ट लाफ़' अंग्रेजी का मुहावरा है, अंतिम विजय की घोषणा करता हुआ।

मोत्जार्ट की जिस सिंफनी का एक हिस्सा आज उनकी सिग्नेचर ट्यून की तरह बजता है, टाइटन के विज्ञापन में भी, उस 25 नंबर सिंफनी को ऑस्ट्रिया के राजा ने पांच बार रिजेक्ट किया था और आखिरी रिजेक्शन ने मोत्जार्ट को गहरे और जानलेवा आर्थिक-मानसिक-संकट में डाल दिया था।


(इस लेख के सन्दर्भ में गीत चतुर्वेदी का कहना है - "दोनों की कोई तुलना नहीं है, बस फर्स्‍ट हैंड इंप्रेशन्‍स हैं, नोट्स की शक्‍ल में". और हम सब भी यह अच्छे से जानते हैं कि रहमान और मोत्ज़ार्ट में सिर्फ़ संगीत को आधार बनाकर कोई मिलाप कराना एक कठिन काम है. लेकिन एक समाज द्वारा संगीत/संगीतकार को आड़े हाथों लिया जाना, और फ़िर इसी तिरस्कार से लोगों को आईना दिखाने लायक़ संगीत निकाल लाना, कहीं न कहीं दोनों को एक ही साथ रखता है. ऐसी अनूठी नज़र के लिए बुद्धू-बक्सा गीत चतुर्वेदी का आभारी रहेगा)

7 टिप्पणियाँ:

शिरीष कुमार मौर्य ने कहा…

adbhut

Abhishek Ojha ने कहा…

थोड़ी अलग सी बात है पर पढ़ते-पढ़ते मुझे ये रोचक बात याद आई:

http://www.washingtonpost.com/wp-dyn/content/article/2007/04/04/AR2007040401721.html

abhilash ने कहा…

yah lekh apne men hi kitna anootha aur alag hai, ye kahne ki aavshyakta nahin. bada alhada anubhav tha, ise padhna. Shukriya.

प्रेमचंद गांधी Prem Chand Gandhi ने कहा…

विराट मेधा के साथ हर युग में यही संकट होते हैं... अस्वीकार महज एक अवसर होता है...लेकिन मेधावी कलाकार बहुधा ऐसे अस्वीकरण से टूट जाते हैं.... टैगोरे जैसी विरल मेधा ही शिखर तक पहुंचती है... एक बेहद अच्छी रचनात्मक टिप्पणी के लिए आभार.

Pratibha Katiyar ने कहा…

संगीत पढ़ा भी तो जाता है...अभी पढ़ा मैंने...
ये लाइनें उधार ले रही हूँ-
'आपका दुश्मन ही सबसे अच्छी तरह जान रहा होता है कि आपमें कितने गुण हैं और आपकी सर्वश्रेष्ठ योग्यता क्या है। उसी हिसाब से वह आपके लिए जाल बुनता है।'
'जीनियस को मिला सबसे बड़ा अभिशाप होता है कि वह ताउम्र मिडीयॉकरों से लड़ता रहे। हर युग में ऐसा होता है।'

धर्मेन्द्र कुमार सिंह ‘सज्जन’ ने कहा…

मैंने अमैदियस देखी है। मैं आपके इस लेख को महसूस करता हूँ।

रूप ने कहा…

"जीनियस कभी अपने बचपने से बाहर नहीं आ पाता।"

एक ऐसी हक़ीक़त जिसे आपके शब्दों ने बखूबी अभिव्यक्त किया है.

सुन्दर लेख.