शुक्रवार, 28 नवंबर 2014

पंकज चतुर्वेदी की कविताएं


[पंकज चतुर्वेदी की एक कविता 'पुरुषत्व एक उम्मीद' में मोबाइल फ़ोन के ख़तरों के सन्दर्भ में एक उच्चस्तरीय भारतीय संस्थान के बुद्धिजीवी तय करते हैं कि वे मोबाइल को पैंट की जेब में नहीं, बल्कि दिल के पास ऊपरी जेब में ही रखेंगे; ताकि उनके पुरुषत्व में कोई कमी न आने पाये, दिल को नुक़्सान भले ही हो. मोबाइल फ़ोन को विभिन्न अंगों के क़रीब रखने के नतीजों और बच्चों पर उसके प्रभावों का यह वर्णन अंतिम हिस्से में एकाएक मोबाइल को छोड़कर उसके उपभोक्ताओं की मानसिकता पर आ जाता है, एक गंभीर सामाजिक टिप्पणी का रूप ले लेता है और हम एक ऐसी दुनिया से घिर जाते हैं; जो प्रेम, संवेदना और आत्मा को खोकर भी अपने 'पुरुष' होने के सामंतीपन, दंभ और यौन वर्चस्व को बरक़रार रखना चाहती है. शुरू में सहज-निरापद-सी लगती यह कविता अंत में हमारे भीतर एक भय पैदा कर देती हैः “इस तरह मैंने जाना/पुरुषत्व एक उम्मीद है समाज की/जिसके पास दिल नहीं रहा.” दरअसल, तथाकथित पुरुषत्व का विरोध-प्रतिरोध या उसकी आलोचना या उपहास पंकज चतुर्वेदी की कविता का एक प्रमुख कथ्य है, जिसकी चीर-फाड़ वे कई तरह के दृष्टान्तों और मामूली दिखने वाले प्रसंगों के ज़रिए करते हैं. गाँव से आनेवाले एक भ्रष्ट और सम्मानित रईस हों या विभागाध्यक्ष न बन पाने की शिकायत करनेवाले हिन्दी के एक प्रोफे़सर हों या दिन के समय भयानक दिखनेवाले एक कुत्ते 'टैरू' की रात में याचना-भरी मुद्रा को समझ पाने में कवि की अक्षमता का मार्मिक प्रकरण - पंकज के व्यंग्य की ज़द में एक 'पुरुष' हमेशा रहता है. पंकज ने प्रेम-सम्बन्धों पर कई कविताएँ लिखी हैं, जो मर्म को छू जाती हैं; लेकिन उनमें भी वे स्त्री की तुलना में 'पुरुष मानसिकता' की कमतरियों को आँकते चलते हैं.
अपने आलोचनात्मक नज़रिये में पंकज जिस तरह तमाम धंधई समीक्षात्मकता से अलग हैं, वैसे ही उनकी काव्यात्मक संवेदना और शिल्प भी अपने समकालीनों में सबसे अलग है. वे साधारण जीवन-स्थितियों के माध्यम से जीवन और समाज की बड़ी सचाइयों को बेहद सहजता से उद्घाटित कर जाते हैं. यह उद्घाटन आम तौर पर कविता के अंत में होता है, जहाँ वे सूक्तिपरकता या दार्शनिक कथन की भंगिमा में किसी बुनियादी या तात्त्विक स्थिति को दर्ज करते हैं. मसलन, समाज के दर्द और कैंसर जैसी बीमारियों पर बात करते हुए पंकज उनके फ़ौरी समाधानों की जटिलता और महँगी भूलभुलैया की बाबत कहते हैं: “पर वह संघर्ष नहीं/उसका मिथ होता है/वह इतना निजी होता है/कि कैंसर होता है.” सईद अख़्तर मिर्ज़ा की फ़िल्म 'नसीम' को देखकर लिखी गयी एक मार्मिक कविता में पंकज देश के बँटवारे से लेकर बाबरी मस्जिद के ध्वंस की घटनाओं के ज़रिये राज्यसत्ता को सवालों के दायरे में लाते हैं: “जब बाबरी मस्जिद का/दूसरा गुम्बद भी ढहा दिया गया/तो पहले और दूसरे गुम्बद के बीच/सरकार कहाँ थी/कहाँ था देश/और संविधान?” इसी कविता की कुछ और पंक्तियाँ भी याद रखने लायक़ हैं: “फिर भी तुम पूछो/क्यों नीला है आसमान/तो उसकी यही वजह है/कि दर्द के बावजूद/मुस्करा सकता है इंसान" या "दरअसल बाहर से आया हुआ/किसी को बताना/उसे भीतर का न होने देना है.”
पंकज चतुर्वेदी की संवेदना का एक आयाम 'कला का समय', 'कमीनों का क्या है', 'आभार' और 'वृक्षारोपण' जैसी कविताओं में दिखता है, जहाँ वे अच्छे अर्थों में रघुवीर सहाय की-सी व्यंग्य-विरूप प्रविधि की याद दिलाते हुए समाज और मनुष्य के किसी 'एब्सर्ड' अमानवीय पक्ष की तहों में जाते हैं. 'रक्तचाप', 'शमीम', 'तुम जहाँ मुझे मिली थीं' और 'पाँच महीने के अपने बच्चे से बातचीत के बहाने' जैसी कविताएँ उनकी संवेदना का दूसरा आयाम हैं, जहाँ वे कभी सीधी राजनीतिक बहस करते हैं या कभी उन अत्यंत बारीक मानवीय क्षणों को पकड़ते हैं, जो कोई मार्मिक कहानी कह जाते हों. पाँच महीने के अपने बच्चे के बारे में उनकी कविता इसका एक अद्भुत उदाहरण है. पंकज एक फ़्लैट के भीतर, बिना बाग़ीचे, बिना आकाश के इस बच्चे के रोने के कारणों को खोजते हुए 'खुले आसमान, ठंडी हवा, सड़क पर बचे रह गए सघन वृक्षों, ऊँचे और भव्य लैम्प-पोस्टों और चन्द्रमा और नक्षत्रों' और उनके विस्मय और सौन्दर्य तक चले जाते हैं और इस पूरी कायनात को 'एक “ज़रूरी काम” की तरह देखते' हैं, “जिसके बिना/मनुष्य होने में/संपूर्णता नहीं.”
ऐसी ही मार्मिक कहानियाँ और ऐसी ही व्यंग्य-वक्रता पंकज चतुर्वेदी की कविता को विलक्षण बनाती हैं.]


                                                                                                              - व्यंग्य का मर्म, मंगलेश डबराल.


कला का समय

रामलीला में धनुष-यज्ञ के दिन
राम का अभिनय
राजकुमार का अभिनय है
 
मुकुट और राजसी वस्त्र पहने
गाँव का नवयुवक नरेश
विराजमान था रंगमंच पर

सीता से विवाह होते-होते
सुबह की धूप निकल आयी थी
पर लीला अभी जारी रहनी थी
अभी तो परशुराम को आना था
लक्ष्मण से उनका लम्बा संवाद होना था

नरेश के पिता किसान थे
सहसा मंच की बग़ल से
दबी आवाज़ में उन्होंने पुकारा:
नरेश! घर चलो
सानी-पानी का समय हो गया है

मगर नरेश नरेश नहीं था
राम था
इसलिए उसने एक के बाद एक
कई पुकारों को अनसुना किया

आखि़र पिता मंच पर पहुँच गये
और उनका यह कहा
बहुतों ने सुना-
लीला बाद में भी हो जायेगी
पर सानी-पानी का समय हो गया है


वह इतना निजी

आॅपरेशन के बाद
डाॅक्टर कहते हैं:
आॅपरेशन की जगह पर
दर्द बिलकुल न होता हो
तो वह किसी ख़तरनाक
बीमारी का लक्षण है
वह कैंसर भी
हो सकता है

दर्द है इस समाज को
बहुत है
पर उस दुख के
कारणों पर कोई
रैडिकल बहस नहीं है
न उसके पीछे छिपी
ताक़तों को पहचानने
और उनका प्रतिकार करने जितनी
युयुत्सा है

सिर्फ़ फ़ौरी समाधान
और इलाज हैं
और वे ही इतने महँगे
और जटिल हैं
कि उनमें एक भूलभुलैया है
जिसमें चलते हुए हमें लगता है
कि हम वस्तुतः
संघर्ष कर रहे हैं

पर वह संघर्ष नहीं
उसका मिथ होता है
वह इतना निजी होता है
कि कैंसर होता है

 
पाँच महीने के अपने बच्चे से बातचीत के बहाने

जब भी तुम रोते हो
मैं जानता हूँ, मेरे बच्चे
तुम कुछ कहना चाहते हो
और उसे कह नहीं पा रहे

मसलन अपनी नींद, भूख
किसी और इच्छा, ज़रूरत
या तकलीफ़ के बारे में कुछ

भले ही कुछ कवियों को लगता हो
कि बच्चे अकारण रोते हैं
और कुछ और कवि
ग़ालिब की कविता में आये दुख को
महज़ ‘होने’ का अवसाद
बताते हों
मगर ऐसी शुद्धता
मुमकिन नहीं है

दुख के कारण होते हैं
और उसके रिश्ते
हमारे समय
और जि़न्दगी के हालात से
चाहे कोई उन्हें देख न पाये
और अगर देख पा रहा है
तो इस तरह के झूठ का प्रचार करना
किसी सामाजिक अपराध से कम नहीं है

मैं जानता हूँ, मेरे बच्चे
एक फ़्लैट के भीतर
जिसका अपना कोई बाग़ीचा नहीं
आकाश भी नहीं
तुम सो नहीं पाते

तुम्हें नींद आती है
खुले आसमान के नीचे
जहाँ ठंडी हवा चलती है
उन सघन वृक्षों की छाँह में
जो सड़क पर बचे रह गए हैं

उनसे पहले आते हैं
वे इक्का-दुक्का
ऊँचे और भव्य लैम्प-पोस्ट-
जो सरकार के प्रति जवाबदेह नहीं
इसलिए शायद जले रह गए हैं-
उन्हें देखते हो तुम
अपार कौतूहल से
अपनी ही नज़र में डूबकर
मानो यह सोचते हुए-
यह रौशनी इतनी उदात्त
आखि़र इसका स्रोत क्या है?

और वे चन्द्रमा और नक्षत्र-
खगोलविद् उनके बारे में
कुछ भी कहें-
मगर जो न जाने कितनी शताब्दियों से
दुनिया के सबसे सुखद
और समुज्ज्वल विस्मय हैं

उनके सौन्दर्य में जब तुम
निमज्जित हो जाते हो
मुझसे बहुत दूर
फिर भी कितने पास मेरे
तब मुझे लगता है, मेरे बच्चे--
यह भी एक ज़रूरी काम है
जिसके बिना
मनुष्य होने में
संपूर्णता नहीं

1947 में
(सईद अख़्तर मिर्ज़ा की फि़ल्म ‘नसीम’ देखकर)

1947 में जो मुसलमान थे    
उन्हें क्यों चला जाना चाहिए था
पाकिस्तान ?

जिन्होंने भारत में ही रहना चाहा
उन्हें ग़रीब बनाये रखना
क्यों ज़रूरी था ?

जिस जगह राम के जनमने का
कोई सुबूत नहीं था
वहाँ जब बाबरी मस्जिद का
दूसरा गुम्बद भी ढहा दिया गया
तो पहले और दूसरे गुंबद के बीच
सरकार कहाँ थी
कहाँ था देश
और संविधान?

फिर भी तुम पूछो
क्यों नीला है आसमान
तो उसकी यही वजह है
कि दर्द के बावजूद
मुस्करा सकता है इंसान

मगर इससे भी अहम है
हिन्दी के लेखकों से पूछो:
जब आर्य भी बाहर से आये
तो मुसलमानों को ही तुम
बाहर से आया हुआ
क्यों बताते हो
उनकी क़ौमीयत पर सवाल उठाते हुए
उन्हें देशभक्त साबित करने की
उदारता क्यों दिखाते हो ?

दरअसल बाहर से आया हुआ
किसी को बताना
उसे भीतर का न होने देना है

जबकि उनमें-से कोई
महज़ एक दरख़्त की ख़ातिर
1947 में
यहीं रह गया
पाकिस्तान नहीं गया


रक्तचाप

रक्तचाप जीवित रहने का दबाव है
या जीवन के विशृंखलित होने का ?

वह ख़ून जो बहता है
दिमाग़ की नसों में
एक प्रगाढ़ द्रव की तरह
किसी मुश्किल घड़ी में उतरता है
सीने और बाँहों को
भारी करता हुआ

यह एक अदृश्य हमला है
तुम्हारे स्नायु-तंत्र पर
 
जैसे कोई दिल को भींचता है
और तुम अचरज से देखते हो
अपनी क़मीज़ को सही-सलामत

रक्तचाप बंद संरचना वाली जगहों में-
चाहे वे वातानुकूलित ही क्यों न हों-
साँस लेने की छटपटाहट है

वह इस बात की ताकीद है
कि आदमी को जब कहीं राहत न मिल रही हो
तब उसे बहुत सारी आॅक्सीजन चाहिए

अब तुम चाहो तो
डाॅक्टर की बतायी गोली से
फ़ौरी तसल्ली पा सकते हो
नहीं तो चलती गाड़ी से कूद सकते हो
पागल हो सकते हो
या दिल के दौरे के शिकार
या कुछ नहीं तो यह तो सोचोगे ही
कि अभी-अभी जो दोस्त तुम्हें विदा करके गया है
उससे पता नहीं फिर मुलाक़ात होगी या नहीं

रक्तचाप के नतीजे में
तुम्हारे साथ क्या होगा
यह इस पर निर्भर है
कि तुम्हारे वजूद का कौन-सा हिस्सा
सबसे कमज़ोर है

तुम कितना सह सकते हो
इससे तय होती है
तुम्हारे जीवन की मियाद

सोनभद्र के एक सज्जन ने बताया-
(जो वहाँ की नगरपालिका के पहले चेयरमैन थे
और हर साल निराला का काव्यपाठ कराते रहे
जब तक निराला जीवित रहे)-
रक्तचाप अपने में कोई रोग नहीं है
बल्कि वह है
कई बीमारियों का प्लेटफ़ाॅर्म
और मैंने सोचा
कि इस प्लेटफ़ाॅर्म के
कितने ही प्लेटफ़ाॅर्म हैं

मसलन संजय दत्त के
बढ़े हुए रक्तचाप की वजह
वह बेचैनी और तनाव थे
जिनकी उन्होंने जेल में शिकायत की
तेरानबे के मुम्बई बम कांड के
कितने सज़ायाफ़्ता क़ैदियों ने
की वह शिकायत?

अपराध-बोध, पछतावा या ग्लानि
कितनी कम रह गयी है
हमारे समाज में

इसकी तस्दीक़ होती है
एक दिवंगत प्रधानमन्त्री के
इस बयान से
कि भ्रष्टाचार हमारी जि़न्दगी में
इस क़दर शामिल है
कि अब उस पर
कोई भी बहस बेमानी है

इसलिए वे रक्त कैंसर से मरे
रक्तचाप से नहीं

हिन्दी के एक आलोचक ने
उनकी जेल डायरी की तुलना
काफ़्का की डायरी से की थी
हालाँकि काफ़्का ने कहा था
कि उम्मीद है
उम्मीद क्यों नहीं है
बहुत ज़्यादा उम्मीद है
मगर वह हम जैसों के लिए नहीं है

जैसे भारत के किसानों को नहीं है
न कामगारों-बेरोज़गारों को
न पी. साईंनाथ को
और न ही वरवर राव को है उम्मीद
लेकिन प्रधानमन्त्री, वित्तमन्त्री
और योजना आयोग के उपाध्यक्ष को
बाबा रामदेव को
और मुकेश अम्बानी को उम्मीद है
जो कहते हैं
कि देश की बढ़ती हुई आबादी
कोई समस्या नहीं
बल्कि उनके लिए वरदान है

मेरे एक मित्र ने कहा:
रक्तचाप का गिरना बुरी बात है
लेकिन उसके बढ़ जाने में कोई हरज नहीं
क्योंकि सारे बड़े फ़ैसले
उच्च रक्तचाप के
दौरान ही लिये जाते हैं

इसलिए यह खोज का विषय है
कि अठारह सौ सत्तावन की
डेढ़ सौवीं सालगिरह मना रहे
देश के प्रधानमन्त्री का
विगत ब्रिटिश हुकूमत के लिए
इंग्लैण्ड के प्रति आभार-प्रदर्शन
बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के लिए
वित्त मन्त्री का निमंत्रण--
कि आइये हमारे मुल्क में
और इस बार
ईस्ट इण्डिया कम्पनी से
कहीं ज़्यादा मुनाफ़ा कमाइये
और नन्दीग्राम और सिंगूर के
हत्याकांडों के बाद भी
उन पाँच सौ विशेष आर्थिक क्षेत्रों को
कुछ संशोधनों के साथ
क़ायम करने की योजना-
जिनमें भारतीय संविधान
सामान्यतः लागू नहीं होगा--
क्या इन सभी फ़ैसलों
या कामों के दरमियान
हमारे हुक्मरान
उच्च रक्तचाप से पीडि़त थे?

या वे असंख्य भारतीय
जो अठारह सौ सत्तावन की लड़ाई में
अकल्पनीय बर्बरता से मारे गये
कर्ज़ में डूबे वे अनगिनत किसान
जिन्होंने पिछले बीस बरसों में
आत्महत्याएँ कीं
और वे जो नन्दीग्राम में
पुलिस की गोली खाकर मरे-
अपना रक्तचाप
सामान्य नहीं रख पाये?

यों तुम भी जब मरोगे
तो कौन कहेगा
कि तुम उत्तर आधुनिक सभ्यता के
औज़ारों की चकाचौंध में मरे
लगातार अपमान
और विश्वासघात से

कौन कहता है
कि इराक़ में जिसने
लोगों को मौत की सज़ा दी
वह किसी इराक़ी न्यायाधीश की नहीं
अमेरिकी निज़ाम की अदालत है

सब उस बीमारी का नाम लेते हैं
जिससे तुम मरते हो
उस विडम्बना का नहीं
जिससे वह बीमारी पैदा हुई थी


टैरू

कुछ अर्सा पहले
एक घर में मैं ठहरा था

आधी रात किसी की
भारी-भारी साँसों की आवाज़ से
मेरी आँख खुली
तो देखा नीम-अँधेरे में
टैरू एकदम पास खड़ा था
उस घर में पला हुआ कुत्ता
बाॅक्सर पिता और
जर्मन शेफ़र्ड माँ की संतान

दोपहर का उसका डरावना
हमलावर भौंकना
काट खाने को तत्पर
तीखे पैने दाँत याद थे
मालिक के कहने से ही
मुझको बख़्श दिया था

मैं बहुत डरा-सहमा
क्या करूँ कि यह बला टले
किसी तरह हिम्मत करके
बाथरूम तक गया
बाहर आया तो टैरू सामने मौजूद
फिर पीछे-पीछे

बिस्तर पर पहुँचकर
कुछ देर के असमंजस
और चुप्पी के बाद
एक डरा हुआ आदमी
अपनी आवाज़ में
जितना प्यार ला सकता है
उतना लाते हुए मैंने कहा:
सो जाओ टैरू !

टैरू बड़े विनीत भाव से
लेट गया फ़र्श पर
उसने आँखें मूँद लीं

मैंने सोचा:
सस्ते में जान छूटी
मैं भी सो गया

सुबह मेरे मेज़बान ने
हँसते-हँसते बताया:
टैरू बस इतना चाहता था
कि आप उसके लिए गेट खोल दें
और उसे ठंडी खुली हवा में
कुछ देर घूम लेने दें

आज मुझे यह पता लगा:
टैरू नहीं रहा

उसकी मृत्यु के अफ़सोस के अलावा
यह मलाल मुझे हमेशा रहेगा
उस रात एक अजनबी की भाषा
उसने समझी थी
पर मैं उसकी भाषा
समझ नहीं पाया था


वृक्षारोपण

प्रबोध जी अध्यापक हैं
जि़ला शिक्षा प्रशिक्षण संस्थान में

एक दिन सरकारी निर्देशों के मुताबिक़
वहाँ वृक्षारोपण कार्यक्रम का आयोजन हुआ

मुख्य अतिथि बनाये गये
संयुक्त शिक्षा निदेशक
यानी जे.डी. साहब
प्रबोध जी को संचालन सौंपा गया

प्राचार्या ने स्वागत-भाषण में
जे.डी. साहब के लिए वही कहा
जो कबीर ने प्रभु की
महिमा में कहा था:
‘‘सात समुंद की मसि करौं,
लेखनि सब बनराइ।
धरनी सब कागद करौं,
हरि गुन लिखा न जाइ।।’’

प्रबोध जी से रहा नहीं गया
संचालक की हैसियत से वह बोले:
‘जब मुख्य अतिथि की तारीफ़ में
काट डाले जायेंगे बनराइ
तो वृक्षारोपण
क्यों करते हो भाई?’


कमीनों का क्या है

गाँव से एक महाशय आये
रईस, सम्मानित, प्रभावशाली
एक गृह-प्रवेश समारोह में
मिल गये

गाँव में उनके कई धंधे
खाद, सीमेण्ट, डीज़ल
दवाओं की बिक्री के
एक जीप किराये पर चलाने की
हर धंधे में मिलावट, बेईमानी
चोरी, जालसाज़ी और झूठ

एक और धंधा
पाँच सौ रुपये के नक़ली
नोटों का
जिनमें-से कुछ आखि़रकार
पुलिस ने ज़ब्त किये
उनके घर से
एक आधी रात
जिसका मुक़द्दमा
शायद अब भी चलता हो
किसी अदालत में

और वह ज़मानत पर छूटे हुए
उनका लाखों का कारोबार

बहरहाल, उस जलसे में मुझसे
अपनी पत्नी की
बीमारी का जि़क्र किया
पूछा: कोई डाॅक्टर बताओ
पेट का जानकार

मैंने कहा: हाँ! हैं
इस शहर में
एक बहुत बड़े डाॅक्टर
उनको दिखाइये
शर्तिया फ़ायदा होगा
डाॅक्टरी इतनी चलती है
कि अभी इनकम टैक्स का
छापा पड़ा था
करोड़ों रुपये बरामद हुए

वह सुनते रहे ध्यान से
फिर गुस्से में बोले-
कमीनों का क्या है
फिर कमा लेंगे

यह बात
ऐसे कही गयी थी
इतनी हिक़ारत और इत्मीनान से
जैसे यह ख़ुद उनके बारे में
सही नहीं थी


तुम जहाँ मुझे मिली थीं

तुम जहाँ मुझे मिली थीं
वहाँ नदी का किनारा नहीं था
पेड़ों की छाँह भी नहीं

आसमान में चन्द्रमा नहीं था
तारे नहीं

जाड़े की वह धूप भी नहीं
जिसमें तपते हुए तुम्हारे गौर रंग को
देखकर कह सकता:
हाँ, यह वही ‘श्यामा’ है
‘मेघदूत’ से आती हुई

पानी की बूँदें, बादल
उनमें रह-रहकर चमकनेवाली बिजली
कुछ भी तो नहीं था
जो हमारे मिलने को
ख़ुशगवार बना सकता

वह कोई एक बैठकख़ाना था
जिसमें रोज़मर्रा के काम होते थे
कुछ लोग बैठे रहते थे
उनके बीच अचानक मुझे देखकर
तुम परेशान-सी हो गयीं
फिर भी तुमने पूछा:
तुम ठीक तो हो?

तुम्हारा यह जानते हुए पूछना
कि मैं ठीक नहीं हूँ
मेरा यह जानते हुए जवाब देना
कि उसका तुम कुछ नहीं कर सकतीं

सिर्फ़ एक तकलीफ़ थी जिसके बाद
मुझे वहाँ से चले आना था
तुम्हारी आहत दृष्टि को
अपने सीने में सँभाले हुए

वही मेरे प्यार की स्मृति थी
और सब तरफ़ एक दुनिया थी
जो चाहती थी
हम और बात न करें
हम और साथ न रहें
क्योंकि इससे हम
ठीक हो सकते थे


आभार

एक प्रदेश की राजधानी में मिले वह
राष्ट्रीय परिसंवाद में
एक विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर
हिन्दी के वरिष्ठ आलोचक

नींद से जगाकर पहली ख़बर
उन्होंने मुझे यही दी -
‘मैं विभागाध्यक्ष नहीं बन पाया’

मैं समझ नहीं सका
इस बात का
मेरी जि़न्दगी से
क्या सम्बन्ध है

तभी वहाँ आये मेरे मित्र
मैंने उनसे परिचय कराया -
ये गिरिराज किराडू हैं
युवा कवि
‘प्रतिलिपि’ के संपादक

बाद में उन्होंने पूछा -
‘किराडू क्या तमिलनाडु का है ?’

मैंने कहा: नहीं
पर आपको ऐसा क्यों लगा ?

वह बोले: किराडू
चेराबंडू राजू से
मिलता-जुलता नाम है

वैसे जो नाम वह ले रहे थे
सही रूप में चेरबंडा राजु है
क्रांतिकारी तेलुगु कवि का

फिर उन्होंने किसी प्रसंग में कहा:
स्त्रियाँ पुरुषों को
एक उम्र के बाद
दया का पात्र
समझने लगती हैं

परिसंवाद के आखि़री दिन
उन्हें बोलना था
‘आलोचना के सौन्दर्य-विमर्श’ पर
मगर उससे पहले उनकी ट्रेन थी
इसलिए आयोजकों ने चाहा
कि वह ‘आलोचना के समाज-विमर्श’ पर
कुछ कहें

यों एक सत्र का शीर्षक
‘आलोचना का धर्म-विमर्श’ भी था

उन्होंने मुझसे कहा:
इस सत्र में बोलने को कहा जाता
तो ज़्यादा ठीक रहता

फिर कारण बताया:
हिन्दी की सर्वश्रेष्ठ आलोचना
धर्म ही पर न लिखी गयी है

बहरहाल। उन्होंने अपने सत्र
‘आलोचना का समाज-विमर्श’ में
जो कुछ कहा
उसका सारांश यह है:
पहले भी दो बार बुलाया था यहाँ
व्यवस्था अच्छी है
आभारी हूँ
इस बार भी
आभार


शमीम

जाड़े की सर्द रात
समय तीन-साढ़े तीन बजे
रेलवे स्टेशन पर
घर जाने के लिए
मुझे आॅटो की तलाश

आखि़र जितने पैसे मैं दे सकता था
उनमें मुझे मिला
आॅटो-ड्राइवर एक लड़का
उम्र सत्रह-अठारह साल

मैंने कहा: मस्जिद के नीचे
जो पान की दुकान है
ज़रा वहाँ से होते हुए चलना

रास्ते में उसने पूछा:
क्या आप मुसलमान हैं?

उसके पूछने में
प्यार की एक तरस थी
इसलिए मैंने कहा: नहीं,
पर होते तो अच्छा होता

फिर इतनी ठंडी हवा थी सख़्त
आॅटो की इतनी घरघराहट
कि और कोई बात नहीं हो सकी

लगभग आधा घंटे में
सफ़र ख़त्म हुआ
किराया देते वक़्त मैंने पूछा:
तुम्हारा नाम क्या है?

उसने जवाब दिया: शमीम ख़ान
 
नाम में ऐसी कशिश थी
कि मैंने कहा:
बहुत अच्छा नाम है

फिर पूछा:
तुम पढ़ते नहीं हो?

एक टूटा हुआ-सा वाक्य सुनायी पड़ा:
कहाँ से पढ़ें?

यही मेरे प्यार की हद थी
और इज़हार की भी


पुरुषत्व एक उम्मीद

मोबाइल आप कहाँ रखेंगे?

क़मीज़ के बायीं ओर
ऊपर जेब में?
तो दिल को ख़तरा है

कान से लगाकर रोज़ाना
ज़्यादा बात करेंगे
तो कुछ बरसों में
आंशिक बहरापन
आ सकता है

सिर के पास रखने से
ब्रेन ट्यूमर का अंदेशा है

टेलीकाॅम कम्पनियों के
बेस स्टेशनों के
एंटीना से निकलती ऊर्जा
कोशिकाओं का तापमान बढ़ाती है
बड़ों की बनिस्बत बच्चे इससे
अधिक प्रभावित होते हैं

मोबाइल के ज़्यादा इस्तेमाल से
याददाश्त और दिशा-ज्ञान सरीखी
दिमाग़ी गतिविधियों पर
व्यवहार पर
बुरा असर पड़ता है
ल्यूकेमिया जैसी ख़ून की बीमारी
हो सकती है

इसलिए डाॅक्टर कहते हैं:
कुछ घण्टे मोबाइल को
पूरे शरीर से ही
दूर रखने की आदत डालें

और अगर पैंट की जेब में रखेंगे
तो पुरुषत्व जा सकता है

इस पर एक उच्च-स्तरीय भारतीय संस्थान में
कुछ बुद्धिजीवी
अपने एक सहधर्मी के सुझाव से
सहमत और गद्गद थे
कि दिल भले जाय
हम तो पुरुषत्व को बचायेंगे

इस तरह मैंने जाना
पुरुषत्व एक उम्मीद है समाज की
जिसके पास दिल नहीं रहा


[यह अप्रतिम कविताएं और मंगलेश जी की टिप्पणी 'उद्भावना' में प्रकाशित हैं. तस्वीर पावेल कुचिंस्की की. बुद्धू-बक्सा सभी के प्रति आभारी]

1 टिप्पणियाँ:

आशीष मिश्र ने कहा…

सभी कविताएं बहुत सुंदर हैं! पढ़वाने के लिए हार्दिक धन्यवाद!!