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रविवार, 1 मई 2011

बोर्ख़ेस और निर्मल वर्मा

दुनिया, दुर्भाग्यवश, असली है....मैं दुर्भाग्यवश बोर्ख़ेस हूँ...
....
एक तरह से यह शोचनीय बात थी - बोर्ख़ेस उन इने-गिने लातिन-अमेरिकी लेखकों में हैं, जिन्होंने अंग्रेजी साहित्य और संस्कृति से बहुत कुछ ग्रहण किया है, जिन्हें सही अर्थों में 'ऐंग्लोफिल' लेखक कहा जा सकता है. अपने में यह दिलचस्प बात है - और हलकी-सी व्यंग्यात्मक भी - कि जो अंग्रेजी लेखक ख़ुद आज अपने देश में पुराने और अपठनीय हो चुके हैं - स्टीवेंसन और चेस्टर्टन - बोर्ख़ेस-जैसे 'आधुनिक' लेखक समय-समय पर उनके प्रति अपना आभार प्रकट करना नहीं भूलते, या शायद यह लन्दन की धुँध है - अदृश्य संकेतों और रहस्यमय खतरों से भरी हुई - जो बोर्ख़ेस को बरबस अपनी ओर खींचती है ? बातचीत के दौरान बोर्ख़ेस ने उन चीज़ों का उल्लेख किया, जो उन्हें शुरू से ही मोहित और आतंकित करती आ रही हैं - धुँध, रात, महानगर. ये 'चीज़ें' एक अजीब ढंग से लातिन-अमेरिकी प्रतीकों से जुड़ी हैं - आईने, भूलभुलैया और चाकू. "चाकू की अपनी एक निजी रहस्यमय ज़िन्दगी है," बोर्ख़ेस ने कहा, "खून और हिंसा की एक ऐसी 'प्राइवेट' लिपि उससे जुड़ी है, जो अनायास हमारे भीतर उनके प्रति सम्मान की भावना जाग्रत करती है." चाकू मानो एक ऐसे सार्वजनिक कर्म को उद्घाटित करता है, जिससे व्यक्तिगत नियति का फैसला होता है. अपनी एक कविता में वे लिखते हैं: .

मैनें अपनी नियति को पा लिया है.
अपनी अन्तिम लातिन-अमेरिकी नियति को.
सख़्त लौह का प्रहार,
मेरी छाती चीरता हुआ.
गले पर,
मेरा अपना पहचाना चाकू.
 
लेकिन 'चाकू' बहुत आत्मीय है, बहुत मांसल, "उससे मुझे डर नहीं लगता," बोर्ख़ेस ने कहा, "डर असल में मुझे आइनों से लगता है - बचपन से मैं उनसे डरता आया हूँ. उन्हें देखकर मुझे एक भयानक अनुभव होता है, जैसे मैं कहीं फंस गया हूँ और बाहर नहीं निकल सकता. आईने को देखकर यह मायावी भ्रम होता है, जैसे कहीं मेरे प्रतिरूप का अस्तित्व है, जैसे हर प्राणी का अपना एक प्रतिरूप है, जिसके कारण हर चीज़ संदिग्ध, अवास्तविक और प्रश्नवाचक बन जाती है."

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स्मृति की समस्या समय से जुड़ी है - और बोर्ख़ेस की लगभग सब कहानियों में समय रेगिस्तान की तरह फैला है - अपनी समस्त मृगतृष्णाओं और मरीचिकाओं के साथ - यथार्थ से अलग नहीं, लेकिन यथार्थ का हिस्सा भी नहीं. वह उस ताश के 'जोकर' की तरह है, जिसे खेल में कुछ भी बनाया जा सकता है, क्योंकि अपने में वह कुछ भी नहीं. जो कुछ भी नहीं, वह सबकुछ हो सकता है. बोर्ख़ेस का समय प्रूस्त का 'घुमावदार' समय नहीं है, जिसके चरमबिन्दु 'अनायास स्मरण' के क्षणों द्वारा आलोकित होते हैं, मानो समूचा अतीत रोशनी के खम्भों द्वारा छोटे-छोटे फासलों में बाँटा जा सकता है. बोर्ख़ेस की दृष्टि में स्मरण करना अपने को धोखा देना है - क्योंकि ऐसी कोई चीज़ नहीं, जिसे हम 'अतीत; कह सकें - या दूसरे शब्दों में अतीत केवल शाश्वत वर्तमान का ही अंश है, जहाँ उसका अलग अस्तित्व अर्थहीन हो जाता है. प्रूस्त की दुनिया 'समानताओं' की दुनिया है, जहाँ एक चीज़ दूसरी चीज़ की याद दिलाती है, जहाँ एक स्मृति प्याज के छिलके की तरह दूसरी स्मृति से बाहर आती है.....इन 'समानताओं' ने ही एक समय बॉदलेयर को इतना त्रस्त किया था. बोर्ख़ेस चूंकि समय को खण्डों में विभाजित नहीं करते, इसलिए इन 'समानताओं' को भी स्वीकार नहीं करते. "एक क्षण दूसरे क्षण के 'समान' नहीं है -  वह हूबहू वही है, जो पहला क्षण था." जब दो क्षण बिलकुल एक जैसे हों, तो समानता का प्रश्न नहीं उठता - जब आने वाला क्षण एकदम वही हो, जो बीतनेवाला क्षण था, तब समय का अस्तित्व ही नष्ट हो जाता है.

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साक्षात कभी होता नहीं है, लेकिन वह कभी भी हो सकता है, यह उम्मीद आख़िर तक बनी रहती है, आख़िर तक बनी रहनी चाहिए. दुनिया के 'सुख' होते नहीं, इस उम्मीद पर 'बनते' हैं. बोर्ख़ेस ने एक जगह कहा है, "संगीत, सुख की स्थितियां, पौराणिक कथाएं, समय से लदे चेहरे, गोधूली के धुंधलके, कुछ स्थान - ये सब हमें कुछ बताना चाहते हैं या इन्होने हमें कुछ बताया था जो हमें ओझल नहीं करना चाहिए था या वे हमें कुछ बताने वाले हैं. साक्षात की यह तात्कालिक संभावना, जो कभी पूरी नहीं होती - ऐसी है, जिससे सौन्दर्य का सृजन होता है."

लातिन-अमेरिकी लेखकों में शायद बोर्ख़ेस ही ऐसे हैं, जो यूरोप की परम्परा की यहूदी परम्परा की यातनाग्रस्त जिज्ञासा के सबसे निकट आते हैं. यह शायद स्वाभाविक भी था. एक एर्जनटीन होने के नाते उन्हें अन्य लातिन-अमेरिकी लेखकों की तरह (जिनमें आक्टोवियो पाज उल्लेखनीय हैं) पीछे मुड़-मुड़कर अपनी इंडियन परम्परा को नहीं खोजना पडा - क्योंकि उनके देश में ऐसी कोई परम्परा थी ही नहीं. वे मुक्त रूप से अपने को यूरोपीय परम्परा से संपृक्त कर सकते थे - क्योंकि उन पर अपने अतीत का कोई बोझ नहीं था - लेकिन 'बाहर के आदमी' होने के नाते उन पर यह बंधन भी नहीं था कि वे उस परम्परा के प्रति वफादार रहें, वे अपने अतीत से मुक्त थे तो यूरोप के बाहर भी थे. मुक्ति का यह एहसास ही है कि वह इतने गौरव और विश्वास के साथ कह सकते हैं:

        "चमत्कार करने की सुविधा से देवता वंचित भले ही रहे हों, लेखक नहीं, लेखक हमेशा अतीत को बदल सकते हैं.....काफ़्का की तरह वे ख़ुद अपने से पहले आनेवालों की रचना कर लेते हैं."


(निर्मल वर्मा के संग्रह "सर्जना पथ के सहयात्री" से लिया गया अंश. इसके पहले बुद्धू-बक्सा पर आप ब्रेख्त पर निर्मल वर्मा को पढ़ चुके हैं.)

रविवार, 2 जनवरी 2011

ब्रेख्त और निर्मल वर्मा

नाटक ही तो है...
        ब्रेख्त के लिए महज़ यह काफ़ी नहीं है - वे इससे कहीं आगे जाते हैं. नाटक मंच पर खेलने की चीज़ नहीं,
वह जीने की सक्रिय कला है, हर परिचित, पुरानी चीज़ को नए सिरे से छूने की अपेक्षा है, ताकि हम उसे आज का, इस क्षण का धड़कता सत्य दे सकें. हक़ीक़त ही तो नाटक है....सिर्फ़ उसे समकालीन दृष्टि से पहचानने की आवश्यकता है.
  
समकालीन....यह शब्द आज काफ़ी विकृत हो चुका है. प्रायः उन सब लेखकों के लिए यह प्रयुक्त होता है जो आज जीवित हैं और लिख रहे हैं - अक्सर उनके लिए भी जो 'जीवित'' नहीं है और लिख रहे हैं.

उस रात 'टेरर ऐंड मिज़री' देखते हुए मैं पहली बार 'समकालीन' शब्द से परिचित हो पाया. यदि उसका कोई अर्थ है तो सिर्फ़ एक प्रयोग, जब आदमी के अस्तित्व की हर तह एक नए स्तर पर अप्रत्याशित अर्थ ग्रहण कर लेती है....जब बाह्य परिस्थिति एक बेडौल, विकृत छाया है (एक गूँगे दैत्य की मानिन्द), जो न कुछ कहती है, न हमारे सामने से हटती है, एक असह्य-सा दबाव, जिसे हर मनुष्य सोते-जागते अपने पर महसूस करता है. कुछ लेखक हैं, जो इस 'दैत्य' से मुक्ति पाने के लिए उसे अपने एक आत्मपरक प्रतीक में ढाल लेते हैं - तब 'बाह्य' इतना पराया, इतना डरावना नहीं रहता. काफ़्का, और एक दूसरे अर्थ में सार्त्र ऐसे ही लेखक हैं. यह एक रास्ता है, इस भयावह सुरंग से बाहर आने का - एक अमानवीय 'दैत्य' को निजी प्रतीक-द्वारा साधारण, औसत वास्तविकता में ढालने की प्रक्रिया.
 

ब्रेख्त भी यही करते हैं - किन्तु बिलकुल दूसरे ढंग से. 'बाह्य परिस्थिति' उनके लिए ऐतिहासिक है - सूक्ष्म अर्थ में नहीं - समय के हाड़-मांस ठोस पिंजर में आबद्ध, जिस सदी में हम जीते हैं, उसके सन्दर्भ में बेहद, इंटेंस राजनीतिक ! फासिज्म, बंदी-शिविर, नर-संहार....ये महज़ दीवार की छायाएँ नहीं, जिन्हें एक आत्मपरक प्रतीक दिया जा सके, क्योंकि ये स्वयं प्रतीक हैं, एक विघटन-प्रक्रिया के, जिसमें हम सब, अलग-अलग व्यक्ति की हैसियत से, शामिल हैं. यह आकस्मिक नहीं कि ब्रेख्त का नाटक देखते हुए अचानक एक ऐसा क्षण आता है, जब लगता है, जैसे थिएटर की दीवार के परे बरबस कुछ आवाज़ें भटक रहीं हैं, दरवाज़ा खटखटा रहा है - और हम - दर्शक और अभिनेता - समूचा मंच और 'एडिटोरियम' एक अजीब दबाव तले धँसने लगते हैं - सिर्फ़ एक उपाय है मुक्ति पाने का - हम बाहर निकल आएँ और इन 'आवाज़ों' के साक्षी हो सकें.

ब्रेख्त कम्युनिस्ट थे, क्योंकि उनके लिए कम्युनिस्ट होने के मानी बहुत सहज थे - समकालीन होना, दूसरे शब्दों में, अपने निजी घेरे के बाहर उन सब आवाज़ों का साक्षी होना, जो बीसवीं सदी के अँधेरे से टकराती हुई हमारे पास आती हैं.

 
 (निर्मल वर्मा के यात्रा-संस्मरण "चीड़ों पर चाँदनी" से लिया गया अंश. ब्रेख्त की फोटो "गूगल" से साभार)

शुक्रवार, 5 नवंबर 2010

आलोक – २

रात का रिपोर्टर

टेलीफोन-बूथ के शीशे से बाहर वह दिखाई दी – एक छोटी-सी लड़की साइकिल के पिचके टायर को पेड़ की एक सूखी शाख से हाँकते हुए ले जा रही थी. टायर कभी आगे निकल जाता तो वह भागते हुए उसे पकड़ लेती, कभीं वह आगे निकल जाती और टायर का रबड़ कोलतार की चिपचिपाती सड़क पर अटक जाता, लड़खड़ाकर गिर जाता; वह पीछे मुड़कर उसे दुबारा उठाती, सीधा करती, अपनी शाख हवा में घुमाती और वह मरियल मेमने-सा फ़िर आगे-आगे लुढ़कता जाता.
 
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यह शुरुआत थी; सरसराते पेड़ के नीचे आतंक का एक चमचमाता चकत्ता उनके बीच चला आया. डर के आने के कितने गोपनीय रास्ते हैं, लेकिन जब वह सचमुच आता है, तो सब रास्ते अपने-आप बंद हो जाते हैं, सिर्फ़ वह रह जाता है – कैंसर के कीटाणु की तरह – जिसके आगे मरीज की सब छोटी बीमारियाँ अचानक ख़त्म हो जाती हैं. अस्पताल में उसकी पत्नी की दहशत – जैसे दीवार लांघकर – यहाँ चली आई थी, पेड़ के नीचे, सितम्बर की छाया में, जहाँ वह उसके सामने खड़े थे…. वे कुछ आगे झुक आए, बिलकुल उसके मुँह के पास, जहाँ उनकी साँस उसके चेहरे को छू रही थी ….
 
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वह लायब्रेरी की तरफ़ चलने लगा. कोई उसके पीछा नहीं कर रहा था – सिवाय उस डर के, जो वह सज्जन उसके पास छोड़ आए थे. सैंतीस साल की उम्र में उसने तरह-तरह के डर भागे थे, लेकिन वे उसके भीतर थे और उन्हें टोहने के लिए उसे नंगी सड़क पर पीछे मुड़-मुड़कर नहीं देखना पड़ता था. किन्तु यह एक बिलकुल नये किस्म का डर था, जिसका मतलब किसी भी शब्दकोश में नहीं था. उसका सीधा सम्बन्ध उसकी जन्मपत्री से था, जो उनकी फाइलों में बंद थी और जिसे वह कभी भी खोल सकते थे. वे सब निजी और प्राइवेट भेद, जिन्हें वह अब तक अपने अँधेरे में गुनता आया था, सहसा थिगलियों की तरह बाहर निकल आए थे…. अपनी गंध और गंदगी के साथ, जिसे कोई भी बाहर से देख़ सकता था, सूंघ सकता था. वह डर एक तरह का कोढ़ था, बाहर सितम्बर की धूप में बेलौस चमकता हुआ; हर कदम पर भ्रम होता था – लोग सशंकित निगाहों से उसे देख़ रहे हैं, अपने कपड़े बचाकर किनारे से निकल जाते हैं; उसकी बू सीधी आत्मा से बाहर आती है, जैसे पसीने की गंध शरीर से; ख़ुद को उसका पता नहीं चलता, लेकिन बाहर के लोग उसे एकदम सूंघ लेते हैं, चाहे वह मीलों दूर फोन पर ही क्यों न बात कर रहा हो….
 
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जिज्ञासा ? नहीं, हॉलबाख जिसे जिज्ञासा कहता था, वह कोई और चीज़ थी – जो उसे एक दुपहर स्टेट्समैन के दफ्तर ले गई थी. कितने दिन पहले की बात है ? जुलाई का शुरू रहा होगा; बारिश के पहले वाली उमस में दिल्ली उबल रही थी. दफ्तर में सिर्फ़ टाइपिस्ट थी और राय साहब अपने पेपर की डमी सेंसर के पास ले गये थे. उसके पास कुछ भी करने को नहीं था. “मैं ज़रा अस्पताल जा रहा हूँ,” उसने टाइपिस्ट से कहा और बाहर चला आया. उन दिनों सब जानते थे कि उसकी पत्नी कुछ दिन पहले ही अस्पताल में दाखिल हुई है. इसलिए कभी-कभी वह बिना किसी से कुछ कहे बाहर चला जाता था. कर्जन रोड की लाल बत्ती पर जब बस रुकी, तो वह नीचे उतर गया. तब उस क्षण उसके मन में कोई जिज्ञासा नहीं थी, न ही वह कोई संकल्प लेकर स्टेट्समैन के दफ्तर में चला आया था; सिर्फ़ अपने को थाहने की एक पागल और बेतुकी-बिलकुल बेढंगी लालसा ने जकड़ लिया था. जून की उस ‘तारीख़’ के बाद वह अक्सर सोचता था कि मेरे साथ कुछ हो रहा है…. कभी इतना हौसला नहीं होता था कि अपने से पूछ सके कि यह सब तुम्हे ही हो रहा है या कोई ऐसा ‘ग्रहण’ लगा है, जहाँ हर व्यक्ति का सूरज कुछ देर के लिए छिप गया है ? वह क्या उत्तर पाने के लिए स्टेट्समैन के दफ्तर गया था – अपनी नियति या इतिहास का अँधेरा रहस्य भेदने के लिए ?
 
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खाली मकान में कितनी आवाज़ें सुनाई देती हैं. कभी-कभी पता भी नहीं चलता, कौन-सी आवाज़ किस कोटर में छिपकली की तरह सोई थी और अब अचानक किस कमरे से लपक आई है? सब कमरों का चक्कर लगाकर वह माँ के कमरे में आता, तो एक तसल्ली-सी मिलती. वही एक कमरा बचा था, जिसमें कुछ भी परिवर्तन नहीं हुआ था. अलग-थलग, मकान का भाग होता हुआ भी उसकी काल-गति से निपट अछूता, जैसे वहाँ मुद्दत से समय नें प्रवेश नहीं किया. कभी-कभी उसे आशंका होती थी कि वह दरवाज़ा खोलेगा और वहा माँ की जगह उनका अस्थि-पिंजर दिखाई देगा — पूरे एक साबुत फॉसिल की तरह ऊपर उठा हुआ….
 
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वह पलंग पर लेट गया, खिड़की के शीशों पर धीरे-धीरे सुबह की सफेदी उतर रही थी. चौकीदार के खट-खट कब की ख़त्म हो चुकी थी…सुबह की इस घड़ी में घर के सब खटके चुप हो जाते थे. न टेलीफोन की घंटी, न किसी आगंतुक की आशंका. वह चादर लपेटकर तकिये के सहारे अधलेटा-सा पसरा रहता. रात की बची-खुची नींद पलकों पर एक पर्दा-सा खींच जाती….जैसे फ़िल्म शुरू होने से पहले – सिनेमाघर के दरवाज़े बंद हो जाते है – और अँधेरे में सिर्फ़ एक चमकता स्क्रीन दिखाई देता है. वह दम रोके प्रतीक्षा करता रहता – जैसे उस पर कुछ होनेवाला हो; स्क्रीन के एक कोने में नर्सिंग होम दिखाई देता, दूसरे कोने में लायब्रेरी का कोना; नीचे बिंदु का घर और बिलकुल ऊपर राय साहब का दफ्तर – बीच में खाली जगह – जैसे नक्शों में रेगिस्तान की जगह खाली पड़ी रहती है….और तब वहाँ उसे एक भागता हु प्राणी दिखाई देता, कभी कोने की तरफ़ जाता हुआ, कभी दूसरे की तरफ़ से आता हुआ…कौन है यह ? वह अँधेरे में चमकते हुए परदे पर आँखें गड़ा देता और तब वह आदमी भागता हुआ उसकी तरफ़ आता….पास, बिलकुल पास, एकदम; और तब उसे अचानक झटका-सा लगता – यह मैन हूँ; एक ‘मैं’ दूसरे ‘मैं” की तरफ़ भागता हुआ, दोनों अलग-अलग, फ़िर भी एक चेहरे को धोरे हुए – टू इन वन. वह हडबडाकर उठ बैठा…. माँ देहरी पर खड़ी थीं, खिड़की से सुबह की रोशनी उनके सफ़ेद बालों पर गिर रही थी.
 
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सितम्बर का महीना और इतना ताप ! कभी-कभी उमस इतनी बढ़ जाती कि आकाश की जगह सिर्फ़ पीली छत दिखाई देती – धूल की छत – जिन्हें सिर्फ़ शहर की चीलें ही काट पाती थीं. वह उन्हें अखबार के दफ्तर से देखा करता था – इन चीलों को, जो कुदसिया बाग़ से होती हुई जामा मस्जिद पर आती थीं और वहाँ से उड़कर उर्दू बाज़ार की मांस की दुकानों पर चक्कर काटती थीं, शहर की उन काली अफवाहों की तरह जिन्हें हर आदमी सुनता था, सूंघता था और अनदेखा करके आगे भाग जाताथा, ताकि वे उसका पीछा न कर सकें….उन दिनों सारा शहर भागता-सा दिखाई देता था, मानो हर व्यक्ति को अंदेशा हो कि एक मिनिट कहीं ठहरे नहीं, कि पीछे आता बवंडर उस पर आ टूटेगा.
 
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क्या यह मुमकिन है ? सबकुछ भूल जाना, सिस्मृति के गड़हे में डुबो देना ? दौड़ते हुए उसे अनूप भाई का चेहरा दिखाई देता – उसे क्या मालूम था कि एक दिन वे तिहाड़ जेल में बैठे होंगे ? पता नहीं, उनके परिवार पर क्या गुज़र रही है ? क्या मैं उनसे मिलने भी नहीं जा सकता ? मुझे उन सब कामों की फेहरिस्त बनानी चाहिए, जिन्हें मैं इतने वर्षों से टालता आया हूँ; अब अधिक टालना सम्भव नहीं; अब समय इतना संकरा हो गया है कि उसमें जीवन की सबसे तात्कालिक, सबसे अर्जेंट चीज़ों को छांटकर अलग रखना होगा, जैसे हम किसी महायात्रा के लिये अपनी ज़रूरी चीज़ें छांटते हैं….लोग अमरनाथ, बदरीनाथ जाते हैं, किन्तु उसके लिये अपना शहर दिल्ली है, जहाँ हर यात्रा ऊपर हिमालय की धवल चोटी पर नहीं, कहीं बहुत नीचे पाताल में जाती है…..
 
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बिंदु को कुछ भी नहीं मालूम; दुनिया की सबसे विचित्र चीज़ यही है कि लोग, तुम्हारे निकटतम सगे-सम्बन्धी कुछ भी नहीं जानते. उन्हें आखीर तक कुछ भी मालूम नहीं होता. तुम चुप रहकर सबको अपने खतरों से बरी कर सकते हो; तुम मुस्करा सकते हो और वे सिर्फ़ तुम्हारी मुस्कराहट देख़ सकते हैं. फोन पर यह भी मुमकिन नहीं; सिर्फ़ बिंदु की आवाज़ सुनकर भीतर की दुनिया पर एक छांह-सी गिर जाती, ठंडी, तपते हुए मन पर पानी की एक बूँद, जिसे वह सँभाले रखता. रात को सोने से पहले सोचता, वह उसे कल सबकुछ बता देगा. फ़िर कल बीट जाता और उसे तसल्ली होती, एक दिन और बीत गया और उसके डर सिर्फ़ उसके भीतर है, एक छूत की बीमारी-सा, जिसे उसने अभी तक बिंदु को नहीं चूने दिया; वह अगर फैले नहीं, तो वह उसे अपने से बचा सकता है, डर सिर्फ़ दूसरे को छूकर ही आतंक बनता है….कायर आदमी की जीत सिर्फ़ इसमें है, अगर वह दूसरों को अपने डर से सुरक्षित रख सके….और वह सिर्फ़ झूठ और धोखे से संभव हो सकती है…..क्या अंतिम दिनों में भी सत्य का सहारा नहीं मिल सकता ?
 
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यह उसके लिए शरणस्थल-सा बन गया था – रात को घर, सुबह अस्पताल, और दुपहर की खाली, भायँ-भायँ करती घड़ियों में एक ऐसा घर जो उसे एक मुफस्सिल स्टेशन-सा जान पड़ता, जहाँ स्टेशन-मास्टर अपने केबिन की खिड़की से आने-जानेवाली गाड़ियों को देखता है…फर्क सिर्फ़ इतना था कि गाड़ियों के बजाय उसे शहर की बसें दिखाई देतीं, लॉन ककी फेंस के परे वे एक-दो मिनिट ठहरकर आगे बढ़ जातीं. लायब्रेरी कोई बड़ा स्टेशन नहीं था जहाँ उन्हें ज़्यादा देर ठहरना पड़ता, सिर्फ़ कोई स्कूल की लड़की या कोई दफ्तर का कर्मचारी या बेकार युवक वहाँ उतर जाते और वह उनके चेहरों से अनुमान लगाता, कौन आगे बढ़ जाएगा, कौन लायब्रेरी के गेट से भीतर आता दिखाई देगा…या कभी-कभी किसी उनींदी दुपहर के सन्नाटे में खोमचेवाले की आवाज़ या आइसक्रीम बेचनेवाले की घंटी सुनाई देती और वह चौंक जाता, रिपोर्ताज के जंगलों के बीच अचानक दिल्ली की आवाज़ें कुछ वैसी ही झिंझोड़ जातीं, जैसे शांत सुनहरी झील पर फेंका हुआ पत्थर….
 
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यह कैसा सच था जो मेरे मुँह से निकलकर इतना थोथा, इतना हास्यास्पद लग रहा था ? अगर वे उसकी बात सुनकर हँस पड़तीं, तो शायद उसे कोई आश्चर्य नहीं होता. लेकिन वे कहीं दूर देख़ रही थीं आंसुओं के झिलमिले में दिन की डूबती रोशनी को, जहाँ बच्ची थी, झाड़ियों के पीछे खेलती हुई. वे उसे भूल गयी थीं. वे अपने गुडमुड़ी रुमाल से आँखें पोंछ रही थीं. और तब सहसा मुझे लगा, इतिहास की विपत्तियाँ इसी तरह टलती होंगी – थोड़ा-सा रोने में, चुप्पी के अंतरालों में, रात की नींद और दूसरी सुबह की प्रतीक्षा में….. जब उन्होंने सिर उठाया, तो पता नहीं, बीच में कितने युग बीत गए थे.
 
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उसका सिर नींद में घूमता हुआ टाइपराइटर पर टिक गया. कुछ देर तक कोई आवाज़ सुनाई नहीं दी, सिर्फ़ एक प्रश्न मक्खी की तरह उसकी थकी, उद्भ्रान्त नसों के बीच मंडराता रहा – अगर वह सच था, उस रात का, गहन, विराट अनुभव, तो वह मेरे रिपोर्ताज में कहीं कोई जगह क्यों नहीं पा सका ? उसे लिखते हुए मैं हमेशा इतना आतंकित क्यों हो जाता रहा ? और तब उसे लगा, खोट उसके रिपोर्ताज में नहीं, कहीं उसके भीतर के रिपोर्टर में है, जो पिछले वर्षों के दौरान इतने झूठों और छलनाओं के बीच पनपा है. यह बाहर का सेंसर नहीं, कहीं भीतर का पर्दा था, जो अंतिम मौके पर किसी बहुमूल्य सत्य को छिपा लेता था….. क्या इसी कारण राय साहब मुझे आत्मकथा लिखने के लिए कहते थे, ताकि मैं उस हादसे का सामना कर सकूँ, जिसने एक कैंची की तरह मेरी ज़िन्दगी को दो हिस्सों में काट दिया था ?
 
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क्या यह हॉलबाख ने दुबारा फोन किया था ? फ़िर बोला क्यों नहीं ? क्या उसे अचानक किसी खतरे की टोह मिल गयी थी – और उसने चुप रहना बेहतर समझा ? एक बेबस-सी इच्छा उठी – अभी घर से बाहर निकल जाए और
हॉलबाख के अपार्टमेन्ट में चला जाए, जैसे पिछले दिनों के सब प्रश्नों का कोई एक उत्तर – जो उसे आज तक भरमाता रहा है – सिर्फ़ हॉलबाख के पास मिल सकता है. उसने ही तो पहली बार मुझे बताया था कि दुनिया में जो कुछ अब तक घट चुका है, उसे हर आदमी अपनी छोटी ज़िन्दगी में भोगता है – चौरासी लाख योनियों की एक यातना ! क्या वह इसीलिए हिन्दुस्तान आया था ? हर जगह घूमता था, लद्दाख, नेपाल, और अब सीलोन – और जब कभी अपनी लम्बी यात्राओं से लौटता, उसके फोन की घंटी सुनाई देती, चाहे आधी रात क्यों न हो – क्या तुम आ सकते हो ? मैं सिक्किम की रम लाया हूँ….मुझे तुमसे बहुत कुछ कहना है, टैक्सी लो और आ जाओ…मैं कल फ़िर बाहर जा रहा हूँ, फ़िर पता नहीं कब मिलना होगा ?
 
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और तब पहली बार रिशी को लगा – वह मृत आदमी है. वह देर तक फटी चिट्ठियों के ढेर के सामने बैठा रहा….जीकर भी मृत होना, क्या यही सत्य लेकर
हॉलबाख के वाइकिंग समुद्री थपेड़ों पर अपने को छोड़ देते थे ? क्या यह वही अनमोल सत्य था, जिसे देने के लिए वह सज्जन उस दिन उसके पास लायब्रेरी आए थे ?
 
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क्या उन सबको मालूम था कि उनके साथ क्या होने वाला है ? लाखों साल पुराने पत्थर, पानी, घास, जन्तु, जंगल….सबको अपनी नियति ज्ञात है. सिर्फ़ आदमी ही एक ऐसा जीव है जो, न जाने क्यों, न जानने का बहाना करता है. कभी-कभी उसे एक पागल-सी इच्छा जकड़ लेती – वह चौराहे पर खड़ा हो जाए, ट्रैफिक पुलिसमैन की तरह हाथ उठाकर आने-जानेवाले लोगों को रोक ले, उनका कॉलर पकड़कर उन्हें घसीटता हुआ उस ज्ञान के ढेर पर ले जाए, बिलकुल वैसे ही जैसे घर के कुत्ते को हम उसके गू की ढेरी ले जाते हैं – और तब तक उस पर नाक रगड़ते हैं, जब तक उसे पता नहीं चल जाता की यह उसकी चीज़ है, उसकी देह से बाहर निकली है, वह इससे कतराकर भाग नहीं सकता. कितना अजीब है आदमी ! ख़ुद अपने ज्ञान की दुर्गन्ध से दूर भागता रहता है – ज़िन्दगी-भर.
 
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एक क्षण अजीब-सा भ्रम हुआ कि वह दिल्ली की सड़कों पर नहीं, कहीं भूले से बस्तर के जंगल में चला आया है – वैसे ही भक-भक आग जला करती थी, घोटुल के चारों ओर फैली चाँदनी, धुंए के गुंजल, दूर से ढोलक का धूमिल, मादक स्वर चला आता, जिसे सुनते ही जंगल के काले झुरमुटों से, पता नहीं कितने पुराने देवी-देवता बाहर निकल आते थे….ढोलक और चाँदनी और महुआ में महकती, लपलपाती आग के चारों ओर घूमने लगते; आग, जो सबकुछ खा लेती है – कागज़, मुर्दे, हड्डियाँ – सृष्टि का समूचा मांसल, कायलोक.

(मित्र का पूछना था कि तुमने सिनेमा और संगीत से अलग जाने का क्यों सोचा ?….मैंने कोई कसम थोड़े ही खाई थी. बहरहाल, निर्मल जी पर शुरू इस श्रृंखला की दूसरी कड़ी में बात हो रही है ” रात का रिपोर्टर ” के द्वारा. यहाँ ज़िक्र कर रहा हूँ उन्ही खण्डों का जो शायद इस उपन्यास को किसी हद तक स्थापित करते हैं. इस उपन्यास को मैंने काफ़ी रहस्य से भरा हुआ पाया. जहाँ ” वे दिन” में प्रेम का प्रायोगिक और सुन्दर चित्र बनाया गया है, उससे इतर यहाँ ‘ धुकधुकी ‘ जैसे अजीब-से शब्दों की बहुलता के साथ ये रहस्य और डर का भण्डार बन गया है. कहानी का नायक डाईलेक्टिक किस्म के प्रेम में फंसा हुआ जान पड़ता है, जहाँ वो कभी अपनी पत्नी के सेवाभाव को संजो कर द्रवित होता है, तो कभी अपनी प्रेमिका के “साथ निभाने ” को देख गौरवान्वित होता है. ये कुछ-कुछ अल्फ्रेड हिचकॉक की फ़िल्मों के उस हल्के से डर की याद दिलाता है जो बड़े आहिस्ता से स्नायुओं में घुल जाता है.)

सोमवार, 27 सितंबर 2010

आलोक – १

वे दिन

यह आवाज़ उसकी है. कितनी बार उसने उसे सुना है. लगता है, उसके चले जाने के बाद भी यह आवाज़ पीछे छूट गई थी – अपनें में अलग और सम्पूर्ण. मैं खिड़की खोलता हुआ डरता हूँ….दरवाजे पर भी कोई दस्तक देता है, तो मेरा दिल तेज़ी से धड़कने लगता है…लगता है, ज़रा-सा भी रास्ता पाने पर यह आवाज़ बाहर निकल जायेगी और मुझे पकड़ लेगी. मैं कब तक उसे रोक सकूंगा — अधीर-आग्रहपूर्ण, आंसुओं में भीगी उस आवाज़ को, जैसा मैंने उसे रात को अकेली घड़ी में सुना था ?

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मैंने बत्ती बुझा दी. बहन का पत्र अब भी मेरी जेब में था, लेकिन मैंने उसे अगले दिन के लिए छोड़ दिया. स्लीबोवित्से के बाद कुछ भी सोचने या पढने की इच्छा नहीं रह गई थी. सिर्फ़ भीतर एक हास्यास्पद-सी गड़बड़ होने लगती थी, जैसे अंतड़ियों में कोई धीमे-धीमे गुदगुदी कर रहा हो. मुझे तब ऐसा लगता था, जैसे मैं किसी दायरे के इर्द-गिर्द एक खरगोश के पीछे भाग रहा हूँ — एक सफ़ेद मुलायम-सी चीज़, जो सिर्फ़ सिर की चकराहट थी. चकराहट का भी कैसा अजीब रंग होता है….बादल-सी हल्की और सफ़ेद — सिर की नसों के बीच तिरती हुई — तुम जानते हो, वह पकड़ के बाहर है, लेकिन उसके पीछे भागते रहते हो, जब तक नींद उसे दबोच नहीं लेती.

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धूप निकल आई थी. वैन्सलेस स्क्वायर के बीच पानी में भीगी ट्राम की लाइनें चमक रहीं थीं. आकाश इतना नीला था कि उसे देखकर यह विचार भी बेतुका-सा लगता था कि कल शहर में बर्फ़ गिरी थी. जहाँ बर्फ़ थी, वहाँ अब भी पानी के गड्ढे उभर आये थे. हवा उन्हें छूती भी नहीं थी, लेकिन वे जैसे सहमकर पहले से ही काँपने लगते थे.

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तब सहसा मुझे वह आवाज़ सुनाई दी थी. आवाज़ भी नहीं — महज़ एक सरसराहट — बर्फ़ और धूप में दबी हुई. मुझे हमेशा यह आवाज़ अचानक अकेले में पकड़ लेती थी, या शायद जब मैं अकेला होता था, तभी उसे सुन पाता था. वह दरिया की ओर से आती थी — किन्तु वह दरिया की ही आवाज़ है, इसमें मुझे सन्देह था. वह सिर्फ़ हवा हो सकती थी — तीख़ी सफ़ेद और आकारहीन. या सिर्फ़ शहर का शोर, जो पुराने मकानों के बीच आते ही अपना स्वर बदल देता था. घरों के बीच एक गिरता हुआ नोट — पेड़ों, छतों, गलियों के ‘की-बोर्ड’ पर सरसराता हुआ बर्फ़ की सफेदी पर एक भूरी-सी आहट-सा.

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पोर्च के मद्धिम आलोक में स्कार्फ़ में बँधा उसका सिर बार-बार हिल जाता था. एक अजीब-सी आकांक्षा ने मुझे पकड़ लिया. सिर्फ़ एक पल के लिए. मैंने उसे पहले नहीं देखा था — उस पगली आकांक्षा को. वह एक विस्मयकारी डर से जुड़कर ऊपर उठी थी, मैंने उसे वहीँ गिर जाने दिया — उस आदमी की तरह जो ज़रा-सा खटका होते ही चुराई हुई चीज़ को नीचे गिरा देता है…. यह दिखाने के लिए कि वह उसकी नहीं है. इस आशा में कि ख़तरा टलते ही वह उसे फ़िर उठा लेगा….
“देखो… उधर !” उसने मेरे हाथ को झिंझोड़ते हुए कहा, “पोर्च के बाहर…” एक अजीब-सा डर उसकी आँखों में सिमट आया था.
कुछ भी नहीं था. सिर्फ़ बर्फ़ गिर रही थी. लैम्प-पोस्ट के दायरे में रुई के गालो-सी सफ़ेद और खामोश.
” मैं चलती हूँ…” उसने मेरी ओर देखा. ” कल…” उसने कहा.
उसने होटल का दरवाज़ा खोला…. अपना स्कार्फ़ और दस्ताने उतार दिए… फ़िर भागते हुए सीढियां चढ़ने लगी.
मैं निश्चिन्त हो गया. उसका भय वहीँ गिर गया था, जहाँ मेरी आकांक्षा थी. दोनों उस रात वहीँ पड़े रहे…. एक-दूसरे से बेखबर.

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शायद हर शहर का अपना अलग इतवार होता है… अपनी अलग आवाजें, और नीरवता. तुम आँखें मूंदकर भी जान लेते हो. ….ये ट्राम के पहिये हैं…यह उबलती कॉफ़ी की गंध. बाहर बर्फ़ पर खेलते हुए बच्चों की चीखें…. उनके परे गिरजों के बाग़ में बूढी औरतों की फुसफुसाहट. होस्टल में जब पुरानी लिफ्ट ऊपर चढ़ती है…. खाली कमरे हिलने लगते हैं. फ़िर वह ठहर जाती है…. चौथी मंज़िल पर…. जहाँ टी.टी. का कमरा है, उसके ऊपर होस्टल की
छत है. जहाँ हर इतवार को प्राग के गिरजों की घंटियाँ तिरती आती है… तुम सोते हुए भी उन्हें सुन सकते हो. तुम उन्हें सूंघ सकते हो. उनमें चिमनियों का धुआँ है, पतझर के सड़ते पत्तों की मृत्यु…. नदी के बहते पानी की सरसराहट ! दूसरे दिन दूसरे शहरों में होते हैं…. इतवार अपना-सा होता है…. पराए शहर में भी.

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मुझे तब पहली बार उसका चेहरा इतना पास लगा — सर्दी की सूखी धूप में सुर्ख़, बड़ा और बदला-सा. ” तुम थक गई हो ? ” मैनें पूछा. ” नहीं, मैं ठीक हूँ. ” उसने कहा. हवा से उसका स्कार्फ़ बार-बार फड़फड़ा जाता था. उसके बाहर कुछ भूरी लटें माथे पर छितर आई थीं — धूप में चमकती हुई. ” पास आ जाओ, वर्ना तुम हवा में उड़ जाओगी. ” मैंने हँसते हुए कहा. वह बिलकुल मुझसे सट गई. मुझे लगा, वह ठिठुर रही है. मैंने अपना मफ़लर उतारकर उसके गले में लपेट दिया. उसने कुछ कहने के लिए मुँह उठाया. उसे मालूम नहीं था, मेरा चेहरा उसके सिर पर है… तब अचानक मेरे होंठ उसके मुँह पर घिसटते गए… फ़िर वे ठहर गए, कनपटियों के नीचे कुछ भूरे बालों पर…. ” सुनो …” उसने कहा. किन्तु इस बार मैंने कुछ नहीं सुना. मेरे होंठ इस बार उसके मुँह पर आए आधे वाक्य पर जम गए. उसका उठा मुँह निर्वाक-सा उठा रहा. कुछ देर तक मैं सांस नहीं ले सका. हवा बहुत थी, लेकिन हम उसके नीचे थे. हम बार-बार साँस लेने के लिए ऊपर आते थे…. हाँफते हुए एक-दूसरे की ओर देखते थे… दीखता कुछ भी न था — अधखुले होंठ, ओवरकोट के कॉलर का एक हिस्सा, हम दोनों पर फड़फड़ाता हुआ बेचैन-सा स्कार्फ़….

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उसके स्वर ने मुझे चौंका-सा दिया. मैंने उसकी ओर देखा. शाम की बुझती रोशनी में उसका चेहरा बहुत उज्ज्वल-सा हो आया था. आँखों में एक दूरी थी, जो अपनी होती है, जिसमें किसी दूसरे का साझा नहीं होता. पीली जैकेट के ऊपर उसकी गर्दन इतनी पतली और सहमी-सी लगती थी, मानो ज़रा-सा झटका लगते ही  समूचे धड़ से अलग हो जाएगी. पहली बार मुझे लगा जैसे उम्र को छोड़ कर उसकी हर चीज़ बहुत कम है. छोटी नहीं, लेकिन कम…. जैसे उम्र उन्हें बिना छुए बढ़ गई है.

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उस शाम की स्मृति मुझे आज भी कुछ अलग-सी लगती है… अन्य दिनों से अलग. अन्य दिनों की तरह उस शाम हमें एक-दूसरे को खोजने या जानने की इच्छा नहीं रह गयी थी. लगता था, वह है और यह झेल पाना ही एक सुख है जो इतना ज़्यादा है कि पीड़ा देता था – क्योंकि एक असह्य-सा लगता था. जब हम चुप रहते थे, जैसे पानी चढ़ता हो
और उतर जाता हो. उसमे कोई दुराव न आता था. जब बोलते थे, तब भी बीच में और अचानक – यह नहीं लगता था कि चुप्पी के बाद बोल रहे हों. मुझे उस शाम पहली बार लगा था, जैसे मैं उसके साथ वैसे ही चल रहा हूँ, जैसे मारिया या फ्रांज़ के साथ – वह मेरे साथ है, यही काफ़ी था. उसके परे कुछ भी नहीं था – उसका अतीत मेरे लिए ख़तरा नहीं था. वह कुछ भी नहीं था. वह उससे कुछ अलग थी – और चाहे वह कितना ही शक्तिशाली क्यों न रहा हो – उस शाम उसका मेरे संग होना – वह उससे ज़्यादा था. वह सबसे ज़्यादा था. क्योंकि उसके बाहर जो उसका था, वह मेरे लिए कुछ भी नहीं था. और यह सोचते ही एक असम्भव-सी ख़ुशी मुझे घेर लेती थी.

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उसने मुस्कुराते हुए मेरा हाथ अपने हाथ में दबा लिया… हथेलियों के उस गरम दबाव में एक हल्की-सी कृतज्ञता छिपी थी… अनिर्वचनीय, अंतहीन. पहली बार मुझे लगा, जैसे इस शाम तक हम दोनों के बीच जो रिश्ता था, वह अब नहीं है. यह बदल गया था, स्वतः और अनायास. जिस चाह की एक झलक ऑडिटोरियम में मिली थी, वह अब भी थी. पहले हम उसे देखकर लज्जित और आतंकित-से हो गये थे….. अब उसका होना अनिवार्य-सा लग रहा था, हम दोनों के होने से जुड़ा हुआ.

(बुद्धू-बक्सा पर निर्मल जी के उपन्यासों पर शुरू यह सिरीज़, एक-एक कर उनके सभी उपन्यासों से अंश लेकर आएगी. निर्मल वर्मा को मैं इस तरह की भाषा का धनी मानता हूँ, जहाँ किसी भी चीज़ को समझाना या दिखाना असम्भव नहीं है. प्रेम जैसे पवित्र भाव या शहर के किसी मौसम, समय और दिन को सही-सही लिख पाने का गद्य-गुण यहाँ के अलावा इक्का-दुक्का जगहों पर ही शायद मिलता है. यहाँ कठिन अभिव्यक्ति को इस क़दर आसान बनाया जाता है कि पाठक स्वतः सहज महसूस करने लगता है.)