बुधवार, 12 जनवरी 2011

क्यों रे, अब बोल..... हू किल्ड द जेसिका?

एक हत्या, एक फ़िल्म, एक समय, एक मजबूत तंत्र और मीडिया. फ़िल्म आई है " नो वन किल्ड जेसिका ", एक सफल कोशिश राजकुमार गुप्ता द्वारा और पिछली बार की तरह ही नाटकीयता में सचाई रचने की कोशिश.

फुरफुरी-सी दौड़ाने वाली फ़िल्म, जिसने कुछ साबित नहीं किया, इसने बस दिखाया कि कैसे ताक़त स्थानांतरित होती है एक बड़े ओहदे से कई छोटे-छोटे ओहदों में (या बे-ओहदों में). नीरा राडिया टेप प्रकरण और इसी तरह के कई मामलों में हिचकोले खाते एनडीटीवी ने किस तरह मोर्चा सम्हाला था, ग़लत न्याय के ख़िलाफ़. इस ख़बरिया चैनल के किसी भी तरह के नुकसान की भरपाई हो पाई है या नहीं, इसके बारे में मैं कुछ भी नहीं जानना चाहता हूँ, लेकिन मैं उस फ़िल्म की सफलता को नकारने में ज़रूर हिचकूंगा जिसने एक आवाम को प्रभाव में लिया. "रंग दे बसंती" के बाद/साथ ये फ़िल्म उन कुछ फ़िल्मों की श्रेणी में आती है जिसके प्रभाव में एक बड़ा जनसमूह आया.

बेशक़ राजकुमार गुप्ता ऐसे निर्देशक कतई नहीं हैं जिन्हें अनुराग कश्यप, सुधीर मिश्र और नागेश जैसे अति-प्रतिभावान निर्देशकों की श्रेणी में रखा जा सके लेकिन उनकी प्रतिभा को इन निर्देशकों वाले ख़ास पैमाने पर भी नहीं रखा जा सकता है. सबसे पहले तो इस फ़िल्म नें स्त्री की बनी-बनाई इमेज (जिसमें बदलाव के लिए अधिकाधिक प्रयास किए जा रहे हैं) को तोड़ने के लिए उसमें कुछ और जोड़ा और ऐसा जोड़ा कि "गांड फट के हाथ में आ गई" {रानी मुख़र्जी का एक संवाद}. इसे संवाद के प्रभाव के तौर पर न लिया जाए लेकिन इसे एक प्रयोगात्मक एलिमेंट के प्रभाव के तौर पर लिया जाए. इस बात को लिख लिया जाए कि अब नहीं फर्क़ पड़ता किसी के विद्यालय या स्कूल का न ही किसी की ट्रेनिंग का, अब अगर फर्क़ पड़ता है तो सचाई और सार्थकता का, जिसे राजकुमार गुप्ता के पास पाया जा सकता है.


कहानी के बारे में ज़्यादा कुछ कहने की ज़रूरत नहीं है लेकिन स्टोरीटेलिंग एलिमेंट्स के बारे में जानना शायद ज़रूरी है. विद्या बालन हैं, जो सबरीना लाल की भूमिका में हैं (शान्त, निर्भीक, घबरालू और बेफ़िक्र) और साथ ही हैं रानी मुख़र्जी, जिन्होनें एक नामचीन एनडीटीवी पत्रकार का किरदार निभाया है (बोल्ड, सुन्दर, निर्भीक और प्रचंड तेवर-युक्त). शुरुआत में तो रानी ने बेरुखी से इस मामले को लिया, लेकिन फैसला आने के बाद वे एक मीडिया-भवानी के तौर पर अवतरित हुईं और देशव्यापी आन्दोलन को जन्म दिया, शायद इसके पीछे ख़बर पाने की लालसा ही क्यों न छिपी हुई हो, फ़िर भी ये फ्रंट स्टांस कहीं न कहीं फ़िल्म को उसका असल रुख देता है. फ़िल्म में अपने प्यारे मुंजाल भी हैं (अरे वही! खोसला का घोसला वाले), एक बिक चुके ईमानदार पुलिस वाले की भूमिका में, बिक चुकने के बाद भी इन्होने उन सभी बिन्दुओं की ओर लोगों का ध्यान खींचा है, जो केस के हिसाब से ज़रूरी थे. फ़िल्म के माहौल को निरन्तर हल्का रखने की कोशिश की गई है फ़िर भी विषय का माहौल लगातार अपनी रौ में है.


ये फ़िल्म इस स्तर से अधिक ऊँची हो सकती थी, लेकिन फ़िर भी किसी खाली जगह की गुंजाइश नहीं छोड़ी गई है जिससे दर्शक इसके वर्तमान स्तर से संतुष्ट होता है. जैसा पहले बताया था, संगीत
अमित त्रिवेदी का है और ताबड़तोड़ है, पीछे चल रहे सांगीतिक फिलर ग़ज़ब के प्रायोगिक हैं. अमित त्रिवेदी हमेशा की तरह पुरानेपन को नहीं दुहराते हुए आते हैं और फ़िर से छा जाते हैं.

सबरीना के हालात, जो किसी से छिपे नहीं हैं, बहुत ज़्यादा हद तक फ़िल्म में न्यायोचित तौर पर मिलते हैं और उसके आस-पास का माहौल थोड़ा नाटकीय लगता है. साथ फ़िल्म के लिए गए मित्र आदिल के अनुसार इंटरवल के 'पहले का हिस्सा फैक्चुअल और उसके बाद का हिस्सा फिक्शनल है', ये मेरी सहमति का एक और बिन्दु है जो फ़िल्म को शायद एक ही स्टेटमेंट में रेट करता है. "इश्किया" के बाद शायद ये अकेली महिला-प्रधान फ़िल्म है, मैं "इश्किया" को महिला-प्रधान फ़िल्म कहने से बचता हूँ क्योंकि यहाँ महिला से ज़्यादा महिला-चरित्र को फोकस किया गया है.


दिल्ली को केंद्र में रखकर एक फ़िल्म "दिल्ली-६" आई थी, लेकिन उस फ़िल्म के बारे में बातें करने के बजाय मैं पसंद करूंगा गानों के बारे में बात करना. किसी शहर के इर्द-गिर्द घूमती फ़िल्म द्वारा शहर को सैलानी-नज़रिए से दिखाने के बजाय शहर के अन्दर घुसकर दिखाना चाहिए, सफ़ेद/काले सभी पक्षों को सामने रखते हुए. दिल्ली में रह रहे लोग शायद इसे बखूबी समझते होंगे.


फ़िल्मों की समीक्षा करने के अलग-अलग तरीके हैं. क्या सभी फ़िल्मों को एक ही पैमाने पर रख कर तौला जा सकता है? बिलकुल नहीं.... "नो वन किल्ड जेसिका" को बस एक फ़िल्म की तरह तौलने के बजाय इसे सामाजिक परिप्रेक्ष्य में देखना ज़्यादा ज़रूरी है, लेकिन इसका मतलब ये कतई नहीं कि विचारों से फ़िल्म को दरकिनार कर समाज को जगह दी जाए. कोर्ट के फैसले के ख़िलाफ़ हुए जनविद्रोह को शायद थोड़े और अच्छे तरीक़े से दिखाया जा सकता था, लेकिन इसे इतने हल्केपन में दिखाने की सफ़ाई राजकुमार गुप्ता ने "रंग दे बसंती" का रेफरेंस दे कर दे दी है. लेकिन इस फ़िल्म के साथ "रंग दे बसंती" का नाम भी लेने से बचना चाहिए क्योंकि वहाँ कथा के बजाय आमिर खान थे.


कुल मिलाकर फ़िल्म एक नए स्वाद की है, जिसे समझ पाना या समझा पाना मुश्किल है लेकिन कठिन भी नहीं. इसे देखिए, आशा है कि इस जाड़े में इससे बेहतर फ़िल्म का आ पाना नामुमकिन है. लेख का शीर्षक बस यूँ ही आया एक ख़्याल. एक अच्छी फ़िल्म के लिए युगान्तक और आदिल का आभारी.

2 टिप्पणियाँ:

आवेश ने कहा…

राजनीति और पत्रकारिता में क्षमा की गुंजाइश नहीं होती |जेसिका की हत्या सिर्फ एक महिला की हत्या नहीं थी इस हत्या से उस उपभोगवादी और उन्मुक्त पेज३ समाज के अस्तित्व पर भी चोट पहुंची थी ,जो मीडिया के लिए खबर और बाजार दोनों है ,निस्संदेह फिल्म अच्छी होगी ,पर इसे आम आदमी का सिनेमा नहीं कहा जा सकता |

anurag vats ने कहा…

नो वन किल्ड जेसिका" को बस एक फ़िल्म की तरह तौलने के बजाय इसे सामाजिक परिप्रेक्ष्य में देखना ज़्यादा ज़रूरी है, लेकिन इसका मतलब ये कतई नहीं कि विचारों से फ़िल्म को दरकिनार कर समाज को जगह दी जाए...yah bahut zaroori baat hai siddhant jise aadtan sameekshak bhoolte rahe hain.