शुक्रवार, 25 अप्रैल 2014

कविता के युवा स्वर पर अविनाश मिश्र

(हिन्दी में एक उत्सव व्याप्त है. यह उत्सव रचने का उत्सव है, लेकिन मुद्दा यह है कि इस उत्सव में रचनाकार को चिन्हित कैसे किया जाए? आगे जो भी नाम मिलेंगे, उन्हें अलग से क़ाबिज़ करने की कोई चेष्टा नहीं की गयी है. ये नाम पहले से पढ़े-गुने जाते रहे हैं. कलम उठाई है अविनाश मिश्र ने. एक अलग दृष्टिकोण से परखें तो यहाँ आलोचक की निर्ममता का अभाव है, यह निर्ममता ज़रूरी तो नहीं है लेकिन कवियों को आत्मरंजित होने से बचाती है. कवि जिस क्रम में रखे गए हैं, वह कोई क्रम नहीं है, वह तो बस ऐसे ही है. उद्देश्य लेख में संभावनाएं ढूंढने से ज़्यादा इन कवियों में संभावनाएं ढूंढने का है, जिसे पूरा करना ही होगा. यह लेख दैनिक जागरण के साहित्य पृष्ठ 'पुनर्नवा' में पहले प्रकाशित संस्करण का असंपादित प्रारूप. बुद्धू-बक्सा अविनाश का आभारी.)

वे जो अभी साहिब-ए-किताब नहीं

अविनाश मिश्र 



‘आलोचक दें न दें 
अलमारी पर से निराला 
और बाईं दीवार से मुक्तिबोध 
रोज आशीर्वाद देते हैं
कला की चौखट पर बीड़ी पिएं कि सुट्टा
व्हिस्की में डूब जाएं कि पॉकेटमारी करें 
सबकी जगह है’ 

ये काव्य-पंक्तियां युवा कवयित्री शुभम श्री की एक कविता ‘सफल कवि बनने की कोशिशें’ से हैं। यह हिंदी कविता का अद्यतन स्वर है। यह युवतम है और इसमें सफल होने की कोशिशें अपने पूर्ववर्तियों से बहुत जुदा हैं। इसने माध्यम-विस्तार के मध्य एक बेबाकी और बेफिक्री अर्जित की है। यह जल्दबाजी में है, लेकिन इसलिए क्योंकि यह समय से पहुंचना चाहता है। यह मुगालतों में नहीं, जमीनी असर और वास्तविकताओं में है ताकि उस यथार्थ को व्यक्त कर सके जिसकी तकलीफें केवल स्मृतियों में ही नहीं वर्तमान तक फैली हुई हैं— इस आशंका के साथ कि भविष्य से कोई उम्मीद न रखी जाए। इसमें छद्म प्रतिबद्धता, उपलब्ध विमर्शों के प्रति मोह और चालू फार्मूलेबाजी नहीं है। ...हिंदी साहित्य में यह क्षण अब तक प्रचलित विमर्शों और आलोचना-समीक्षा पद्धतियों के अलोकप्रिय और अविश्वसनीय होने का क्षण है। समीकरणों से संचालित इन पद्धतियों की जाली गंभीरता के स्रोत अब बरामद हो चुके हैं और अब ये संदिग्ध नहीं, हास्यास्पद हैं। ये प्राय: देर से पहुंचती हैं और दूरगामी नहीं होने के वजह से एक निरर्थक किस्म का अवसाद और नैराश्य उपजाती हैं। इस दृश्य में शीघ्रातिशीघ्र संभावनाओं को जाहिर कर देना चाहिए, इससे प्रक्रिया उत्साहित और विकास बेहतर होता है। यहां वरिष्ठ कवि असद जैदी की एक काव्य-पंक्ति मौके का उद्धरण होगी कि ‘आलोचना ठहरकर इंतजार नहीं किया करती।’  

इस उद्धरण के बाद अगर शुभम श्री की कविताओं पर आएं तो कह सकते हैं कि ये ‘बोल्ड’ कविताएं हैं। ये हिंदी के एक वृहत लेकिन औसत काव्य-संसार से खुद को वैसे ही अलग करती हैं, जैसे एक सामान्य अनुच्छेद में कुछ अलग उभरे हुए वाक्य। इनमें रफ्ता-रफ्ता पकती हुई परिपक्वता है और पल-पल परिवर्तित प्रतिबद्धता और मूर्ख प्रतिरोध के प्रति एक वास्तविक विरोध। इनमें जो शोर है, वह किसी प्रसन्नचित्त व्यक्ति का शोर नहीं है। इस तरह का शोर मचकर शांत हो जाने वाला और अपने कुल असर में तात्कालिक होता है। ये कविताएं हमारे सार्वजनिक और व्यक्तिगत जीवन के बीच की दरारें दिखाती हैं और अपने प्रथम प्रभाव में आक्रांत करती हैं। इनमें मौजूद बौद्धिकता, वैचारिकता और विषय-चयन— सामयिकता में इन्हें इनका हाशिया सौंपता है। अव्यक्त अनुभवों के बेलौस सार्वजानिक प्रकटीकरण की वजह से इस हाशिए में हिंदी युवा कविता का केंद्र बनने की कूवत है।  

‘कोई रंग आए तो किसी दूसरे रंग को हटाकर न आए
इस तरह आए कि उससे ही निकाले जा सकें उसके दीगर संदर्भ 
बीच की अनेकार्थकताएं हटें तो इतना तो हो ही
कि कम से कम कहें जा सकें कुछ सीधे-सादे वाक्य’ 

ये काव्य-पंक्तियां महेश वर्मा की हैं और महेश की कविताओं पर बात करने के लिए यह स्पेस कतई अपर्याप्त है। लेकिन इस स्पेस में ही उनके काव्य-स्वर पर कम किंतु कुछ वाक्य संभव हों, यह मोह भी दुर्निवार है। ...आलोचना की एक सामर्थ्य यह भी है कि वह अयोग्यों को सक्रिय कर देती है। यह सक्रियता दृश्य को नुकसान पहुंचा सकती है— यह आशंका अपनी जगह है, लेकिन इससे यह तो जाहिर ही होता है कि योग्यता का अपना नेपथ्य होता है जो यह मानकर चलता है कि आलोचना एक गैरजरूरी वस्तु है जिसने अब तक अयोग्यों को ही ज्यादा फायदा पहुंचाया है...। इस प्रवचन के प्रकाश में देखें तो महेश की कविताएं योग्यता के नेपथ्य की कविताएं हैं। वे गए कुछ वर्षों के काव्य-दृश्य में धीमे-धीमे नुमायां हुई हैं और उन्होंने एक प्रचलित काव्य-विवेक को हैरां किया है। कवि की एक कविता ‘लाओ’ में उसके काव्य-व्यवहार के कुछ सूत्र ढूंढ़े जा सकते हैं, ‘वह कहीं से भी लाई जाए/ या कहीं नहीं से भी/ उसे लाओ...।’ पूर्वजों के प्रति साकांक्षता से भरे होने के बावजूद इन कविताओं की अपनी एक अलग मनुजता है जो इस सृष्टि की समग्र संवेदना को उसके वस्तुनिष्ठ वैभव और अभ्यंतरालोक के संसर्ग में धारण करने को व्यग्र है। इनमें एक सुंदर गद्य की काव्यगत लय है जिसमें बहुत सूक्ष्म स्तर पर एक अद्वितीय नवाचार घट चुका है। अपने समय और स्थानीयता की सशक्त अभिव्यक्ति होने पर भी, ये कविताएं किसी भी स्थानीयता की होकर समय के आर-पार जा सकती हैं। कवि की नेपथ्यगत तपस्या का संभवतः यही अभीष्ट है जिसके बारे में बेशक यह कह सकते हैं कि यह दूरगामी प्रभावों में हिंदी कविता के लिए हितकर है।       

‘मुझे बीच का निवाला खिलाना 
न पहला जिसे तुम निगल जाते हो 
न आखिरी जो आसक्ति से भर जाता है 
मुझे बीच का निवाला खिलाना
जिसे तुम सबसे लापरवाही से बामौज खाते हो’

ये काव्य-पंक्तियां युवा कवयित्री मोनिका कुमार की हैं। मोनिका की कविताओं में अर्थ-व्याप्ति के प्रति आसक्ति और आकर्षण इतना सघन है कि वे शीर्षकवंचित होना पसंद करती हैं। यह काव्य-स्वर बहुत ध्यान, अभ्यास और अध्यवसाय से बुना गया काव्य-स्वर है। प्रस्तुति से पूर्व इसमें जो पूर्वाभ्यास है वह इसे हिंदी युवा कविता का सबसे परिपक्व और सबसे संयत स्वर बनाता है। प्रथम प्रभाव में यह स्वर कुछ मुश्किल, कुछ वैभवपूर्ण, कुछ व्यवस्थित, कुछ अनुशासित और कुछ कम या नहीं खुलने वाला स्वर है। अपने अर्थशील आकर्षण में यह अपने आस्वादक से कुछ मुश्किल, कुछ वैभवपूर्ण, कुछ व्यवस्थित, कुछ अनुशासित और कुछ धैर्यशील होने की जायज मांग करता है। इसमें पूर्णत्व— जो एकदम नहीं, आते-आते आया है, चाहता है कि आस्वादक अपने अंदर से कुछ बाहर और बाहर से कुछ अंदर आए। इस तय स्पेस में मोनिका की कविताएं नजदीक के दृश्यबोध को एक दृष्टि-वैभिन्न्य देते हुए संश्लिष्ट बनाती हैं। इनकी मुखरता शब्दों और पंक्तियों के बीच के अंतराल में वास करती है। ये स्वर हिंदी कविता में कैसे एक अलग राह का स्वर है, यह सिद्ध करने के लिए यह कहना होगा कि भाषा में उपलब्ध स्त्री-विमर्श बहुत जाहिर ढंग से इसके कतई काम नहीं आया है। इसने प्रकटत: उसे अपनी काव्याभिव्यक्ति के लिए वर्जित मान लिया है। वह इसमें निहां हो सकता है, गालिबन है ही। लेकिन ‘सारे अनुमान मेरी भाषा की नाकामी हैं/ मुझे चाहिए कुछ विस्मयादिबोधक/ उन्माद वाहक/ जो करते हैं/ नाकामियों का विनम्र अनुवाद...।’ यह इस अर्थ में भी अलग है कि यह उन अनुभवों के अभावों को भरता है जिससे अब तक हिंदी कविता वंचित थी। यह विस्तार देती हुई गति है, इसे अपनी दिशाएं ज्ञात हैं और उनके अर्थ और लक्ष्य भी। यह उस काव्य-बोध के लिए चेतावनी है जो मानता है कि दिशाओं पर चलना और उन्हें समझना एक ही बात है। काव्यानुशीलन में व्यापक परिवर्तन की मांग वाले एक कविता-समय में मोनिका कुमार की कविताओं का अनुशासन और संगीतात्मक सौंदर्य भी इन्हें मौजूदा हिंदी कविता में भिन्न बनाता है। 

‘तुम्हारी कनपटियों पर आया स्वेद है मेरी कविता
तुम्हारी दुर्गंध, तुम जब गर्दन झुकाए देखते हो कुछ
तो तुम्हारी उघारी पीठ पर जो निकल आते हैं पंख
वे बहुत हैं मेरे संसार को लेकर उड़ जाने के लिए’

ये पंक्तिया युवा कवि अंबर रंजना पांडेय का काव्य-वक्तव्य हैं। अंबर का काव्य-स्वर एक जिद में मौजूदा से बहुत कम ग्रहण करता हुआ काव्य-स्वर है। एदुआर्दो गालेआनो ने एक साक्षात्कार के दौरान कहा था, ‘इस दुनिया में वर्गीकरण की एक अजीब सनक है और इस वजह हम सबके साथ कीड़ों जैसा व्यवहार होता है।’ इस दुनियावी सनक के अनुसार कहें तो अंबर की कविताओं को रीतिकाल से प्रेरित बताया जाता है। लेकिन अंबर का काव्य-स्वर इस तरह का काव्य-स्वर नहीं है कि उसे इस तरह की किसी सनक की कसौटी पर कसा जाए। इस युवतर स्वर में सामयिक भाषा में परित्यक्त व विस्मृत शब्दों के पुनर्वास और संरक्षण की पवित्र आकांक्षा है। इसमें एक कालातीत परंपरा का अग्रगामी विकास है। इस विकास की भाषा चित्रात्मक और वैभव रंगरेज है। अपने कवि-कर्म को लेकर अंबर का यह कथ्य भी गौरतलब है कि उन्हें पूरी परंपरा चाहिए— उसकी पूरी समृद्धि, उसका पूरा श्रम। इसके आगे वह यह भी जोड़ते हैं कि जैसे वाल्मीकि चोरों में कवि हुए हैं, वैसे ही वह कवियों में चोर हैं। 

अंबर के यहां गूलर, कदंब, बबूल, बेर, अमरूद के वृक्षों पर, केश धोने, केश काढ़ने, सिंदूर लगाने, ऋतु-स्नान पर, नगरों और स्थानीयताओं पर, अभय पर, भय पर, प्रेम पर, अभिनय पर कविताएं हैं। अंबर के ही शब्द लेकर कहें तब कह सकते हैं कि इन्हें छूना जादू है। इस जादू ने बहुत जल्द ही अपना विन्यास व वैभव सृजित व अर्जित कर लिया है। यह जादू मुग्ध करता है और अन्य के लिए फिलहाल मुश्किल है, इसलिए यह उनसे महज आस्वादक बने रहने की सदिच्छा प्रकट करता है। इसमें खतरें बहुत हैं क्योंकि यह भव्यता में संभव हो रहा है। इसमें प्रासंगिक, प्रचलित और लिए जा चुके जोखिम नहीं हैं। यह अपने निकट पूर्ववर्तियों और मौजूदा समवयस्कों से बहुत जुदा है।

‘डूबते हुए सूरज के साथ 
रक्ताभ होते आकाश का हल्का नीलापन
मुझे मेरे अंदर किन्हीं अतल गहराइयों में डुबो रहा है 
लगभग सारे पक्षी अपने बसेरों की ओर उड़ चले हैं
नदी किनारे मछलियों से बात करने में मसरूफ 
एक छुट गया अपने झुंड से 
अपनी व्याकुलता और उदासी के साथ 
आज की शाम मेरे साथ वही है’ 

‘शाम का साथी’ शीर्षक से यह युवा कवि सुधांशु फिरदौस की एक मुकम्मल कविता है। सुधांशु की कविताएं तब सबसे ज्यादा सुंदर नजर आती हैं जब उनमें लोक-बिंब आते हैं। यह सुखद है कि इस युवा कवि के अब तक के काव्य-संसार में यह सुंदरता प्राय: घटती रही है। इस घटने में अपनी मूल काव्याभिव्यक्ति को पाने की कवि की छटपटाहट देखी जा सकती है। इस छटपटाहट को रद्द नहीं करना, प्रभावों से मुक्त मौलिक कवि-कर्म की ओर प्रस्थान का प्रारंभ है। यह नजरिए में दूरगामिता की चाह है जो अंतत: कविता को सृमद्धता देगी। यह काव्य-स्वर सामयिक हिंदी कविता में क्यों अलग है, इसे केवल इस एक वाक्य में कहा जा सकता है कि ‘यहां जनपद छूटा हुआ नहीं लगता है।’ इस एक वाक्य के अतिरिक्त अगर कुछ कहना हो तब कहा जा सकता है कि सुधांशु में वह शब्द-संकोच या कहें वह सामर्थ्य है कि वह महज चंद शब्दों से एक जनपद का समग्र दृश्य-विधान रच सकते हैं। कवि ने लंबी कविताएं भी लिखी हैं जिनमें शहरी जीवन, प्रेम और पीढ़ियों के द्वंद्व और बदलाव हैं। सुधांशु फिरदौस ने अपने अब तक के काव्य-कौशल से जिस शब्द-शक्ति, बिंब-वैभव और अर्थ-बहुलता का प्रदर्शन किया है, वह अपने कुल असर में उन्हें हिंदी युवा कविता का एक सशक्त और संभावनामय स्वर बनाता है।

ये पांच युवा हिंदी कविता के वे काव्य-स्वर हैं जिनमें अपने आपको पढ़वाने और प्रभावी होने की काबिलियत है। इनकी कविताएं यकीन देती हैं कि स्मृति में स्थायी होने के लिए उनका संघर्ष जारी है और रहेगा। ऐसा कोई दावा इस लेख में नहीं है कि इन पांच कवियों के माध्यम से नई बन रही हिंदी कविता और उसके बदलावों को समझा जा सकता है। हिंदी कविता आज जितने फैलाव में है, पहले कभी नहीं रही। एक बेहतर बात यह है कि पहले यह जितनी मोहताज थी, अब उतनी नहीं रही। इसमें तमाम युवतम नाम हैं जो हिंदी काव्य-परंपरा को उसका वह विस्तार सौंपने के लिए प्रतिबद्ध हैं जिसकी वह पात्र है। ये नाम अपने यथार्थ की लगातार पड़ताल कर रहे हैं। ये कविता की सामाजिक भूमिका को रेखांकित करते हुए उसे गैरजरूरी होने से बचाने के जरूरी उद्यम में लगे हुए हैं। ये उनसे बहुत अलग हैं जो अपनी नाराजगी को नकली नारों की शक्ल में खत्म कर, व्यवस्था से जा मिलने को बिलकुल बेकरार हैं।   

1 टिप्पणियाँ:

सुशील ने कहा…

साहिब-ए-क़िताब भले नहीं हैं लेकिन किन्हीं क़िताबों से कम नहीं हैं चंद पंक्तियाँ... इन उम्मीदों को सामने लाने का शुक्रिया, आलोचक न दें, पाठक जरूर देंगे सम्मान और जगह भी