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मंगलवार, 22 सितंबर 2015

'अंधेरे में' पर विष्णु खरे का प्रतिवाद


चमकीले विरोधाभासों में बेसुध आत्म-सम्मोह 
उर्फ़
‘प्रश्न की उथली-सी पहचान’ 

विष्णु खरे 

दुनिया न कचरे का ढेर कि जिस पर
दानों को चुगने चढ़ा हुआ कोई भी कुक्कुट
कोई भी मुर्ग़ा
यदि बांग दे उठे ज़ोरदार 
बन जाये मसीहा
                                 (गजानन माधव मुक्तिबोध,’अँधेरे में’, 6, 156-60)



[ 1 ]

‘अँधेरे में’ आज भी इतनी जीवंत और प्रासंगिक है कि उसे ‘अब’ सिर्फ प्रतीक मानना एक सुविधाजनक, पलायनवादी, चालाक, विरोधी रणनीति का एक दांव ही हो सकता है. यदि वह अमर है तो निस्संदेह वह एक अभिशाप उनके लिए है जो ऐसी अमरता न सोच पाते हैं और न सह. आज हिंदी में केन्द्रीय कविता कौन-सी है यह कह पाना कठिन है लेकिन 1964 में अपने प्रकाशन के समय से ही हिंदी के कई सर्वाधिक महत्वपूर्ण कवि और उनकी ‘कविताएँ’ ‘अँधेरे में’ के  प्रकट प्रभाव से जाने-अनजाने मुक्त रहे हैं. कुँवर नारायण, केदारनाथ सिंह, रघुवीर सहाय, श्रीकांत वर्मा आदि से शुरू होने वाली पीढ़ियाँ कुछ तो मुक्तिबोध की दुर्दांत प्रतिबद्धता से आज़ाद रही हैं और अधिकांश उनकी भाषा, शिल्प और शैली से भी स्वतंत्र रही हैं. मामला हिन्दू मिथकों में विष्णु और शिव जैसा रहा है – राम और कृष्ण आदि विष्णु के अवतार माने गए हैं बल्कि उन्होंने, और अन्य कई कमतर आराध्यों ने भी, विष्णु को लगभग अपदस्थ कर दिया, किन्तु किसी को भी शिव का अवतार होने का सौभाग्य प्राप्त नहीं है.

तात्कालिक और सतही तौर पर ऐसा हमेशा लगता है, और जितना उथला हमारा दिमाग हो उतना ज़्यादा लगेगा, कि अब हमारा समय और संसार एक कालजयी कृति से बहुत दूर चले आए हैं, लेकिन, महान लेखकों और उनकी अमर कृतियों के कितने नाम गिनाए जाएँ, सैकड़ों अन्य रचनाओं के भी, जिनके न पूर्वानुभव अतीत हुए हैं और न उनकी आहटें, न चेतावनियाँ ऐसी हैं कि जिन्हें आगे न सुना जाएगा. यह कहना कि ‘अँधेरे में’ भविष्य की कविता नहीं है विकलमस्तिष्क हास्यास्पदता है क्योंकि वह 50 वर्षों से उत्तरोत्तर वर्तमान की कविता बनी हुई है और यदि हालात न बदले, जो कि अब तो विश्व-स्तर पर बदलते दिखाई नहीं देते, बल्कि लगता है बदतर होने को अभिशप्त हैं, तो ‘अँधेरे में’ सरीखी कृतियों की प्रासंगिकता में एक दुर्भाग्यपूर्ण, भयावह वृद्धि होती रहेगी. उनमें अभिव्यक्त संकटों से कोई आर-पार का सामना नहीं हो सका है बल्कि वह भयावह्तर भेसों में सामने हैं. मुक्तिबोध-जैसा जीवन न तो मुक्तिबोध का अभिप्रेत था न आज के कवि का है – वह उन जैसे कवि पर नाज़िल किया गया था और उन जैसे कवियों पर बरपा किया जाएगा. 'अँधेरे में’ के नायक का आध्यात्मिक और विचारधारागत आत्मोन्नयन तो कविता में हो चुका है, यदि वह कविता के बाहर नहीं हुआ तो उसके लिए मुक्तिबोध उत्तरदायी नहीं हैं, यदि बाहर ‘जीवन-शैली’ बदल गयी है तो उसके लिए भी नहीं.

[ 2 ]

निस्संदेह अब ‘अँधेरे में’ सरीखा अँधेरा नहीं है क्योंकि वह 1964 से कहीं गहरा, भयावह और हत्यारा हो चुका है. हाँ,जो सावन में अंधे हुए हैं उन्हें वह अब हरा-हरा सूझ रहा है. मुक्तिबोध का काव्य-नायक अपने ‘जीवन-काल’ में ही व्यवहार से छिटका हुआ आदर्श था लेकिन यह बखूबी जानते हुए भी उसे इसकी परवाह न थी. यह तो स्पष्ट है कि हमारा अनलिखा-लेखनायक उस महानता को दोहराना तो क्या, इकहराना भी नहीं चाहेगा क्योंकि अपनी श्रद्धाहीन, सुविधाजनक, अभिप्रेत नपुंसकता में वह स्वयं पहले से ही सड़क के नीचे के गटर में छिप गया है और परिवर्तनातीत पूँजी से जुड़ा हुआ ह्रदय बन चुका है. अब वह बदल नहीं सकता. बदलना नहीं चाहता.

[ 3 ]

गाँधी कहते ज़रूर हैं कि हम हैं गुज़र गये ज़माने के चेहरे लेकिन मुक्तिबोध के लिए वह ‘देव’ हैं जिनके आगे ‘अति दीन’ हो कर ही जाया जा सकता है : किन्तु, मैं देखा किया उस मुख को/ गंभीर दृढ़ता की सलवटें वैसी ही/शब्दों में गुरुता// वे कह रहे हैं – (इस टिप्पणी का पुरोद्धरण) / वे कह रहे हैं – ‘मिट्टी के लोंदे में किरणीले कण-कण / गुण हैं, / जनता के गुणों से ही संभव/ भावी का उद्भव //...मुस्करा उस द्युति-पुरुष ने कहा तब - /’’मेरे पास चुपचाप सोया हुआ यह था/सँभालना इसको,सुरक्षित रखना’’

हमारा अनलिखा-लेखनायक अव्वल तो कुटिलता और चालाकी से मुक्तिबोध के उद्धरण में इस तरह कतरब्योंत करता है जैसे कोई चोर दर्ज़ी गाहक के कपड़े में करे, फिर इस पर आँखों में सूअर का बाल डाल लेता है कि यदि समय और जनचरित्र ने मुक्तिबोध और गाँधी के सपनों के साथ एक-सा विश्वासघात किया तो उसके लिए यह दोनों उत्तरदायी कैसे हैं और ‘अँधेरे में’ में व्यक्त संकटों से सामना किस तरह और कौन कर चुका है और ‘अँधेरे में’ जैसा अँधेरा अब कैसे नहीं है?

[ 4 ]

कोई दुर्बुद्धि दृष्टिहीन ही कह सकता है कि यह समय मुक्तिबोध के युग से बेहतर है. इस बौद्धिक दीवालिएपन की इंतिहा यह मानना है कि वर्तमान हमेशा अतीत से श्रेष्ठ होता है. ऐसी मूर्खता तो अनिर्वचनीय है. मुक्तिबोध जैसे जिद्दी, हठधर्मी, प्रतिबद्ध आदर्शवादी के लिए आज भी यदि विकल्प होते तो ‘ज़िंदगी की शर्म जैसी शर्त’ सरीखे अस्वीकार्य होते. युग और वर्तमान के बहुआयामीय, वैश्विक अर्थ-सन्दर्भ में जीवनयापन और प्रकाशन जैसी सीमित समस्याओं की बात हमारे अनलिखे-लेखनायक के हाय-हाय (मैंने उन्हें देख लिया नंगा) विरोधी, ‘कर्मवादी’ बौद्धिक-नैतिक  दारिद्र्य को विवस्त्र कर देती है. 'अँधेरे में’ यदि आज भी प्रासंगिक है तो यह विडंबना ‘अँधेरे में’ और उसके बाद की आज तक की हिंदी कविता की नहीं,  यह La condition humaine की विडंबना है. वैश्विक पूँजीवाद ने अपने सहित समूची मानवता को suicide bomber बना दिया है, उसे आत्मनाश की मंज़िल का एकतरफ़ा टिकट कटवा दिया है. जिसे भौतिक सफलता कहा और माना जा रहा है यदि वह आधिभौतिक-नैतिक-आदर्शवादी-प्रतिबद्ध असफलता पर विमर्श करती है तो यह जिद्दी, अलज्जित, अड़ियल असफलता नाउम्मीद और नपुंसक कैसे सिद्ध होती है? ‘अँधेरे में’ की ‘विडंबना’ को 1964 और उसके पहले से ही कौनसी प्रतियोगी धूर्त सफलताओं ने महान और प्रतीक बना डाला था जो अब तक बनाए हुए हैं?

[ 5 ]

यदि हिंदी के अकादमिक जगत में सुविधाभोग का सफल माहौल है और सत्ता भी वहाँ सफल रही है और ‘अँधेरे में’ एक अप्रासंगिक, और चुकी हुई कविता है तो हिंदी में ‘परम अभिव्यक्ति’ की खोज को लेकर हमारा अनलिखा-लेखनायक परेशान क्यों है? अचानक वह ‘सरकारी अनुदानों और सुविधाओं...पर पलनेवाले पालतू’ जे.आर.एफ़ों., शोधार्थियों को हिक़ारत से ‘अँधेरे में’ को समझने के नाक़ाबिल मानते हुए अग्निवर्षण क्यों करने लगता है जबकि वह ख़ुद ‘अँधेरे में’ और मुक्तिबोध को लगभग दो कौड़ी के समझता लगता है? अकादमिक वर्ग पूछे या न पूछे, हमारे अनलिखे-लेखनायक से दूसरों को यह तो पूछना ही चाहिए कि पार्टनर, तुम्हारी सैलरी और पॉलिटिक्स क्या हैं? तुम किन रावणों के घर पानी भर रहे हो? 

[ 6 ]

विचार के रास्ते शिल्प से जुड़ने का क्या मंतव्य है? अव्वल तो यह किया कैसे जाता है? फिर किया भी जाता हो तो क्या विचार की कविता में शिल्प नहीं होना चाहिए? या शिल्प से जुड़ना कोई चालाकी या स्नायु-दौर्बल्य है? क्या वह एक मूर्खता है? क्या लेखक संगठन ‘जनचरित्र’ हैं जिसे कोई ‘अँधेरे में’ सरीखे महान प्रतीक को ढोने के निर्देश दे रहा है?

[ 7 ]

मार्क्सवाद को नकारने के उद्देश्य से इस बाली उमर में ही पुंसत्व जुटाने के लिए बर्ट्रेंड रसेल के दिवंगत, आउट-ऑफ़-डेट विआग्रा की दरकार क्यों हुई? इस कुश्ते का नुस्खा तो जरद्गव रज़ा फ़ाउंडेशन के खैराती शिफ़ाखाने में हकीममुसल्लस कृष्ण बलदेव वैद, अशोक वाजपेयी, ओम थानवी से हासिल हो सकता था. मिल तो लें.

[ 8 ]

प्रतिक्रियावादी और प्रतिगामी शक्तियाँ आज नहीं, पहले भी जनसमर्थन से राज कर चुकी हैं. हिंदी के क्या सभी बौद्धिक वर्ग समाज में हो रहे बदलावों से बेखबर रहे? 1947 के, और विशेषतः 1964 में नेहरू की मृत्यु के, बाद से हिंदी कविता जितनी जनोन्मुख और जन-जागरूक रही है – मुक्तिबोध, नागार्जुन, शमशेर, त्रिलोचन, रघुवीर सहाय, कुँवर नारायण, केदारनाथ सिंह, धूमिल, चंद्रकांत देवताले, आलोकधन्वा, ज्ञानेन्द्रपति, कात्यायनी, नरेश सक्सेना, सुदीप बनर्जी, विनोदकुमार शुक्ल, ऋतुराज, मंगलेश डबराल, वीरेन डंगवाल से लेकर आज के अनेक युवतम कवि-कवयित्रियों ने भाड़ नहीं झोंके हैं – उतनी दक्षिण एशिया में तो कोई और रही ही नहीं और विश्व-मंच पर भी इतनी प्रतिबद्ध कविता बहुत कम दिखाई पड़ती हैं. उसकी समझ और पकड़ न संकीर्ण होती गईं न कमज़ोर. किसी बुनियाद को यदि उसने मज़बूत किया है तो किन्हीं जड़ों तक पहुँच कर. हिंदी कविता में यदि महानताएँ और आदर्श हैं तो उनके सारे स्मारक और प्रतीक जीवंत हैं. यदि डोमाजी उस्ताद का जुलूस बढ़ता गया है तो उसे सबसे पहले नंगा देखने और शनाख्त करने की सज़ा हिंदी में ही मिली है. यह कोई नहीं कह रहा है कि हिंदी कविता में सभी कुछ सार्थक, श्रेयस्कर और उत्कृष्ट हो रहा है – ऐसा किसी साहित्य में कभी नहीं होता – लेकिन यदि हमारा अनलिखा-लेखनायक अपनी तान – दम नहीं – ‘अभिव्यक्ति के खतरे उठाने’, 'मठों और गढ़ों को तोड़ने’ और ‘अरुण कमल’ को खोजने पर तोड़ रहा है तो देखा जा सकता है कि अपनी  हास्यास्पद, गड्डमड्ड, परस्पर-विरोधी, विश्वासघाती छद्म-प्रकान्डता और प्रयासित, असफल मूर्तिभंजन के अंत में वह ‘अँधेरे में’ और गजानन माधव मुक्तिबोध के सामने ही साष्टांग मूर्च्छित है.

(बुद्धू-बक्सा पर आए अविनाश मिश्र के 'अंधेरे में' पर आलेख से निकला हस्तक्षेप का पक्ष पूरी तरह से अवशोषित न हो सका. उसी आलेख पर विष्णु खरे की पैनी नज़र बरपा हुई है. अविनाश के विरोधाभासों में सिमटे आलेख के बाबत विष्णु खरे के सवालात पर अमल करना नैतिक रूप से ज़रूरी है. इस आलेख के लिए बुद्धू-बक्सा विष्णु खरे का आभारी.)

सोमवार, 22 दिसंबर 2014

पीके पर विष्णु खरे

कोई अच्छा-सा लेकिन एलिअन भेज दे
विष्णु खरे



मानव शुरू से ही अपने अस्तित्व की समस्याओं से इतना आक्रान्त रहा है कि उसे हर जगह और हर शय में अपने ईश्वर, बुत, फ़रिश्ते, उद्धारक, अवतार स्त्री-पुरुष और नबी-मसीहा खोजने पड़े हैं. विडंबना यह है कि समस्याएँ उतनी ही बढ़ती गई हैं जितने भगवान और पैग़म्बर आए हैं. बल्कि शायद यदि वे कम आए होते, या आते ही नहीं, तो इंसानियत की ऐसी दुर्दशा न होती. अभी जो डेढ़ सौ बच्चे मारे गए हैं उनके पीछे मजहबी थे. मेरठ-गुजरात में भी चोटी-जनेऊ-तिलक-कलावे वाले धर्मप्राण लोग ही बसते हैं. नाइजीरिया में इस्लामी ‘बोको हराम’ ने मानवता का जीना हराम कर रखा है.

जबसे ब्रह्माण्ड के आयामों का पता चला है तबसे यह उम्मीद भी बाँधी गई है कि शायद कहीं ऐसी नस्लें हों जो हम जैसी हों, हम से हजारों गुना विकसित हों, जो हमसे रूबरू या इलेक्ट्रॉनिक तरीकों से संपर्क साधें और हमारे वुजूद की हिफ़ाज़त करें. हाय रे शिकस्ता ज़ेहनी गुलामी की मजबूरियाँ! लेकिन उसमें यह ख़तरा भी है कि कोई तालिबान, आइ.एस. या हिंदुत्वी-नुमा घुमंतू कायनाती आतंकवादी दस्यु बेड़ा भी हो, जो टेक्नोलॉजी में हमसे सदियों आगे हो लेकिन हर तरह के दूसरे प्राणियों को वाक़ई खाकर ही जिंदा रहता हो, तब हम क्या करेंगे?

जब ‘गाँधीगीरी’ फिल्मों में सुपरहिट रही और भारतीय यथार्थ में सुपरफ्लॉप, तो अब बारी आई है दूसरे ‘गोले’ से आए ‘नेकेड फ़कीर’ ‘पीके’ की. यह भी इसलिए आ सकी कि हमारी दोग़ली इंडस्ट्री के असली गोरे हॉलीवुडी अब्बामियाँ बरसों से विज्ञान-कथा (साइंस-फ़िक्शन) और अच्छे-बुरे एलिअनों का मुफ़ीद इस्तेमाल कर रहे हैं. यह बात अलग है कि अपने भोलेपन में पहली ग़लती सत्यजित राय ने की और हमने अपना ‘महाभारत’ सही ढंग से अब तक नहीं पढ़ा. वैसे हिन्दू मिथकों में सारे भगवान, देवी-देवता, अवतार, ऋषि-मुनि आदि मूलतः एलिअन ही हैं, वह स्वर्ग से आते हैं और स्वर्ग को ही लौटते हैं या सारे ब्रह्माण्ड में इच्छानुसार पलक-झपकते डोलते रहते हैं.

तो माजरा यह है कि तीन पर्वताकार रकाबीनुमा खगोलयान राजस्थान पर मँडरा कर अपने एक यात्री को थार में दिगंबर छोड़ जाते हैं. नंगा-पुंगा सिर्फ़ इसलिए नहीं कि उसके गोले के निवासी ऐसे ही रहते हैं, बल्कि यूँ भी कि स्वानंद किरकिरे को एक और घटिया ‘लिरिक’ लिखने का मौक़ा मिल सके. सिर्फ़ उसकी गर्दन में एक स्फटिक का कोई स्वदेश-संपर्क-यंत्र है जो ऐसे एलिअन-नेटिव टूरिस्टों को चूतिया बनानेवाले जयपुर-जैसलमेर-बाड़मेर के किसी रँग-रँगीले शरारती एम्पोरियम से खरीदा हुआ लगता है. एक बदमाश राजस्थानी गाँववाला उसे ही झपट कर भाग जाता है. अब हमारा  पीके एलिअन ‘फ़ोन होम’ नहीं कर सकता लेकिन उस के पास खोने के लिए सिर्फ़ ऑडियो-कैसेट वाला एक प्राचीन टू-इन-वन है. एक ईमानदार, जीवनदानी राजस्थानी बैंडबाजेवाला वचन देता है कि वह उसे उसका तावीज़ लौटवा कर ही दम लेगा.

राजकुमार हिरानी और आमिर ख़ान की फ़िल्म इसके बाद अपना मक़सद हासिल करती दिखाई गई है. पीके एलियन के गृहग्रह पर हिंदुस्तान जैसे हालात नहीं हैं. वहाँ भाषा नहीं है, लोग टेलीपैथी से बात करते हैं, वहाँ धर्म-कर्म नहीं हैं, ईश्वर या तो बहुत कम है या है ही नहीं, किसी किस्म की मूर्तियाँ और इबादतगाहें नहीं हैं, बाबा-साधू नहीं हैं, अन्याय, अत्याचार, भ्रष्टाचार, ऊँच-नीच आदि का नामोनिशान नहीं है और स्त्री-पुरुषों को परस्पर प्रेम और विवाह करने की पूरी आज़ादी है, परिवार और समाज उसके आड़े नहीं आते. जब पीके एलियन भारत में यह सब होते देखता है तो तत्काल अपना अजेंडा तय कर लेता है.

सबसे पहले तो उसे यहाँ की कोई भाषा सीखनी है. इसका एक ही तरीक़ा है कि वह किसी सुन्दर औरत के दोनों हाथ पकड़े और छः घंटे तक दोनों ऐसे ही चुप बैठे या लेटे रहें ताकि उस महिला की पूरी भाषा किसी परामनोवैज्ञानिक, स्थायी पाणिनीय अष्टाध्यायी स्थानान्तरण के माध्यम से उसके मस्तिष्क में अंकित हो जाए. सच्चरित्र हिन्दू नारियाँ तो किसी पराये मर्द को अपना हाथ तक छूने नहीं देतीं, लिहाज़ा एक चकले में जाकर इसे अंजाम दिया जाता है, और आश्चर्य! वह उदारचरिता भोजपुरी मातृभाषा वाली है, तो हमारा चरितनायक उसी में निष्णात हो उठता है और जब तक भारतीय धरती पर रहता है, सबसे वही बोलता है. यह बात अलग है कि हिरानी-आमिर-पीके की भोजपुरी बहुतै गड़बड़ बा.

उपरोक्त अजेंडे में भारतीय समाज-सुधार तो शामिल करना ही है, साथ में उत्तरी यूरोप के ब्रूष शहर में पढ़ने वाली एक भारतीय हिन्दू युवती का मिलन और विवाह उसके उतने ही युवक किन्तु वहीं रहने और पाकिस्तानी एम्बेसी में काम करनेवाले मुस्लिम नौजवान प्रेमी से करवाना भी है. इसके लिए सारे धर्मों के पाखण्ड और अन्याय को बेनक़ाब करना होगा और सबसे ज़्यादा उन हिन्दुत्ववादी बाबाओं को, जो ऐसे प्रेम और विवाह को महापाप मानते हैं और हिन्दू परिवारों और समाज को वर्गलाते-भड़काते हैं. कहानी बताना हमारा उद्देश्य नहीं. उसके लिए फिल्म देखनी होगी जो उस लायक है.

फिल्म में ऐसी कई स्थितियाँ और संवाद हैं जिनसे किशोर और युवा दर्शक बहुत खुश होते हैं और तालियाँ-सीटियाँ बजाते हैं. यह आमिर खान के फर्स्ट-डे-फर्स्ट-शो वाले फैन हैं या पूरी फिल्म से प्रसन्न दर्शक जो इसे रिपीट करेंगे या वर्ड-ऑफ़-माउथ से इसका व्यापक प्रचार करेंगे यह कहना मुश्किल है. इसमें हिंसा, वल्गेरिटी, सस्तापन, नंगई, अर्ध-अश्लीलता आदि सलमानी-रजनीकान्तीय-प्रभुदैवीय तत्व नहीं हैं. एक लिहाज़ से यह फिल्म पारिवारिक और हर उम्र के ‘बच्चों’ के लिए भी है.

लेकिन यह कारुणिक और दयनीय है कि हमारे फिल्म-समीक्षक और दर्शक बेहूदा हिंदी फिल्मों से इतने आजिज़ आ चुके हैं, जबकि उन्हें देखते भी हैं और ‘हिट’ भी करवाते हैं, कि इसे एक महान या कालजयी फिल्म मानने-मनवाने पर आमादा हैं. जहालत इतनी है कि कहा जा रहा है कि राज कपूर, बिमल रॉय और गुरुदत्त इसे बनाकर गर्व महसूस करते. जबकि पीके ठीक उन्हीं मसलों से भागती है जिनसे सीधी मुठभेड़ ऐसे निदेशकों ने की थी. यह श्याम बेनेगल, गोविन्द निहलाणी, एम.एस. सत्यु, मुज़फ्फर अली, प्रकाश झा, तिग्मांशु धूलिया, विशाल भारद्वाज, अनुराग कश्यप आदि का भी सिनेमा नहीं है.

आप देखें कि एलियन को इसलिए नायक बनाया गया है कि उसके राष्ट्र, कौम, नाम, धर्म, जात-उपजाति-खाप आदि की ज़रूरत ही न पड़े. वह जो उपदेश देता है या हरकतें करता है वह इस सन्दर्भहीनता में स्वीकार्य हो जाती हैं. जादूगरी की भाषा में इसे ‘स्लाइट-ऑफ़-हैण्ड’ – हाथ की सफ़ाई – कहते हैं. यह सही है कि कुछ दुस्साहसपूर्ण बातें कही गई हैं लेकिन वह एक आसाराम-रामदेव-राजपाल आदि जैसे एक ‘तपस्वीजी’ बाबा को लेकर हैं और वैसी बातों से खुद उनके असली अनुयायियों को लेकर कोई आपत्ति नहीं होती, जो मानते हैं कि ‘हमारे अवतारी बाबा ऐसा नहीं करते’.

राजनीति, हिंसा और आतंकवाद आदि को लेकर इस फिल्म में एक भयावह डरी हुई चुप्पी है. देश में इतना बड़ा राजनीतिक बदलाव आया जिस पर पीके कुछ नहीं कहती. भारत-पाकिस्तान के हिन्दू-मुसलमानों के बीच रोटी-बेटी का रिश्ता न हो पाना क्या सियासत का एक नतीजा नहीं? और क्या हिन्दुस्तान में ही ऐसी मुहब्बतें और निकाह गली-गली हो रहे हैं? क्या हिन्दू-ईसाई-सिख-जैन-बौद्ध शादियाँ आसान हैं? अभी कल ही जो हाइकोर्ट का शादी बरक्स धर्म-परिवर्तन वाला लव-जिहादी फ़ैसला आया है, उसका क्या? एक अजीब बम-विस्फोट दिखाकर आप क्या साबित करना चाह रहे हैं? आतंकवाद के सवाल पर एलियन चुप क्यों है?

यह फिल्म हिन्दुस्तान की ग़रीबी, भुखमरी और गलाज़त के मामलों पर गूँगी है. बलात्कार और भ्रूण-हत्याएँ भारतमाता के देश में होते ही नहीं. इस देश का एक भी नेता, अफ़सर और पुलिसवाला इसका बड़ा किरदार नहीं. यहाँ मीडिया के नाम पर एक टीवी चैनल है, अखबार हैं ही नहीं. मॉल और मल्टीनेशनल्स और कैपिटलिज्म का नामोनिशान नहीं. माफ़िया और बिल्डर इसमें नहीं होते. भ्रष्टाचार की हमने सफाई कर दी. स्विस खतों का भंडाफोड़ कभी का हो चुका. एक टुच्चे बाबा का भंडाफोड़ कर दीजिये, एक टेलीफोन बेल्जियम की पाकिस्तानी एम्बेसी से मिलाइए, वह आपको पिंडी से कनेक्ट कर देंगे, कुछ गिले-शिकवे-आँसू करवा दीजिए और सरफ़राज़ और उस जग्गो की शहनाइयाँ बजवा दीजिए जो पीके एलियन के लिए भी तड़पना शुरू कर चुकी है.

चूंकि मूलतः यह एक असंभव, फील-गुड, मॉडर्न परी-और-फ़ंतासी कथा है इसलिए हम इस तरह के सवाल ही नहीं उठा रहे हैं कि जो सभ्यता इतनी एडवांस्ड और संपन्न है कि तीन खगोलयान धरती के एटमोंस्फियर में भेज कर अपने एक ‘आदमी’ को यहाँ उतार सकती है उसने अपने ‘गोले’ में बैठ कर बरसों पहले सारी रेकी क्यों नहीं की. उनके यहाँ ‘औरतें’ होती हैं या नहीं? अपनी एक मादा को लेकर पीके यहाँ क्यों नहीं आया? क्या उसे भारत की बलात्कार हॉबी का पता था?

हिरानी और आमिर कहेंगे – फिल्म देखते हो या भाड़ झोंकते हो? आख़िरी शॉट में हमने नंगे पीके के साथ नंगा रणबीर और पांच-छः और नंगे एक्स्ट्रा भेजे हैं. यह पीके पार्ट वन है. रणबीर पार्ट टू होगा. एक्स्ट्रा अलग. पीके एक बहुत बड़ा फ्रेंचाइज़ बनने जा रहा है. पार्ट सिक्स के बाद यह सारे अच्छे एलियन धरती के गोले की सारी प्रॉब्लमें सॉल्व कर देंगे –इंसानियत समेत. अभी तो तपस्वीजी वाला. इंडो-पाक वाला वगैरह कई मसले बचे हुए हैं. देखना, अभी तो जग्गू सरफ़राज़ को छोड़ेगी और पीके के साथ उड़ जाएगी. तुम बस खुद टिकट लेते रहो और दर्शकों से लिवाते रहो. द गुड एलियंस आर लैंडिंग.

(यह टिप्पणी नवभारत टाइम्स में कुछ परिवर्तनों के साथ प्रकाशित है. तस्वीर के लिए डीएनए का आभार. बुद्धू-बक्सा विष्णु खरे और अन्य सभी का आभारी.)

सोमवार, 13 अक्टूबर 2014

'हैदर' पर विष्णु खरे

['हैदर' एक कथानक के साथ-साथ कई और भी कहानियां कहती है. एक संवेदनशील मुद्दे को अपना केन्द्र बनाने वाली फ़िल्म की सभी दिशाओं से समीक्षा होनी चाहिए. उसे बस फ़िल्म मान लिखकर छोड़ देना और उससे भी बुरा कि कुछ तारों से नवाज़ देना शर्तिया एक घटिया प्रैक्टिस है. इससे बाज़ आना होगा. इसी बीच जब विष्णु खरे फ़िल्मों पर लिखते या बात करते हैं, तो व्यक्तिगत राय से अलग यह तो साफ़ हो ही जाता है कि किसी भी फ़िल्म इतने व्यापक तरीके से बात करने को ही सिनेमा के कल्चर पर बात हुआ माना जाएगा. बाकी सब तो उधड़े हुए धागों के रंग उतारने सरीखा होता है, उसमें कोई जगह नहीं होती कि कोई प्रश्न उपजे. पिछले दिनों हुई बातों-बहसों में यह बात तो सामने आई कि हिन्दी के बहुत बड़े समाज को पता भी नहीं कि विष्णु खरे की सिनेमा पर लेखन की दो क़िताबें हमारे बीच मौजूद हैं. लेकिन अंधी बहस में तथ्य कहां काम आते हैं, को कमोबेश एक 'अलौकिक' 'सचाई' मानते हुए बुद्धू-बक्सा आप सभी के सामने यह लेख प्रस्तुत कर रहा है. नवभारत टाइम्स में इस आलेख का संपादित रूप प्रकाशित. बुद्धू-बक्सा विष्णु खरे का आभारी.]

शेक्सपिअर और कश्मीर के बीच विशाल-हैदरी ‘टु बी ऑर नॉट टु बी’


सबसे पहले तो यह कि विशाल भारद्वाज की फिल्म में एक सम्मोहन और ताक़त है और वह आज की अधिकांश हिंदी, अनुराग कश्यप की भी, फिल्मों से बेहतर है, लेकिन जब वह खुद कहते हैं और पोस्टरों पर छपवाते हैं कि ‘हैदर’ काफ़ी पुरानी और कठिन अंग्रेज़ी में लिखे गए, विश्व के महानतम नाट्यलेखक शेक्सपिअर के अभी-तक विवादास्पद विश्वविख्यात (एलिज़ाबेथ-प्रथम-अकबरयुगीन) नाटक ‘हैम्लैट’ पर आधारित है, तब भारतीय फिल्म-अध्येता और सामान्य दर्शक क्या करें? भारत में आज मूल ‘हैम्लैट’ को पढ़े और याद रखे हुए दस लाख लोग भी होंगे यह मानना कठिन है.

ऐसा नहीं है कि हिंदी-उर्दू पट्टी ‘हैम्लैट’ से नितांत अपरिचित रही है. वह ‘ख़ूने-नाहक’ नाम से पारसी-उर्दू-थिएटर शैली में ख़ूब खेला गया है. हिंदी में अमृतराय और हरिवंशराय ‘बच्चन’ ने - दोनों अंग्रेज़ी साहित्य में अच्छे एम.ए., ‘बच्चन’ तो अलाहाबाद यूनिवर्सिटी के प्राध्यापक भी रहे – ‘हैम्लैट’ के अनुवाद किए हैं, जिनमें से बच्चन वाला तो खासा खराब है, उसकी एक सख्त समीक्षा भी हुई थी, लेकिन अमृतराय का निस्बतन बेहतर है और दोनों बाज़ार में हैं. अगर मैं बातिल नहीं हूँ तो ‘बच्चन’ वाला दिल्ली में खेला भी गया था और उसमें तब शायद उनके बेटे, कॉलेज-छात्र अमिताभ बच्चन हैम्लैट बने थे जिनकी अप्रतिम सुन्दरी माँ तेजी ने उनकी नाट्य-मातृ गरट्रूड की भूमिका निबाही थी. यह जानना भी अनिवार्य है कि इन अनुवादों और मंचनों से बहुत पहले मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ की बहुमुखी, सुस्थापित सिने-प्रतिभा किशोर साहू, जिनका जन्मशती वर्ष लगने ही वाला है, ‘हैम्लैट’ पर इसी नाम से पहली हिंदी फिल्म बना चुके थे. वह उसके निर्माता-निदेशक तो थे ही, लेखक भी थे और सुपरिचित अभिनेता होने के नाते स्वयं उन्होंने हैम्लैट के किरदार का जिम्मा ले लिया था. लोगों को जानकर हैरत होगी कि उन्होंने फिल्म की ट्रैजिक युवा नायिका ओफ़ेलिआ के रूप में माला सिन्हा को इंडस्ट्री में इंट्रोड्यूस किया था. किशोर साहू की उम्र उस समय अपने युवा नायक से कहीं ज्यादा थी लेकिन चेहरे-मोहरे से वह उस भूमिका के लिए उपयुक्त ज़रूर लगते थे. विडंबना है कि हैम्लैट का किरदार संसार के सबसे लोकप्रिय किन्तु कठिनतम नाट्य-सिने पात्रों में गिना जाता है. अभी भी कोई उसे खेल रहा होगा. किशोर साहू के दुस्साहस को सराहा गया, उनकी ‘हैम्लैट’ की नियति ठीक उनके नायक की तरह बेहद त्रासद रही.

‘हैम्लैट’ कहानी है डेनमार्क के उस युवा राजकुमार की जिसके पिता हैम्लैट वरिष्ठ की मृत्यु पर उसका चाचा क्लॉडिअस राजा बनकर अपनी सगी विधवा भाभी गरट्रूड से विवाह रचा लेता है. पिता हैम्लैट का प्रेत आकर पुत्र हैमलेट को बताता है कि क्लॉडिअस ने उसकी हत्या की है जिसका बदला उसे लेना ही है. राजमहल में एक नाटक के मंचन के ज़रिये हैम्लैट पर साबित हो जाता है कि उसका चाचा वाक़ई खूनी है. वह इसे अपनी माँ को भी बता देता है. वह राजा के मंत्री पोलोनिअस की बेटी ओफ़ेलिया से प्रेम करता है लेकिन राजा के धोखे में पोलोनिअस को मार डालता है और इस सदमे के बाद ओफ़ेलिया पागल होकर नदी में डूब जाती है. राजा समझ जाता है कि हैम्लैट पागल होने का अभिनय कर रहा है. ओफ़ेलिया का भाई लेअर्टीज़ हैम्लैट को द्वंद्व युद्ध की चुनौती देता है लेकिन ज़हर-बुझी तलवार से. कोई जोखिम न उठाने के लिए क्लॉडिअस भी हैम्लैट के लिए विषैली शराब तैयार रखता है लेकिन धोखे से गरट्रूड ही उसे पीकर मर जाती है. लेअरटीज़ और हैम्लैट उसी ज़हरीली तलवार से मरणान्तक रूप से घायल हो जाते हैं लेकिन मरणासन्न लेअरटीज़ हैम्लैट को राजा के षड्यंत्र से आगाह कर देता है और मरने से पहले हैम्लैट अपने सौतेले पिता राजा को मौत के घाट उतार देता है.

‘हैम्लैट’ के साथ सैकड़ों अच्छे-बुरे, संजीदा-मज़ाहिया, बहुविध प्रयोग हुए हैं और होते रहेंगे. उनके विवादास्पद मूल्यांकन भी ख़त्म नहीं हुए है. ‘हैम्लैट’ का सबसे संगीन, विस्फोटक  और ‘कुख्यात’ जायज़ा बीसवीं सदी में शायद शेक्सपिअर से कुछ ही कम समादृत विश्व-साहित्य-प्रतिभा, नोबेल पुरस्कार विजेता टी.एस.एलिअट ने लिया था जब उन्होंने अपने नामस्रोतीय निबंध में कहा था कि ‘(Hamlet) is most certainly an artistic failure.’ {“(हैम्लैट) नितांत निश्चित रूप से एक कलात्मक विफलता है”}. ऐसा उन्होंने ‘Objective Correlative’ (‘विषयनिष्ठ सह-सम्बन्ध’) का अपना विश्वविख्यात आलोचना-सिद्धांत प्रतिपादित करते हुए घोषित किया था जो उनकी इस मान्यता से उपजा था कि हैम्लैट नाटक की कहानी और सम्बद्ध चरित्र हैम्लैट पात्र की भावनाओं को कोई औचित्य या सहारा नहीं देते. चाचा से विवाह करने का अपराध करने वाली अपनी विधवा माँ को लेकर हैम्लैट की भावनाएँ बहुत अतिरंजित हैं. माँ और चाचा से बदला लेने में हैम्लैट इतनी देर क्यों करता है यह भी समझ में नहीं आता.

‘हैम्लैट’ की जो बीसियों सूक्तियाँ लाखों लोगों की ज़ुबान पर हैं उनमें से एक ‘Something is rotten in the state of Denmark’ (‘डेनमार्क राज में कुछ सड़ा हुआ है’) भी है, जो कोई राजनीतिक बयान नहीं है. शेक्सपिअर के कई नाटकों में प्रकट-प्रच्छन्न राजनीति है लेकिन ‘हैम्लैट’ सिर्फ़ प्रतिशोध-गाथा है. विशाल भारद्वाज ने ‘हैदर’ को 1995 के भारतीय जम्मू-कश्मीर में स्थापित किया है, जिससे साफ़ है कि वह मूल ‘हैम्लैट’ की सामंतवादी दुनिया को नकारते हुए उसके अपने रूपांतर को एक राजनीतिक फिल्म भी बनाना चाहते थे. उतना ही मानीखेज़ यह है कि ‘हैदर’ अपनी कहानी के लिए कश्मीरी मध्यवर्गीय ‘मुख्यधारा’ मुस्लिम परिवारों को चुनती है. सभी जानते हैं कि कश्मीर में एक उग्र, लगभग दहशतपरस्त, अलगाववादी आन्दोलन बरसों से चल रहा है जिसकी सही-ग़लत माँग भारत से ‘आज़ाद’ होने की है, स्वतंत्र जम्मू-कश्मीर राष्ट्र के रूप में या/यानी पाकिस्तान में विलीन हो जाने के लिए. इसमें पकिस्तान की केन्द्रीय भूमिका तो है ही, यह वैश्विक दिग्भ्रमित जिहादी आतंकवाद के एजेंडा पर भी आ चुकी है. सभी शामिल पक्षों द्वारा आपस में काफ़ी नाइंसाफ़ी, हिंसा, साज़िशें, दरिन्दगियाँ और इल्ज़ामबाज़ियाँ की जा रही हैं. भारत के लिए कश्मीर को आज़ादी देना नामुमकिन है क्योंकि उसके व्यापक परिणाम दक्षिण एशिया, इस्लामी कौम और दुनिया तथा शेष सारे संसार के लिए विनाशकारी सिद्ध होंगे.

कोई भी भारतीय निदेशक चाहे तो भी ऐसी फिल्म बनाने की हिम्मत नहीं कर सकता जो खुल्लमखुल्ला कश्मीर को भारत से अलग करने की माँग करे. सवाल सिर्फ़ सेंसर या सी.पी.सी., सी.आर.पी.सी. का नहीं है, अकल्पनीय राजनीतिक, सामाजिक, सैन्य और धार्मिक समस्याओं का है. दक्षिण एशिया सरीखे बारूदी और ऐटमी क्षेत्र में एक सीमा के बाद अलगाववाद या उग्रवाद को लेकर सदाशयता और आदर्श काम नहीं आते. इसीलिए ‘हैदर’ सरीखी फिल्म एक सीमा के बाद अनेकार्थी या दोमुँही हो जाने के लिए अभिशप्त है. उसकी समस्या हैम्लैट के अमर जुमले To be or not to be, that is the question की बन जाती है. अंत में हैदर की माँ उसे समझाती है कि इन्तेकाम से इन्तेकाम ही पैदा होता है, लेकिन वह हैण्ड-ग्रेनेडों का आत्महंता काली-नरमुण्ड-हार क्यों पहने हुए है जिससे वह खुदकुशी करती है और अन्य कई को मारती है? यदि हैदर इतना मानवीय आदर्शवादी है कि अपने पिता के हत्यारे चाचा को मार ही नहीं पाता तो फिर सारा रोना किस बात का है? क्या वह यही पैग़ाम लेकर पाकिस्तान चला जाता है? उसे वहाँ या तो आतंकवादी बन जाना है या एक सदाशय लाश. और वह सौतेला पिता-चाचा जो बख्श दिया गया, उसका मुस्तक़बिल क्या है? जम्मू-कश्मीर का मुजरिम मुख्यमंत्री बनना, या वही लाश? ग़ज़ाला की बेमक़सद कुर्बानी, जिसने कई तात्कालिक ‘बेकुसूरों’ की जान ली, न अपने बेटे को बचा पाएगी न अपने पहले शौहर के क़ातिल दूसरे शौहर को.

क्या कश्मीर में कभी ऐसे डॉक्टर को पुलिस या सेना ने मरवाया है जिसने किसी खूँख़्वार उग्रवादी सरग़ना को मौत से बचाने के लिए ही सही लेकिन हिपोक्रेटीय शपथ को निभाते हुए उसके ऑपरेशन का जुर्म किया हो? यूँ तो दुनिया में क्या नहीं होता, लेकिन क्या कोई भाई अपनी भाभी को हासिल करने के लिए अपने कुल मिलाकर मामूली बड़े भाई की मुख़बिरी कर सकता है, यह जानते हुए कि हिरासत में मार डाले जाने में उसे कुछ वक़्त लगेगा? ख़ाविन्द के गुम होने लेकिन लाश बरामद न होने पर एक मुस्लिम औरत किन रस्मों-रिवायतों के बाद दूसरी शादी कर सकती है? अपने देवर-शौहर के खूनी साबित हो जाने के बाद उसे वह कम-से-कम तलाक़ ही क्यों नहीं देती? ईडिपसीय-फ़्रोइडीय इशारे किए गए हैं कि ख़ुद हैदर बेटे की हद से बाहर जाकर अपनी माँ को चाहता है और शायद इसी तरह माँ भी उसे. क्या इसीलिए वह अपनी माँ के चहेते को मारने में इतनी देर कर रहा है? फिर उसके वालिद की रूह रूह्दार के लाए गए इन्तेकाम के पैग़ाम को इतना तूल देने का भला क्या मतलब? रूह्दार लंगड़ा क्यों है – इसलिए कि कश्मीरी अलगाववाद के पैर नहीं हैं? क्या इस्लाम में कब्र खोद कर कंकाल से खेलना जायज़ है?

‘हैदर’ अधिक तार्किक फिल्म हो सकती थी यदि डॉक्टर पिता को एक ‘भला’ और वकील चाचा को एक ‘चालाक-खतरनाक’ पुलिस या सेना अधिकारी दिखाया जाता और शायरमिजाज़ हैदर अपनी माँ को याद करता हुआ बेमन से ख़ुद पारिवारिक परम्परा में पुलिस या फ़ौज की ट्रेनिंग ले रहा होता. उसका यदि बचपन का फोर्टिर्न्ब्रास–जैसा हिन्दू पंडित दोस्त भी होता तो तो फिल्म की एक बड़ी खला भर जाती लेकिन ‘हैदर’ नए और निदेशक के लिए कठिन आयाम हासिल कर लेती. तब शायद उसमें ‘ऑब्जेक्टिव कोर्रेलेटिव’ की क़िल्लत न होती और वह शेक्सपिअर की ‘आत्मा’ के नज़दीक होती. उसमें वह यहूदी ‘खुत्स्पा’ या ‘हुत्स्पा’ भी होता जिसे शायद सनी लेओने आंटी की आमद के बाद ‘हैदर’ के कुछ किरदार ‘चुत्सपा’ कहने के चक्कर में पड़ गए हों. हैदर अलीगढ़ में पढ़ता है जहाँ संसार की सारी इस्लामी गतिविधियों की ताज़ातरीन ख़बरें माहौल में रहती हैं लेकिन उसे कश्मीर की भयावह सचाइयों, खुद अपने बँगले के बर्बाद हो जाने का पहला इल्म अनंतनाग उर्फ़ इस्लामाबाद लौट कर ही क्यों होता है – क्या इसलिए कि वह एक अंग्रेज़ी शाइर है? फिल्म का सबसे कमज़ोर और गड्डमड्ड किरदार उसकी प्रेमिका का है जिसकी मौत क़तई विचलित नहीं करती, जबकि ओफ़ेलिया की मिनी-ट्रेजेडी विश्व-साहित्य में अमर है. उसकी कब्र पर हुए ‘कन्फ्रंटेशन’ को स्टंटबाज़ी में बदल दिया गया है और योरिक की खोपड़ी के साथ हैदर की बातचीत बेअसर है. दरअसल ‘हैम्लैट’ को पढ़े बिना कब्रिस्तान के ‘ब्लैक ह्यूमर’(‘विकट-विनोद’) के दृश्यों को समझना नामुमकिन-सा है.

‘हैदर’ में सभी ने अच्छा ‘आँसाँब्ल’ काम किया है लेकिन अपने ‘पागलपन’ और उसके बाद शाहिद कपूर ने अदाकारी के हैरतअंगेज़ नए मयार क़ायम किए हैं. ‘अंदाज़’ के दिलीप कुमार की याद आती है. गाने और धुनें अलबत्ता कमज़ोर और ग़ैर-ज़रूरी हैं लेकिन फिल्म का बहुत नुकसान नहीं कर पाते क्योंकि वह बाँधे रखती है. कश्मीरी-कल्चर की मौजूदगी त्रासद रूप से सुखद है लेकिन पता नहीं महजूर और लल्ला आरिफ़ा का इस्तेमाल क्यों नहीं किया गया. ‘हैदर’ का ‘Artistic failure’ इस बात में है कि नायक की निजी और पारिवारिक कहानी की वेल्डिंग कश्मीर-समस्या के साथ सफाई से कर नहीं पाई लेकिन एक फिल्म की सार्थकता और सफलता इसमें भी है कि वह देखने-लायक़ तो हो ही, कुछ कमाई भी कर ले, नया पढ़ने-जानने-समझने-देखने की चुनौती दे और संभव हो तो एक व्यापक और लम्बी बहस को जन्म भी दे. विशाल भारद्वाज की ‘हैदर’ इन कसौटियों पर अठारह-बीस कैरेट भी ख़री उतरती है तो वह फिर मक़बूल है. यूँ भी उन्होंने शेक्सपिअर के अपने तीन स्तरीय सिने-रूपांतरों के ज़रिये एक विश्व-कीर्तिमान जैसा कुछ स्थापित कर डाला है, अब ‘किंग लिअर’, ‘कोरिओलेनस’ और ‘जूलिअस सीज़र’ को उनकी प्रतीक्षा है.

सोमवार, 8 सितंबर 2014

ख़्वाजा अहमद अब्बास की जन्मशती पर विष्णु खरे

[सिनेमा क्या, कहां, कैसे और कितना है? ऐसे प्रश्नों के उत्तर कमोबेश सभी को मालूम हैं. न मालूम हों, तो उत्तर उपलब्ध कराने के लिए एक लंबे स्तर की बहस बहुत दिनों से चल रही है, वहां जाकर गिरा जा सकता है. लेकिन सिनेमा किस हाल में रहकर आया है, 'हाल' को 'स्थायित्व' या 'ऊंचाई' से तब्दील भी कर सकते हैं, यह जानना थोड़ा ज़्यादा ज़रूरी है. ऐसे में हिन्दी के पाठकों के लिए विष्णु खरे से बढ़िया रास्ता और बहाना ढूंढ पाना थोड़ा मुश्किल है. विष्णु खरे सिनेमा, जो खुद में एक बहुत विराट संस्था है, पर बहुत समय से लिख रहे हैं, जिसे पढ़ना बहुत कुछ सीखना है. यह ख़्वाजा अहमद अब्बास की जन्मशती है. सचाई के मलबे पर खड़े होकर कहा जाए तो ख़्वाजा अहमद अब्बास को स्मृति में अंकित करने का दौर बहुत बाद में आया, जब यह जानना शुरू किया कि आज से पन्द्रह-बीस साल पहले जो झिलमिलाती फ़िल्म देखी थी, उसे अब्बास ने लिखा था. तो ऐसा कहना यह बताना है कि इस लेख की सबसे ज़्यादा ज़रूरत किस पीढ़ी को है, बीते समय का हिसाब लगाना किसका काम है? यह लेख पहले दृश्यान्तर में प्रकाशित. बुद्धू-बक्सा विष्णु खरे और दृश्यान्तर का आभारी.] 

वह अपनी हर विधा में प्रगतिकामी मूल्यों पर अडिग रहे

ख्वाज़ा अहमद अब्बास को ‘बहुमुखी प्रतिभा का धनी’ कहना एक पिष्टोक्ति है लेकिन उसके सिवा उन्हें कुछ कहा भी नहीं जा सकता – आप चाहें तो उसमें सिर्फ़ कहीं ‘प्रतिबद्ध’ जोड़ सकते हैं. उन्होंने 20 की उम्र के आसपास उर्दू कहानीकार के रूप में अपनी सृजन-यात्रा शुरू की, फ़क़त 27वें बरस में सार्थक सिनेमा से आजीवन जुड़ाव का आग़ाज़ किया, साथ-साथ उर्दू-हिंदी और अंग्रेज़ी पत्रकारिता में गहरा सक्रिय दख़ल दिया और 1935 के इर्द-गिर्द अदीब की हैसियत से तरक्क़ीपसंद तहरीक़ (प्रगतिशील आन्दोलन) और उसकी जन्मदात्री वैश्विक वामपंथी राजनीति से वाबस्ता हुए. यह सब करते हुए उन्हें चौतरफ़ा मुसीबतों और विवादों का सामना करना पड़ा लेकिन वह डटे रहे और वैसा आत्मपावन, शहीदाना पलायन नहीं किया जो उनके पहले और समान्तर प्रेमचंद या अमृतलाल नागर आदि कर चुके थे.

समस्या यह है कि अब्बास को मुख्यतः क्या माना जाए – मुख्तलिफ़ हैसियतों से उनके नाम पर क़रीब पाँच दर्ज़न फ़िल्में दर्ज़ हैं, अलग-अलग ज़ुबानों में कोई पचहत्तर किताबों पर उनके दस्तख़त हैं, उनके लिखे सियासी-ग़ैरसियासी अख़बारी कॉलमों की सही-सही शुमारी कठिन है और प्रगतिशील आन्दोलन और ‘इप्टा’ वगैरह में उन्होंने कौन-से कारनामे अंज़ाम दिए इसी के दस्तावेज़ मिलना मुश्किल है. फिर भी सच यही है कि 1941-91 की (‘नया संसार’ से ‘बॉबी’ तक की) अर्धशती में अगर संसार-भर के करोड़ों लोगों ने उनका नाम जाना, जो आज डीवीडी, इन्टरनैट, एमआरक्यूई और आइऐमडीबी वगैरह के ज़रिये ‘और अमर’ है, तो वह सिनेमा के साथ उनकी सोहबत की वजह से ही है. लेकिन यह भी सच है कि अगर वह सिर्फ़ लेखक होते, पत्रकार या सांस्कृतिक-राजनीतिक-सैद्धांतिक सक्रियतावादी ही, तब भी जन्मशती मनाए जाने के अधिकारी होते.

दूसरी आलमी जंग शुरू होने से पहले ही युवा अब्बास वामपंथी हो चुके थे और मध्य-1941 में मार्शल योसिफ़ स्त़ालीन के नेतृत्व में जब सोवियत रूस विश्व-इतिहास के अब तक के सबसे बड़े हमले का मुक़ाबला कर रहा था और वर्ष के अंत तक जर्मनी की नात्सी फौजों को परास्त कर अपने यहाँ से खदेड़ देने वाला था, अब्बास ने अपने जीवन की पहली सिने-कहानी और पटकथा लिखी और इस तरह ‘नया संसार’ शीर्षक फिल्म बनी जो प्रतिबद्ध पत्रकारिता जैसे अश्रुतपूर्व विषय पर शायद पहली भारतीय फिल्म थी और अपने सामयिक आदर्शवाद के बावजूद ख़बरख़रीद के इस बेहया ज़माने में अब भी प्रासंगिक है. 1946 में चेतन आनंद ने ‘इप्टा’ की आर्थिक मदद से बनाई गई अपनी फिल्म ‘नीचा नगर’ की पटकथा लिखने के लिए अब्बास को चुना और इस फिल्म ने युद्धोत्तर पहले कान फिल्म समारोह में भारत के लिए पहला सह-ग्रांप्री हासिल कर इतिहास बनाया. अब्बास की इन दोनों उपलब्धियों ने उनके अपने हौसले और दूसरों के उनकी प्रतिभा में यकीन को इतना बढ़ाया कि उन्होंने बंगाल के दुर्भिक्ष सरीखे जोखिम-भरे विषय पर आधारित अपनी पटकथा पर ‘इप्टा’ के सहयोग से 1946 में ही ‘धरती के लाल’ जैसी कालजयी फिल्म का निर्माण और निदेशन किया. इस वर्ष को अब्बास के फ़िल्मी जीवन का परिभाषी या निर्णायक वर्ष कहा जा सकता है क्योंकि उनकी प्रतिभा को वी. शांताराम जैसे व्यावसायिक रूप से सफल, आदर्शवादी मराठी-हिंदी निर्माता-निदेशक ने पहचाना और अपनी फिल्म ‘डॉ कोटनिस (मूल मराठी में ‘कोटणीस’ है) की अमर कहानी’ की कहानी और पटकथा के लिए चुना. मुझे याद है कि 1946-47 में मुझ जैसे लाखों बच्चों तक की ज़ुबान पर इस फिल्म का नाम रहा करता था.

भारतीय सिनेमा के इतिहास में ऐसी सार्थक शुरूआत शायद ही किसी और लेखक-निदेशक को मिली हो लेकिन आज़ादी के वर्ष 1947 में जिस ‘आज और कल’ शीर्षक फिल्म का निदेशन अब्बास ने किया उसके बारे में सिर्फ़ यही पता चलता है कि उसमें श्याम, आरिफ़, नीता और नयनतारा ने काम किया था – गानों का भी कोई वजूद बचा नहीं है. ज़ाहिर है कि फिल्म अच्छी-ख़ासी फ्लॉप रही होगी क्योंकि उसके चार बरस बाद तक अब्बास को कोई काम नहीं मिला. लेकिन जब मिला तो ऐसा कि बहुत कम को नसीब होता है. अल्लाह बेहतर जानता है कि इस पूरे किस्से में कितना सच है लेकिन अब्बास अपनी नई स्क्रिप्ट लेकर महबूब के पास गए जिन्होंने कहा कि उसमें बाप के रोल में अशोक कुमार को लेंगे और बेटे के रोल में दिलीप कुमार को. अब्बास राज़ी न हुए. नर्गिस को मालूम पड़ा कि कहानी नायाब है. उसने राज कपूर को बताया. राज कपूर अब्बास से मिलने उस होटल में गया जिसमें अब्बास आठ आने प्रति रात्रि एक खटिया पर सोते थे. राज कपूर की जेब में बयाने के लिए डेढ़ रुपये थे लेकिन अब्बास ने कहा कि इसे लौटने के किराये के वास्ते बचा ले जाओ. राज कपूर के अतिनाटकीय पापाजी पृथ्वीराज कपूर फिल्म के लिए राज़ी होंगे या नहीं इस पर भी सस्पैन्स रहा.
‘आवारा’ ने इतना इतिहास रचा जो कई सदियों पर भारी है. बेशक़ उसमें कुछ मेलोड्रामा है और कोर्ट-सीन को चीख़-पुकार के साथ खींचा गया है लेकिन वह शायद भारत की पहली ‘आधुनिक’ ‘वयस्क’ फिल्म है, जिसने सोवियत संघ और तत्कालीन कई पूर्वी और पश्चिमी विकासशील देशों के दर्शकों, सिनेमा और संगीत पर गहरा असर डाला और राज कपूर–नर्गिस की जोड़ी को भारत में ही नहीं, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अभूतपूर्व लोकप्रियता दी. बेशक़ ‘आवारा’ के हर 35 मि.मी. पर राज कपूर की मुहर है लेकिन खुद राज कपूर के किरदार पर अब्बास की अमिट छाप है. उसके बाद राज कपूर पहले जैसा नहीं रहा और जितना उसने बदलने की कोशिश की, ‘आवारा’ जैसा होता गया.

‘आवारा’ में अब्बास ने राज कपूर के किरदार को कैसा गढ़ा था यह देखते हुए नर्गिस ने 1952 में अब्बास से गुजारिश की वह उनके लिए एक ख़ास फिल्म लिखें और डायरेक्ट करें जिसमें बेशक़ हीरो राज कपूर ही रहे लेकिन नायिका के रूप में उनकी भूमिका ऐसी हो जैसी  पहले किसी हीरोइन की नहीं रही. अब्बास ने ठीक वही, बल्कि उससे ज़्यादा, कर दिखाया. ‘अनहोनी’ न सिर्फ़ पहली नारी-मनोवैज्ञानिक फिल्म थी बल्कि नायिका के ‘डुअल रोल’ वाली पहली ऐतिहासिक भारतीय फिल्म भी थी. हालाँकि नर्गिस बहुत बाद में ‘रात और दिन’ में भी ऐसी ही दुहरी भूमिका निभाने वाली थीं लेकिन ‘अनहोनी’ में अब्बास का यह करिश्मा खेल बदल देने वाला था. नर्गिस की वह भूमिका और अदाकारी कुछ महानतम उपलब्धियों में शुमार की जाती है और महिला-एक्टिंग की एक ‘प्रैक्टिकल’ पाठ्य-पुस्तक या ‘मास्टरक्लास’ की तरह है. सच तो यह है कि ‘अनहोनी’ में राज कपूर के साथ यह अनहोनी हुई कि वह नर्गिस के सहायक अभिनेता की तरह नज़र आया. लेकिन वह ज़माना पूर्णरूपेण टुच्चे ईगोटिज्म का न होकर कुछ ‘महान विचारों’, चुनौतियों तथा फ़न और हुनर को समर्पण का भी था. ध्यान रहे कि यह अब्बास की पहली aut फिल्म थी. 1952 में ’आन’, ’बैजू बावरा’, ’जाल’ और ‘दाग’ के बाद ‘अनहोनी’ ने बॉक्स-ऑफिस पर सबसे ज़्यादा कमाई की थी, हालाँकि वह 1950 के ‘आवारा’ से बहुत कम थी लेकिन फिल्म हिट थी.

अब्बास के फ़िल्मी जीवन में एक पैटर्न देखा जा सकता है. उन्होंने बीसियों फिल्मों का निदेशन किया और उस हैसियत से अंतर्राष्ट्रीय ख्याति अर्जित की लेकिन उस अहंकार में उन्होंने कभी-भी दूसरों के या ‘दूसरे’ सिनेमा के लिए कहानियाँ, पटकथा या संवाद लिखने से गुरेज़ नहीं किया. इसके पीछे एक मार्क्सवादी श्रमजीवी का ‘प्रोफ़ेशनलिज्म’ तो था ही, साथ में अपनी फ़िल्में अपनी कमाई, अपनी शर्तों और अपनी मर्जी से बनाने की एक प्रतिबद्ध रणनीति भी थी. उनके नाम से जुड़ी हुई कोई भी फिल्म यदि चर्चित या सफल होती थी तो उस ख्याति का फ़ौरन फ़ायदा उठा कर वह अपनी कोई नई फिल्म की घोषणा कर देते थे जिसमें अपनी यत्किंचित् पूंजी तो लगाते ही थे, पुराने या नए मित्रों, प्रशंसकों, आशावादी फ़िनान्सिअरों से भी पैसे उगाह लेते थे. यह उन्हीं की सूझ-बूझ नहीं थी, अनेक मुसीबतज़दा निर्माता-निदेशक आज भी ऐसा ही करते हैं. एक तो वह निस्बतन सस्ती फिल्मों का ज़माना था, दूसरे अब्बास को भी (कभी-कभी ज़रूरत से ज़्यादा) किफ़ायती फ़िल्में बनाना आता था. दरअसल वह वाजिब लागत की फ़िल्में ही बनाना चाहते थे. उनकी कुछ फ़िल्में अच्छी चलीं, कुछ अपनी लागत ही वसूल कर पाईं लेकिन बहुत कम इतनी नाकामयाब हुईं कि अब्बास दीवालिया होकर सड़क पर आ जाते.

1953 की फिल्म ‘राही’ शायद उनकी सबसे महत्वाकांक्षी फिल्मों में गिनी जाए. ब्रिटिश-कालीन चाय बागान की पृष्ठभूमि पर आधारित अपने प्रगतिशील-युग के मित्र मुल्कराज आनंद के विख्यात अंग्रेज़ी उपन्यास ‘टू लीव्ज़ एंड अ बड’ पर बनाई गई इस फिल्म में उस ज़माने की बॉक्स-ऑफिस जोड़ी देवानंद-नलिनी जयवंत और हिंदी फिल्मों के पहले और आख़िरी कम्यूनिस्ट और महान अभिनेता बलराज साहनी ने काम किया था और संगीत अनिल बिस्वास का था जिनकी फिल्म के शीर्षक पर आधारित कालजयी धुन ‘इस पल रुक जाना, जाने वाले राही’ और उपन्यास के शीर्षक पर आधारित कोरल  थीम-सॉंग ‘इक कली दो पतियाँ जाने हमरी सब बतियाँ’ पुराने नहीं पड़े हैं. कहा जाता है कि फिल्म टिकट-खिड़की पर मक़बूल रही थी लेकिन याद नहीं आता कि हमारे क़स्बे छिन्दवाड़ा तक पहुँची हो. उसके बाद, दुर्भाग्यवश, अब्बास ने बिना गानों की शायद पहली फिल्म ‘मुन्ना’ बनाकर एक जुआ खेला लेकिन पाँसे उलटे पड़े. फिल्म असफल रही पर इस योग्य समझी गई कि लन्दन में ‘पथेर पांचाली’ के साथ दिखाई जाए और पॉल रोथा उसकी सराहना करें. बहुत बाद में चेतन आनंद ने ‘मुन्ना’ की कहानी का इस्तेमाल ‘आख़िरी ख़त’ के लिए किया जो अपने अमर गीत ‘बहारो,मेरा जीवन भी संवारो’ के साथ सफल रही.

‘आवारा’ के सुपर-हिट कहानी-पटकथा-संवाद के यौगिक को दुहराते हुए राज कपूर ने 1955 में यह तिहरी ज़िम्मेदारी फिर अब्बास को सौंपी, जिसका अज़ीमुश्शान नतीज़ा था ‘श्री 420’, जो ‘आवारा’ से कहीं बेहतर फिल्म तो है ही, आज साठवें साल में भी इतनी अकाट्य है कि उससे एक फ़्रेम, एक शॉट, एक डायलॉग, एक आइडिआ निकालना लगभग असंभव है. ‘आवारा’ आज एक सीमित, आरोपित और ‘लेबर्ड’ समस्या लगती है जबकि ‘श्री 420’ अपने पहले चंद लम्हों में ही सर्वहारा और पूंजी के चिरंतन द्वंद्व में कूद पड़ती है. 1955 में अलाहाबाद यूनिवर्सिटी का सिर्फ़ एक गोल्ड मैडलिस्ट मुड़-मुड़ के न देखने के लिए सेठ सोनाचंद धर्मानंद की पत्तेबाज़ बम्बैया ‘दोल्चे वीता’ दुनिया द्वारा निगल लिया गया था, आज लाखों राज इसीलिए सुनहरी तमग़ा पाना चाहते हैं कि कैम्पस पर ही ‘बॉडी स्नैचर्स’ उन्हें आकर तिब्बत में सोने की ‘स्कैम’ दुनिया में ले जाएँ, उनके द्वारा लाखों को करोड़ों-अरबों से ठगा जाए, अपने निजी घर के सपने दिखलाकर नौदौलतिए सिन्धी, पंजाबी, मारवाड़ी बिल्डर मुंबई के झोपड़पट्टीवालों को फ़ुटपाथों पर फेक दें, ईमानदार, मेहनती निम्न और मध्यवर्गीय सुफ़ैदगरेबानों की ज़िंदगी-भर की जमा-पूंजी लूट कर चम्पत हो जाएँ.

अब्बास और राज कपूर के परस्पर बहुविध सहयोग का गहरा विश्लेषण शायद अब तक हुआ नहीं है. ‘आवारा’, ‘अनहोनी’, ‘श्री 420’, ‘जागते रहो’, ‘चार दिल चार राहें’, ‘मेरा नाम जोकर’, ‘बॉबी’ और (मरणोपरांत) ‘हिना’ के माध्यम से अब्बास ने बतौर निर्माता, निर्देशक और अभिनेता के राज कपूर की, और एक निर्माण-गृह के रूप में आर.के.फिल्म्स की, जो छवि राष्ट्रीय-वैश्विक स्तर निर्मित की वह हिंदी फिल्म के इतिहास में अद्वितीय संगत है. दुर्भाग्य यह है कि इस चार दशक लम्बे साथ पर न तो राज कपूर ने सविस्तार लिखा और न अब्बास ने, और हमारे मित्र जयप्रकाश चौकसे तो दोनों को ख़ूब जानते हुए भी  ‘भास्कर’ के अपने प्रेम-लपेटे अटपटे कॉलम में ही मगन हैं. बहरहाल, ‘आवारा’ का शीर्षक भले ही चैप्लिन के ‘ट्रैम्प’ से प्रेरित हो, उसमें राज कपूर का किरदार मार्लन ब्रैंडो या जेम्स डीन के ज़्यादा करीब है लेकिन वह पहले ही दिलीप कुमार का इलाका बन चुका था, इसलिए ‘श्री 420’ में अब्बास ने मूलतः वामपंथी चार्ली चैप्लिन से सीख कर राज कपूर को जो पहली बार आपादमस्तक ‘चैप्लिनिस्क’ ‘कॉमिक हीरो’ बनाया उसने उनकी वह छवि सदा-सर्वदा के लिए पेटेंट कर दी. यूँ राज कपूर जब भी अपनी वाली पर आते थे तो दिलीप की टक्कर के ट्रैजिक हीरो भी बन जाते थे – ‘श्री 420’ में ही उनका एक पुराना मुखौटा उतारने और नया पहनने का सीन है जो लाजवाब है, और फिल्म के टाइटिल्स के पीछे ग्रीक ट्रैजिक-कॉमिक मास्कों का बहुत सार्थक इस्तेमाल किया गया है - लेकिन उनमें थोड़ी रूमानियत रहती ही थी, दिलीप-जैसा अस्तित्ववादी ‘मिस्टीक’ आ नहीं पाता था.

‘श्री 420’ में चार्लियत और चैप्लिनीयता के इतने तत्व हैं कि उस पर सिनेमा में एम.फ़िल. की एक तुलनात्मक शोध-निबंधिका लिखी जा सकती है. अब्बास में यदि राज कपूर के क़द-बुत, शरीर-भाषा, सलाहियत, प्रतिभा वगैरह की समझ न होती और राज कपूर अब्बास के दिमाग़ और ‘कमिटमेंट’ को जान न पाया होता तो यह फिल्म जैसी बनी है वैसी बन ही न पाती. इसमें छोटे-से-छोटा ‘केमिओ’ या ‘एक्स्ट्रा’ तक लगता है हमारे छिन्दवाड़ा के कुशल, अब दिवंगत, ‘मास्टर-क्राफ्ट्समैन’ छुट्टू कुम्हार द्वारा अपने चाक पर गढ़ा गया है. मैं इसे राज कपूर की सबसे बड़ी फिल्म मानता हूँ लेकिन अब्बास की लेखनी के बिना यह इतनी बुलंदी छू ही नहीं सकती थी. अब्बास के बगैर भी राज कपूर ने सफल फ़िल्में बनाईं मगर  उनमें सार्थकता और बौद्धिक कलात्मकता का अभाव ही रहा. आज साठ वर्ष बाद भी ‘श्री 420’ का जादू कम नहीं हुआ है, जिसमें संगीत की अहम भूमिका को नकारा नहीं जा सकता. लेकिन अब्बास की महान उपलब्धि है पूंजीपति खलनायक सेठ सोनाचंद धर्मानंद का किरदार, जिसके लिए नीमो को मानों स्वयं ईश्वर ने अपने हाथों से रचा था. उन्हें ‘कास्ट’ करने का कमाल किसका था यह मालूम नहीं लेकिन अब्बास ने नीमो को जो शख्सियत, दृश्य और संवाद दिए हैं वह अद्भुत हैं. उनका ‘पीपलीनगर में कपड़े ही कपड़े हैं’ और ‘नो,राज,नो’ कहने का अंदाज़ बेमिसाल है. 1955 में पता नहीं कितने सेठ सोनाचंद थे, आज तो हर कॉर्पोरेट हाउस, अखबार और टीवी चैनल का सी.ई.ओ. उसका वंशज नज़र आता है. अब्बास ने अपनी प्रतिबद्ध पत्रकारिता से ‘श्री 420’ को कितना मालामाल किया है, इसका भी विश्लेषण अभी होने को है. सेठ सोनाचंद धर्मानन्द से अधिक ‘कम्प्लीट’ खलनायक हिंदी परदे पर फिर दिखाई न दिया. सिर्फ़ नीमो के लिए यह फिल्म बार-बार देखी जानी चाहिए.

‘जागते रहो’ में राज कपूर का एकमात्र, अंतिम एकालाप फिल्म का खुलासा है. उसके बाद अब्बास ने सोवियत संघ के सहयोग से निर्मित अपनी महत्वाकांक्षी हिंदी-रूसी फिल्म ‘परदेसी’ का पटकथा-लेखन-निदेशन किया, जिसके रूसी रूपांतर के निदेशक वासिली प्रोनीन थे. अफ़ानासी निकीतीन नामक एक ईसाई रूसी व्यापारी, जो भारत आने वाला दूसरा यूरोपीय व्यक्ति था, 15वीं सदी में किसी तरह महाराष्ट्र. कहते हैं आज की मुंबई के पास के एक गाँव में, पहुँच सका और तीन बरस इस देश में रहा. निकीतीन का मृत्यु-वर्ष 1472 ही मालूम है. उन दिनों उत्तर-पश्चिमी दक्षिण भारत पर देश की पहली आज़ाद मुस्लिम, बहमनी, सल्तनत का निज़ाम था जो दिल्ली के मोहम्मद बिन तुग़लक़ से बग़ावत के बाद वुजूद में आई थी. निकीतीन ने अपने भारत-प्रवास पर रूसी में ‘खोषदेनिए ज़ा त्री मोर्या’ (‘तीन समन्दरों का सफ़र’) शीर्षक से  बहुत दिलचस्प और मूल्यवान संस्मरण लिखे हैं और ऐसा शक़ किया जाता है कि वह (सुन्नी) मुस्लिम हो गया था. बहरहाल, वह वाक़ई भारत-रूस संबंधों का पहला, असली प्रतीक और प्रतिनिधि है. ‘परदेसी’ ऐतिहासिक नहीं, तत्कालीन सामाजिक फिल्म है जिसमें अफ़ानासी को एक मराठी, हिन्दू युवती चंपा की मुहब्बत की गिरफ़्त में दिखाया जाता है. ओलेग स्त्रीषेनौफ़, जिन्होंने निकीतीन की भूमिका निबाही थी, के बारे में अब तक पता नहीं चल सका है कि सोवियत संघ में उनकी ख्याति क्या थी – दरअसल भारत में देखे गए वह पहले और अंतिम रूसी हीरो थे – लेकिन चंपा का किरदार नर्गिस को मिला जिनसे उनकी ‘आवारा’ की घनघोर लोकप्रियता की वजह से लगभग हर सोवियत नागरिक परिचित था.

‘परदेसी’ जैसी फ़िल्मों की क्या मजाल कि वे सारे जहाँ से अच्छा अरुण यह मधुमय देश हमारा में चल भी पाएँ लेकिन अपरिचित, कमज़ोर, दढ़ियल, रूसी हीरो के बावजूद वह दिलचस्प है. नर्गिस, पद्मिनी, पृथ्वीराज कपूर और डेविड तो उसमें हैं ही, लोकशाहीर की भूमिका में बलराज साहनी और अनिल बिस्वास के संगीत पर गाया गया प्रेम धवन रचित उनका मन्ना डे और शुरूआती कोरस वाला उद्बोध-गीत ‘भई तुझमें राम मुझमें राम सबमें राम समाया’, जो आज भी रोंगटे खड़े कर देता है, अविस्मरणीय हैं. सोवियत सहयोग के कारण ‘परदेसी’ पहली भारतीय रंगीन वाइड-स्क्रीन सिनेमास्कोप फिल्म होने का श्रेय भी प्राप्त कर सकी. ‘अलविदा’ के लिए रूसी शब्द ‘दस्वीदान्या’ पहली बार इसी में सुना गया. इसके बाद अब्बास साहब ने ‘ज़िन्दगी या तूफ़ान’ जैसी अकालकवलित फिल्म के कहानी-संवाद लिखकर खुद को रुसवा किया.

उनके करिअर में ऐसे उतार-चढ़ाव आते ही रहे. ऐसा लगता है कि उनके भीतर जो क्लासिकी ‘एजिटप्रॉप’ कॉमरेड बैठा हुआ था उस पर जल्द नतीज़े और असर का शैदाई मुसन्निफ़-अख़बारनवीस ज़्यादा हावी था और वह उससे जाने-अनजाने कतराते थे, या उसकी परवाह नहीं करते थे, जिसे वह अपने लिए ज़रुरत से ज़्यादा ‘कलात्मकता’ या ‘कलावादिता’ समझते रहे होंगे. मैं राज कपूर को अब्बास का एक शरारती, तेज़ शागिर्द ही समझता हूँ जो जब-जब करें इरादे अपने उस्ताद की क्लास में जा बैठता भी था और ‘बंक’ भी करता रहता था. दरअसल अब्बास को शायद राज कपूर से लोकप्रिय कला का हुनर सीखना चाहिए था और राज कपूर को अपनी ग़ैर-अब्बासीय फिल्मों में उन-जैसा ‘कमिटमेंट’. इस पर बहस हो सकती है कि यदि राज कपूर (या बिमल रॉय,या हृषीकेश मुखर्जी) ‘राही’, ’ग्यारह हज़ार लड़कियाँ’, ‘शहर और सपना’, ‘आसमान महल’, ‘बंबई रात की बांहों में’, ‘सात हिन्दुस्तानी’, ‘द नक्सलाइट्स’ या ‘लव इन गोआ’ जैसी फ़िल्में बनाना चाहते तो क्या उनमें ज़्यादा ‘सफल’ रचाव-बसाव नहीं होता?

ऐसी सारी यदिकिन्तुवादी अटकलबाज़ी के बावजूद यह लगभग तय है कि 1959 में ‘चार दिल चार राहें’ जैसी प्रतिबद्ध किन्तु प्रयोगशील फिल्म बनाने की ख़ुद्कुशीपज़ीर दीवानगी सिर्फ़ अब्बास में थी. एक चौरस्ते पर तीन प्रेम कहानियाँ और एक शहादत की कथा – चारों में कोई सम्बन्ध नहीं – रेखागणित की तरह एक-दूसरे को अनजाने काटती हुई अपनी-अपनी कभी सफल कभी असफल राहों पर निकल जाती हैं. बहुत कम लक्ष्य किया गया है कि राज कपूर–मीना कुमारी की प्रेम-कथा हिन्दू सवर्ण उत्तराधिकारी और अनुसूचित जाति-बाल विधवा  की है, अजीत एक भोला-भाला दोटूक पठान मोटर-चालक और निम्मी एक ‘संभ्रांत’ तवायफ है, शम्मी कपूर एक अनाथ ईसाई युवक है और कुमकुम एक ग़रीब और शोषित आया, और जयराज अपनी जान से ज़्यादा अपने आन्दोलन से मुहब्बत करनेवाला सक्रियतावादी. गाँव की खापें और राज कपूर का अहीर-चौधरी परिवार शादी के ख़िलाफ़ हैं लेकिन हिंदी फिल्मों के एक महानतम दृश्य में दूल्हा बना हुआ अकेला राज कपूर एक मशाल और एक ढोलची के साथ संकरी गलियों से चौड़े-धाड़े धमधमाता गुज़रता हुआ अपनी दुल्हन मीना कुमारी को लिवाने जाता है. शम्मी कपूर ने एक छोटी-सी भूमिका में अपने जीवन की पहली और अंतिम मार्मिक एक्टिंग की है. मीना कुमारी, निम्मी, कुमकुम, अजीत सभी अपने उरूज पर हैं. साहिर ने मुकेश के लिए ‘नहीं किया तो करके देख’ और लता के वास्ते ‘इन्तिज़ार और अभी’ जैसे गीत लिखे हैं जिन्हें अनिल बिस्वास ने अमर कर दिया है. लेकिन फिल्म को चलना नहीं था सो नहीं चली. ‘बॉबी’ चली जिसने नौबालिग़ ऋषि कपूर-डिंपल को और अधेड़ प्रेमनाथ को स्टार बना दिया, और ज़ेबा बख्तियार को भारत में ‘हिना’ ने. कहानियाँ अब्बास की थीं.

1942-1980 के बीच अब्बास को सिनेमा के लिए दर्ज़नों छोटे-बड़े सम्मान और पुरस्कार मिले. उनकी कई फ़िल्में अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोहों के चक्कर लगाती रहीं. उन्होंने सिने-संसार को अनेक प्रतिभाएं दीं. लेकिन एक दोस्त फिक्रमंद बाप ने उन्हें ख़त लिखा कि उसका बेटा फिल्म-लाइन में स्ट्रगल कर रहा है, हो सके तो उसे कैसा भी कोई चांस दो. बाप खुद कोई मामूली आदमी नहीं था, जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गाँधी के रिश्तेदार-जैसा था. सो अब्बास ने अपने दोस्त हरिवंशराय बच्चन के बेटे अमिताभ बच्चन को एक नौजवान बिहारी मुस्लिम शायर अनवर अली ‘अनवर’ के किरदार में 1969 में ‘सात हिन्दुस्तानी’ में ‘ब्रेक’ दिया. यह एक पूरी तरह सेauteur फिल्म थी. आज की नई दर्शक पीढ़ी, जो ख्वाजा अहमद अब्बास को न जानती है, न जानना चाहती है क्योंकि शायद जानने की सलाहियत नहीं रखती, इसी से तरद्दुद में पड़ सकती है कि अमिताभ बच्चन को ‘डिस्कवर’ करने वाले इस ख्वाजा को कैसे डिस्कवर किया जाए. जबकि खुद अब्बास ने अमिताभ की अपनी ‘खोज’ को कभी तूल नहीं दिया. वह तो उनके कारनामों की किताब में महज़ एक दिलचस्प, शायद ज़रूरी भी, फ़ुटनोट है. दूसरे तो इससे एक पूरी तिजारत कर लेते. देखा जाए तो खुद अब्बास आजीवन कई स्तरों पर एक महान स्ट्रग्लर रहे. ‘द नक्सलाइट्स’ सरीखी बाद की फिल्म को लेकर भी, जिसमें मिथुन चक्रवर्ती और स्मिता पाटिल थे और इंदिरा गाँधी तब जीवित थीं, वह परेशानी में पड़ चुके थे. उनकी मृत्यु से पहले ही भारतीय सिनेमा में उन जैसा कोई दूसरा प्रतिबद्ध फिल्मकार नहीं था और उनके बाद, विशेषतः अब, सुदूर भविष्य में भी, किसी युवा अब्बास की कल्पना कठिन है. यह ज़रूर है कि उनकी फिल्मों को, उनके पैग़ामों को, जो कई मुक़ाबलों और संघर्षों में हौसलाअफ़ज़ा और कारगर रहेंगे, नेस्तनाबूद कर पाना नामुमकिन साबित होगा. अगले सौ बरसों तक हमें एक बड़ा सहारा ख्वाजा अहमद अब्बास की फिल्मों का भी है.

मंगलवार, 1 अप्रैल 2014

विष्णु खरे की तीन नई कविताएँ

(विष्णु खरे की ये कविताएँ प्रसार भारती और दूरदर्शन की पत्रिका 'दृश्यान्तर' के मार्च अंक में प्रकाशित हैं. विष्णु खरे एक मार्गदर्शक कवि होने के साथ कई मौकों पर जटिल कवि होने के लिए भी प्रसिद्ध हैं लेकिन 'जटिलता' का समग्र अर्थ गड्डमड्ड हो, इसलिए इसे बता देना ज़्यादा सही होगा कि यह जटिलता सिर्फ़ विषय तक ही सीमित है. उदाहरण के लिए आगे लिखी 'दज्जाल' को ही लें, उर्दू के कुछ कठिन शब्दों से सजा होने के बावजूद बिना शब्दकोश खोले, यह अपने को आपके सामने पूरी बेबाकी से प्रस्तुत कर देती है. सड़क और उसकी पारिस्थितिकी में पसरे विलाप को विस्तार देने में विष्णु खरे से अलग कोई दूसरा नाम दृश्य में सम्भव नहीं है. भारत में लोकसभा चुनाव सिर पर है, इसके साथ ही आवाजाही का दौर भी सामने आना शुरू हो चुका है. मौकों पर कविता छोड़कर सभी चीज़ें मिल रही थीं. लीजिए, सामने कविताएँ है, जिनकी प्रासंगिकता चुनाव पर भी उतनी ही निर्भर है जितना उनके समूल अर्थ पर.. मुझे नहीं याद कि २०१४ लोकसभा चुनाव के मद्देनज़र कुछेक वरिष्ठों से इतर किसी अन्य ने लिखा हो, जिनसे आशाएँ थीं वे रीशफलिंग का शिकार होते नज़र आ रहे हैं. बुद्धू-बक्सा के लिए हर्ष का विषय है कि विष्णु खरे को प्रतिष्ठित मराठी प्रकाशन संस्था 'मुक्त शब्द' द्वारा स्थापित और 22 मार्च को घोषित पहला 'अखिल भारतीय नामदेव ढसाळ स्मृति पुरस्कार' 3 मई को मुम्बई में दिया जाएगा. इन कविताओं के लिए बुद्धू-बक्सा दृश्यान्तर सम्पादक अजित राय और कवि का आभारी.)

दज्जाल
(इस्लामी क़यामत से पहले आनेवाला दानव, जिसका वध ईसा या मेहदी करेंगे। असद जै़दी को, पहले हवाले के लिए।)

न यह इस्फ़हान के रस्तक़ाबाद से आया है
न इसका नाम सफ़ी बिन सईद है
इस सदी में मुख्तलिफ़ मुल्कों में
मुख्तलिफ़ इस्मों से नाजि़ल हो रहे हैं दज्जाल
उनकी दोनों आँखें होती हैं अंगूर की तरह नहीं
कबंध की तरह

लोग पहले से ही कर रहे हैं इबादत इबलीस की
उनकी आँखों की शर्म कभी की मर चुकी
बेईमानी मक्र-ओ-फ़रेब उनकी पारसाई और जि़न्दगानी बन चुके
अपने ईमान गिरवी रखे हुए उन्हें ज़माने हुए
उनकी मज़बूरी है कि अल्लाह उन्हें दीखता नहीं
वर्ना वे उस पर भी रिबा और रिश्वत आज़मा लें
मशाइख़ और दानिश्वरों की बेहुर्मती का चौतरफ़ा रिवाज़ है
कहीं-न-कहीं कहत पड़ा हुआ है मुल्क में
क़त्ल और खुदकुशी का चलन है
कौन-सा गुनाह है जो नहीं होता

दज्जाल ठीक यही कहता हुआ आएगा
उस दिन लगेगा कि सूरज पच्छिम से उगा है
क्योंकि वहीं से उभरेगा दज्जाल
इबलीस का ज़ाहिद-ओ-आबिद होगा वह
लेकिन उसकी मुख़ालिफ़त का स्वांग करेगा
कहेगा उसी को नेस्तनाबूद करने उतरा है वह
सारी बदी को ख़त्म करने और नेकी का निज़ाम लौटाने का वादा करेगा
वह बक़्क़ाल शाहे-आदमज़ाद बनने के हौसले में
बेचेगा जन्नत के ख्वाब कहेगा मेरा ही इन्तिख़ाब करो
और गुमराह क़ौमें उसके हाथों क़दमों और जि़ल्ल को चूमने लगेंगी
दीवानावार उसकी मोतकिद हो जाएँगी

फिर वह एलान करेगा कि नबूवत भी उसी की है
और ख़ुदाई भी उसी की
परस्तिन्दों को एक में ही
दोनों के दीदार-ओ-इबादत का सुभीता हो जाएगा

लेकिन दज्जाल अपनी असली किमाश को
कब तक पोशीदा रख सकता है
जब उसका दहशतनाक़ चेहरा सामने आएगा
और वह वही सब करेगा जिसके खि़लाफ़ उतरने का
उसने दावा और वादा किया था
बल्कि और भी बेख़ौफ़ उरियानी और दरिन्दगी से
तो अगर तबाही से बचे तो ख़ून के आँसू रोते हुए अवाम
ज़मीन पर गिर कर छटपटाने लगेंगे
किसी इब्ने-मरिअम किसी मेहदी किसी कल्कि की दुहाई देते हुए

जो आए भी तो तभी आएँगे जब क़ौमें पहले ख़ुद खड़ी नहीं हो जाएँगी
दज्जाल की शनाख़्त कर शय्याद मसीहा के खि़लाफ़


फ़ासला
(वर्णित मढ़ा-हुआ फ़ोटो मित्र-पत्रकार कुलदीप कुमार के ‘पायनियर’ कैबिन में लगा रहता था। यह उसके अज्ञात फ़ोटोग्राफ़र को समर्पित।)

थोड़ा झुका हुआ देहाती लगता एक पैदल आदमी
अपने बाएँ कंधे पर एक झूलती-सी हुई वैसी ही औरत को ढोता हुआ
जो एक हाथ से उसकी गर्दन का सहारा लिए हुए है
जिसके बाएँ पैर पर पंजे से लेकर घुटने तक पलस्तर
दोनों के बदन पर फ़क़त एकदम ज़रूरी कपड़े
अलबत्ता दोनों नंगे पाँव
उनकी दिखती हुई पीठों से अंदाज़ होता है
कि चेहरे भी अधेड़ और सादा रहे होंगे

दिल्ली के किसी चैंधियाते दिन में ली गई स्याह-सुफ़ैद तस्वीर थी वह
शायद 4.5 या सुपर 1200 एमएम टेलीलेंस वाले
किसी कैनन ए ई 1 या निकोर एफ़ 801 से खींची गई -
फोटोग्राफ़र ने खुद को मोहनसिंह प्लेस या खड़कसिंह मार्ग के
एम्पोरिअमों के सामने कहीं स्थित किया होगा

यह मान लेने में कोई हर्ज़ नहीं कि ले जाई जा रही औरत
ढोने वाले आदमी की ब्याहता ही रही होगी
लेकिन दूर-दूर तक दोनों के साथ और कोई (आखि़र क्यों) नहीं

सड़क के बाएँ से उन्हीं की दिशा में जाता हुआ
एक ख़ाली ऑटो वाला कुछ उम्मीद से यह मंज़र देखता है
दाईं ओर के एंबेसेडर और मारुति के ड्राइवर हैरत और कुतूहल से -
उन दोनों के अलावा सड़क पर और कोई पैदल नहीं है
जिससे धूप और वक़्त का अंदाज़ा होता है

यह लोग जंतर-मंतर नहीं जा रहे
आगे चल कर यह राह विलिंग्डन अस्पताल पहुँचेगी
जहाँ शायद इन्हें पलस्तर कटवाना है
या क्या मालूम पाँव और बिगड़ गया हो
ऐसे लोगों के साथ पचास रोने लगे रहते हैं
एक तो यही दिखता है कि इनके पास कोई सवारी करने तक के पैसे नहीं हैं
या आदमी इस तरह आठ-दस रुपये बचा रहा है
जिसमें दोनों की रज़ामंदी दिखती है
इनकी दुनिया में कहीं भी कैसा भी बोझ उठाने में शर्मिंदगी नहीं होती
यह तो आखि़र घरवाली रही होगी

वह सती शव नहीं थी अपंग थी
यह एकाकी शिव जिसे उठाए हुए अच्छी करने ले जा रहा था
किसी का यज्ञ-विध्वंस करने नहीं

किस तरह की बातें करते हुए यह रास्ता काट रहे थे
या एकदम चुप्पी में क्या-क्या सोचते हुए
शायद किसी पेड़ का सहारा लेकर सुस्ताए हों
क्या रास्ते के इक्का-दुक्का लोगों ने इसे माँगने का एक नया तरीक़ा समझा
फिर भी अगर किसी ने कुछ दिया तो इनने लिया या नहीं
अस्पताल पहुँचे या नहीं
पहुँचे तो वहाँ क्या बीती

शायद उसने कहा हो
कब तक ले जाते रहोगे
यहीं कहीं पटक दो मेरे को और लौट जाओ
उसने जवाब दिया हो
चबर चबर मत कर लटकी रह

खड़कसिंह से विलिंग्डन बहुत दूर नहीं
लेकिन एक आदमी एक औरत को उठाए हुए
कितनी देर में वहाँ पहुँच सकता है
यह कहीं दर्ज नहीं है

मुझे अभी तक दिख रहा है
कि वह दोनों अब भी कहीं रास्ते में ही हैं
गाड़ियों में जाते हुए लोग उन्हें देख तो रहे हैं
लेकिन कोई उनसे रुक कर पूछता तक नहीं
बैठाल कर पहुँचाने की बात तो युगों दूर है


जा, और हम्मामबादगर्द की ख़बर ला
(हातिम को सौंपा हुआ आखि़री जिम्मा)

पहले मिलते हैं तनोमंद दीवाने नौजवान जो डूब जाते हैं
बेरहम परीज़ादियों की सराबी मुहब्बत में
फिर कहीं आगे उन आदमज़ाद दोशीज़ाओं की नुमाइश होती है
जिन्हें अज़दहे पसंद कर उठा ले जाते हैं
वहाँ होते हैं जिन्नात जिनके पास
किसी शय की कि़ल्लत नहीं होती
उकाब बबर कल्ब रूबा की मिली-जुली शक्लो-सूरत
वह कभी-भी अख्तियार कर लेते हैं
उनकी दुम शिगाल की मानिंद होती है
लगता है उनकी आवाज़ जहन्नुम से आती है

वहाँ रेगिस्तान फ़िलिज़्ज़ के होते हैं
जहाँ सुनहरी ख़ारों की फ़सलें तलुओं को लहूलुहान कर डालती हैं
वहाँ कातान के बादशाह हर मुमकिन कोशिश करते हैं कि कोई
उनके तिलिस्मों तक न पहुँचे
पहुँचे तो उन्हें तोड़कर ज़िंदा न लौटे

वहाँ दालाने-ग़ुस्ल की गुम्बद चट्टानों में बदल जाती है
इन्सान अगर वहाँ डूबता नहीं है
तो खुद को सहरा में पाता है
फिर नमूदार होता है एक ऐवान
जिसके बाग़ के गुलों और मेवों से तस्कीन नहीं होती
जिसके अन्दर होते हैं मर्मर के मुजस्समे
एक कतार में खड़े
पैर से कमर तक पथराए हुए

वहाँ कफ़स में होता है उड़ता फड़फड़ाता
एक तोता इंसानों की ज़ुबान बोलता हुआ
जिसकी शिक्म में बादशाह क़ैयूमारात ने छिपा रखा है
दुनिया के नायाबतर हीरे को
और जो तीन तीरों में उस ख़ुद-रवाँ परिंदे की गर्दन काट नहीं देता
वह पत्थर का होता जाता है

तीसरे तीर से जब तोते का सर धड़ से अलग हुआ
तब घनगरज हुई बिजलियाँ कौंधीं अँधेरा छा गया
अपनी संगियत से रिहा हुआ मैं
सारे मुजस्समे जि़न्दा हो गए वे सब मुझसे पहले आए थे
मेरे पैरों के पास पड़े हुए थे तीर-कमान
और यह हीरा जो मैं बतौर सुबूत साथ ले आया हूँ
लेकिन जिसे मुझे इसके हक़दारों को लौटाना है

वह तेरी आखि़री पुर्सिश थी या मुराद
लेकिन उसका यही जवाब ला सका मैं ऐ हुस्नबानू
शुक्र है तेरी धाय को यह सात ही मालूम थीं
वर्ना मैं आजिज़ आ ही रहा था लगातार सामने नुमूदार नंगीमुनंगी हूरों
और मेरे चूतड़ों के गोश्त के लिए पीछा करनेवाले लज़्ज़तपसंद भेड़ियों से
अभी न जाने कितने शुब्हो-सवाल मेरा इन्तिज़ार कर रहे हैं यमन में
कितनी जद्दोजहद
अच्छा हुआ तूने मुझे उनकी आदत डाल दी
लौटते हुए मुनीरशामी को बताता जाऊँगा कि अब तू उसकी हुई
परवरदिगार उसकी मुहब्बत और तेरी जौजि़यत को महफ़ूज़ रक्खे
तुम दोनों का कितना शुक्रिया अदा करूँ
जो तुम्हारी वजह से हासिल कर पाया
पसोपेश और मुसीबत के हर लम्हे में
हज़रत ख़्वाज़ा खि़ज़्र के मेहरबान मुक़द्दस साये की रहनुमाई को -
उनके पास दोनों जहान के सारे सवालों के हल हैं

मंगलवार, 18 फ़रवरी 2014

वर्षारम्भ, आलोचना और प्रासंगिकता

[जैसा कि बहुत सारे पाठक जान रहे होंगे कि ये गद्यांश विष्णु खरे के निबन्ध ‘उदासीन परिवेश और आलोचना’ के हैं जो ‘आलोचना की पहली किताब’ में संकलित है. यह भी जान लेना उचित है कि यह लेख अशोक वाजपेयी द्वारा भोपाल में आयोजित एक सेमीनार में पहली दफ़ा पढ़ा गया. मुद्दा ये है कि 1980-81 में लिखे गए एक लेख की प्रासंगिकता 2014 के किसी एक दिन कैसे बढ़ गयी? बुद्धू-बक्सा पर यह इस साल सबसे पहले आने वाली रचना होना चाहता था और हुआ भी, वह बात अलग है कि साल ही थोड़ा देर से शुरू हुआ. लेकिन बात आती है प्रासंगिकता की. इस समय हिन्दी में आलोचना जिस स्तर से जूझ रही है, वह खुद उसी का बनाया हुआ है. हमनें आत्मप्रशंसा और दोस्तों द्वारा की गयी लाचारी भरी तारीफ़ को रचना का मापदंड बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रखी है. आधे से ज़्यादा अच्छे युवा कवि, जो अच्छे आलोचक भी हैं/थे, मेले-झमेले में रचनात्मकता नष्ट कर रहे हैं. कुछेक जो हैं, वे झूठी प्रोफ़ाइलों से कविता पर बहस जगाने की कोशिश कर रहे हैं. हिन्दी के अच्छे ब्लॉग, जो एक समय वेब के सशक्त माध्यम होने की पैरवी करते थे, वे ऐसे ‘आइडल’ पड़े हैं मानो वे ऐसे ही थे. 2013 में जो भी आलोचना का चेहरा मुखर होकर सामने आया, एकाध को छोड़कर सभी को नाम लेने में तकलीफ़ होती है. गाहे-बगाहे इन सभी नामों से हम वाकिफ़ हैं, जो फ़लक से दूर भागने में रत है. लेखक और समाज के लिए आलोचना के महत्व को यह निबन्ध संजोकर चलता है. यह विष्णु खरे के उस आंकलन को भी और बल देता है जहाँ वे हिन्दी की सबसे बड़ी समस्या ‘निर्भीकता का न होना’ बताते हैं. काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग से यदि एक वरिष्ठ कवि नामवर सिंह का नाम लिए बिना निकल आता है, तो गुर्गे बिलबिला उठते हैं. अब यही प्राध्यापक-कम-गुर्गे से लगभग जुड़ा मजमून भी इस गद्यखंड में मिलता है, इसलिए भी यह प्रासंगिक है. निर्भीकता की बात करें, तो प्रासंगिकता का फ़लक और खुलता है. गैंग और गैंगवार पर बात आ जाए, तो ‘मेरा इशारा किस तरफ़ है’ से भी यह लेख प्रासंगिक हो उठता है. यहाँ सहमति के बजाय पहल के सुर हैं. इसे सहजता से लेना आप पाठकों का अधिकार है, न लेना भी. बुद्धू-बक्सा किसी की पैरवी नहीं करता और इस साल बुद्धू-बक्सा कुछ कठिन फैसले ले सकता है.]

किन्तु केवल साहित्यिक परिवेश की ही बात करें. आज हम हिन्दी में सबसे पहले एक विराट दुनिया पाते हैं जो हिन्दी साहित्य को पढ़ने-पढ़ाने वालों की दुनिया है – हज़ारों ‘अनुभवी’ प्राध्यापक लाखों कच्चे विद्यार्थियों को शिक्षा दे रहे हैं. प्रत्येक प्राध्यापक पढ़ाते समय एक आलोचक होता है. हमारे प्राध्यापक किस तरह का परिवेश निर्मित कर पाए हैं यह छिपा नहीं है. उसके क्या कारण हैं – उनमें साहित्यकार आलोचक भी आते हैं – यह भी हमें कमोबेश मालूम है. हिन्दी के प्राध्यापकों की एक अक्षौहिणी पिछले पचासों वर्षों से जो परिवेश बना पाई है वह आज साहित्य के पठन-पाठन को कहाँ ले आया है, यह बताने की बात नहीं. किन्तु भारत जैसे देश में, जहाँ निरक्षरता जाने कितने प्रतिशत है, महाविद्यालयों में पढ़ने वाला विद्यार्थी भी ‘एलीट’ है, उसे पढ़ाने वाले तो ‘एलीट’ हुए ही. स्पष्ट है कि ‘एलीट’ का परिवेश – ‘एलीट’ द्वारा निर्मित परिवेश – परिवेश नहीं हो सकता. भारत में लिखाई-पढ़ाई अभी भी ‘एलीट’ कर्म है – आम साहित्यकार आम आदमी से ऊपर है और श्रेष्ठ साहित्यकार, आज का आधुनिक साहित्यकार, तो उससे बहुत दूर है. ऐसे साहित्य की समीक्षा को जो भी सन्दर्भ इस्तेमाल करने होंगे वे लाख न चाहने पर भी ‘एलीटिस्ट’ होंगे – दरअसल सारी उच्चस्तरीय भाषा आम भारतीय के लिए ‘जैबरवॉकी’ या ‘जिबरिश’ है. ऐसी भाषा और ऐसा साहित्य गैर-साहित्यिक परिवेश की उदासीनता को कैसे साहित्यिक दिलचस्पी में बदल सकते हैं जबकि उसके लिए पूरे समाज को मौलिक रूप में बदलना ही? यह तो बात आम समाज की हुई. कला की विभिन्न विधाओं में काम कर रहे ‘एलीट’ समूह भी कैसे उनके समूह की दोसरे समूहों के प्रति उदासीनता को तोड़ेंगे – चित्रकला की आलोचना कैसे अपने काम के प्रति समर्पित कलाकार की संगीत के प्रति उदासीनता को तोड़ेगी – और क्यों? इंजीनियर, डॉक्टर, वकील आदि शमशेर की कविता किस आलोचना की कोशिशों के कारण पढ़ेंगे? यह स्वर्ण युग असंभव नहीं है – कुछ पूंजीवादी देशों में यह सम्भव हुआ है और प्रायः सारे समाजवादी देशों में भी इसे प्राप्त किया गया है – लेकिन इसके लिए जो प्रयत्न किये गए हैं या मूल्य चुकाने पड़े हैं वे अभी भारत में सिर्फ़ सोचे जा रहे हैं, या सोचे भी जा रहे हैं कि नहीं?

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सृजनशील साहित्यकारों को सबसे ज़्यादा हिदायतें आदर्शवादियों से मिलती हैं – मैं इसमें ऐसी सारी विचारधाराओं का समावेश करना चाहता हूँ जो साहित्यकारों के कर्तव्य निर्धारित करती हैं. वे यह भूल जाती हैं कि प्रत्येक सही साहित्यकार या तो अपने कर्तव्य जानता है या वे उसके लेखन से ही पैदा होते हैं और फ़िर भी उस पर लाज़िमी नहीं होते. बहरहाल, हम देख चुके हैं कि साहित्यिक परिवेश स्वयं अपने आप में उदासीन नहीं है और भारत जैसे देश में यदि वृहत्तर परिवेश कलाओं को लेकर उदासीन है तो उसमें आलोचना का कोई कुसूर नहीं है – वृहत्तर परिवेश समाज बदले बगैर नहीं बदल सकता और समाज बदलने के तरीकों का कोई सीधा और फ़ौरी सम्बन्ध साहित्य या आलोचना से नहीं है – गहरी सामाजिक आलोचना से और मानवता के प्रति गहरे लगाव से है – और उसके लिए दूसरे ही काम करने पड़ते हैं – बल्कि वह काम एक तरह से पूरे समाज को ही करना पड़ता है. हां, आलोचना का कर्तव्य उदासीन जड़ता को तोड़ना अवश्य है. यह काम आलोचना अच्छी कला को समझ-समझाकर और उसकी तारीफ़ करके तथा ख़राब कला को उघाड़कर और उसकी भर्त्सना करके ही कर सकती है. कुछ ऐसे अनेकांतवादी-अन्त्योदयी आलोचक भी हैं जो सिर्फ़ अच्छी कला की तारीफ़ करने को ही आलोचना का अंत समझ लेते हैं – बल्कि वे अच्छी-बुरी किसी भी कृतिके बारे में ऐसी तत्समी भाषा का इस्तेमाल करते हैं कि उससे आप किसी भी नतीज़े पर पहुँच नहीं सकते – कृति के बहाने उन्हें सिर्फ़ अपने दिमाग की कलाबाज़ियाँ दिखाकर आपको गद्गद् करना है. दूसरी ओर आधुनिकता-विरोधी, प्रगति-विरोधी, मूढ़ मार्क्सवादियों, एकेडेमिकों, रंगीन पत्रिकाओं द्वारा पाले गए आदि नाना प्रकार के आलोचकों की भीड़ है जो मौक़ापरस्ती के सारे रंगों को बदल चुकी है. एक और दुखद दृश्य प्रतिभावान आलोचकों का है जो लगभग शलाका-पुरुष बनकर दैदीप्यमान हुए थे किन्तु अच्छी ज़िंदगी, अच्छी नौकरी, अच्छी सोसायटी में फँसकर नैतिक आलस्य को अकाल प्राप्त हुए और अब अपनी पिछली कृतियों के पुनर्मुद्रण से काम चला रहे हैं. समसामयिक प्रासंगिकतम लेखन पर इनसे न मालूम क्यों लिखा नहीं गया और अब आचार्यत्व का बौद्धिक चौथापन आ पहुँचा. यह नहीं है कि अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाने वाले आलोचक रहे नहीं, किन्तु वे कनफटे और हेठे समझे जाते हैं, उनका स्वागत मुश्किल से कहीं होता है क्योंकि वे भरोसे के क़ाबिल और संभ्रांत नहीं समझे जाते. ऐसे आलोचक जब सही जगह प्रहार करते हैं तो कायरों की एक टोली-की-टोली ख़ूब वाह-वाह तो करती है किन्तु सुसंस्कृत ड्राइंग-रूमों में उनकी चर्चा अभद्र मानी जाती है. आलोचना की समस्या परिवेश की उदासीनता नहीं, उसकी अपनी निर्भीकता की है. यूरोप की क्रांतियों के पीछे निर्भीक चिंतन की एक परम्परा थी. वह निर्भीकता उनके साहित्यिक चिंतन में भी थी. भारत की मुक्ति गांधी की निर्भीकता के बिना सम्भव नहीं थी. जहाँ डरते, लजाते, सकुचाते, चरण छूते, मिनमिनाते, स्वीकृति को ललचते ‘साहित्यकारों’ और ‘आलोचकों’ की भीड़ नवधनाढ्यों अथवा फैशनेबल ‘वामपंथी’ या ‘दक्षिणपंथी’ बुद्धिजीवियों की ड्यौढियों पर दस्तबस्ता खड़ी हो, वहाँ यह कौन सुने कि खुला, सजग दिमाग, भय से मुक्ति और सारे दिए गए सत्यों पर प्रश्न-चिन्ह लगाने की ताक़त हीतमाम तरह की उदासीनताओं को तोड़ने की दिशा में पहला मज़बूत क़दम है. 

बुधवार, 30 अक्टूबर 2013

राजेन्द्र यादव पर विष्णु खरे

(राजेन्द्र यादव की मृत्यु के साथ भद्रलोक में उनसे सीधे तौर पर जुड़े विवाद अंतिम रूप में सुकर्मों में तब्दील हो गए. लोगों ने फेसबुक ट्रायल तक को राजेन्द्र यादव की मृत्यु का कारण घोषित कर दिया और कुछ अवसरवादी यह तक तलाश करने लगे कि ज्योति कुमारी राजेन्द्र जी को श्रद्धांजलि देती हैं या नहीं. वैचारिकता और संसारिकता में काफ़ी अंतर व्याप्त है. बुद्धू-बक्सा उस अंतर को भांपते हुए राजेन्द्र यादव के बाद भी उन्हें संजोए रखने की कामना करता है. राजेन्द्र यादव की मृत्यु एक क्षति तो है ही, लेकिन इस क्षति की विराटता का अंदाज़ कुछ समय बाद 'राजेन्द्र-यादव-विहीन' समय में ही लगाया जा सकता है. वरिष्ठ कवि-आलोचक विष्णु खरे ने तवे के दोनों पृष्ठों को सामने रखकर एक आत्मीय बातचीत की है, जो कहीं न कहीं से राजेन्द्र यादव को सही तराजू पर तौलती है. यह लेख आज के नवभारत टाइम्स के सभी संस्करणों में प्रकाशित. इसे छापने की अनुमति देने के लिए बुद्धू-बक्सा लेखक और सम्पादक का आभारी. तस्वीर दिनेश खन्ना की.)


आज की युवा लेखक-और-पाठक पीढ़ी तथा अगली नस्लों के लिए राजेंद्र यादव मुख्यतः क्या रहेंगे – कहानीकार-उपन्यासकार या नए ‘हंस’ के वह सम्पादक जिसका खंडन-मंडन से भरा अपना एक निजी दलितवाद-नारीवाद-सेकुलरवाद था? जिस तरह राजेंद्र ने दशकों पहले सर्जनात्मक साहित्य छोड़ दिया था उसी तरह शायद पाठकों ने भी तभी उनके गल्प को तज दिया था – ‘नई कहानी’ की अकादमिक और साहित्यिक-राजनीतिक चर्चा अब कमोबेश अप्रासंगिक हो चुकी है, आम पाठक पहले भी सिर्फ़ ‘अच्छी’ कहानी पढ़ना चाहता था - और दुर्भाग्यवश आज तो कोई भी ढंग से मोहन राकेश और (‘कितने पाकिस्तान’ को छोड़ कर) कमलेश्वर तक को पढ़ना नहीं चाहता. यह याद करने से कोई फ़ायदा नहीं है कि राजेंद्र ने ‘प्रेत बोलते हैं/सारा आकाश’, ‘उखड़े हुए लोग’, ‘कुलटा’, ‘शह और मात’, ‘अनदेखे अनजान पुल’, ‘मंत्र-विद्ध’, ‘एक था शैलेन्द्र’ जैसे उपन्यास और बीसियों कहानियाँ लिखी हैं क्योंकि एक तो वे आसानी से उपलब्ध नहीं हैं और दूसरे उन्हें लेखक की मृत्यु के दुखद प्रसंग पर ही सायास याद किया और झाड़-पोंछ कर कहीं से निकाला जाएगा. शायद कोई चैनल कहीं से ‘सारा आकाश’ की डीवीडी हासिल कर के देर रात दिखा दे तो दिखा दे. राजेन्द्र ने साहित्य में बिना लिखे बने रहने के दो नुस्ख़े आज़माए – पहले ‘अक्षर प्रकाशन’ खोला लेकिन वह बेवकूफ़ी, बदनामी और घाटे के साथ बंद हुआ. दूसरा फ़ॉर्मूला अलबत्ता कामयाब रहा. प्रेमचंद द्वारा स्थापित किन्तु दशकों से बंद मासिक ‘हंस’ का पुनर्प्रकाशन शुरू किया गया जबकि राजेंद्र सहित सभी जानते थे कि न तो नया सम्पादक प्रेमचंद का सही वारिस है (न होना चाहता है) और न नया ‘हंस’ असली ‘हंस’ का, जो दरअसल बगुले, कौए और चील का विचित्र संकरश्लेषावतार है. उसमें छपी पाँच प्रतिशत कहानियाँ भी टिक पाएँगी इसमें संदेह है. हाँ, बेशक़, दलितों, स्त्रियों और अल्पसंख्यकों के कुछ प्रश्नों पर ‘हंस’ के जोशीले सम्पादकीयों ने मिश्रित स्तरों की लेकिन व्यापक बहसें चलाईं और कभी-कभी उसके वार्षिकोत्सव पर राजेन्द्र से श्रेष्ठतर बुद्धिजीवी सार्थक बहस-मुबाहिसा कर लेते थे. दुर्भाग्यवश, नारी के अभिव्यक्ति-स्वातंत्र्य को वामपंथी कहलाए जाने वाले राजेन्द्र ने लेखिकाओं से यौन-तथा-बलात्कार-स्वीकारोक्ति की उत्तेजक-चटखारेदार कहानियाँ लिखवाने तक सीमित कर दिया – वह 1968 में पहली भेंट से ही मुझे नारियों का शौक़ीन लगा था, उनके बीच लोकप्रिय भी था और ‘हंस’ के पृष्ठ इस तरह से उपलब्ध हो जाने के बाद कुछ अभागी लेखिकाओं के लिए अपनी असामान्य शारीरिक दिक्क़तों और उम्र के बावजूद वह आकर्षक होता चला गया जिससे उसका अच्छा-खासा, मन्नू भंडारी सरीखी प्रेम-विवाहिता पत्नी वाला, पारिवारिक जीवन बर्बाद हो गया और अंतिम कुछ वर्षों में तो वह कई अशोभनीय, लगभग आपराधिक, विवादों में भी पड़ गया जिन्होंने उसका पीछा अभी उसकी मृत्यु तक नहीं छोड़ा. इसके लिए राजेन्द्र की लम्पटता और उसके जीवन या ऑफिस में आने-जाने वाली कुछ औरतों का विकृत, विवश, दुचित्ता और पाखंडी मनोलोक दोनों उत्तरदायी हैं. यह तो आगामी कुछ दशक तय करेंगे कि राजेंद्र को एक गल्पकार की हैसियत से याद रखा जाता है या सार्थक, उत्तेजक बहस उठानेवाले एक साहसी सम्पादक के रूप में - वैसे उसने चेखौफ़, लेर्मोंतौफ़, तुर्गेन्येफ़, स्टाइनबैक और कामी के अनुवाद भी किये थे और बहुत खराब कविताएँ भी लिखी थीं - या महज़ एक यौनलालसी की तरह. उससे मैं सघन संपर्क में तब आया था जब उसके और मेरे अभिन्न मित्र शानी साहित्य अकादेमी की पत्रिका ‘समकालीन भारतीय साहित्य’ के संस्थापक-सम्पादक नियुक्त हुए थे. राजेन्द्र के साथ मैंने कई नारीविहीन किन्तु रंगारंग शामें बिताई हैं जिनमें अलीगढ का युवा साहित्यप्रेमी साजिद, नैशनल प्रकाशन के प्यारे मालिक कन्हैयालाल मलिक और शानी हुआ करते थे. राजेन्द्र को आप कुछ भी कह लीजिए, उसमें परिहास-भाव अद्वितीय था, उसे गुस्सा नहीं आता था, वह मुस्कराता रहता, कभी-कभी अपनी विशिष्ट शैली में ताली बजाता और विस्की के साथ मेरे द्वारा उसके लिए जर्मनी से लाया गया पाइप पीता रहता. वह मुझे हमेशा ‘राक्षस’ या ‘दानव’ कहता था और मैंने उसे कभी भी ‘लम्पट’ के सिवा कुछ नहीं कहा, ‘आप’ से भी संबोधित नहीं किया. उसके सम्पादकीय पढ़कर ‘टुच्चा जीवन उच्च विचार’ भी कहे बिना नहीं रहता था. लेकिन वह ‘हाँ बेटा राक्षस’ कह कर हँसता ही रहता था. कुछ भी हो, 83 वर्ष की उम्र में भी शानी के शब्दों में वह इतनी ‘’उछलकूद’’ करता हुआ गया कि हिंदी परिदृश्य को और मनहूस छोड़ गया.