गुरुवार, 1 नवंबर 2012

विष्णु खरे की नई कविताएँ

[हम विष्णु खरे की कुछ नई कविताओं से मुखातब हैं. सभी कविताओं की अपनी एक भिन्न कैफ़ियत है. वे एक बिलकुल ताज़ा और समग्र रचनात्मक फ़ासला तय करती हैं. ये कविताएँ ऐसे समय में हमारे सामने आई हैं जब हिन्दी का काव्य एक बड़ी क्राइसिस से जूझ रहा है और जो मौजूद है उस पर ख़राब व इंटरनेटीय रचनाओं का अतिक्रमण हो रहा है. जो अन्य युवा कवि और अर्ध-युवा कवि हैं, उनके लिए ये कविताएँ मानक हो सकती हैं. आत्मारोपों और जीवन-संघर्षों की गुत्थमगुत्थी के बीच के पुल पर इन कविताओं का विचरण होता है. अपनी बेबाकी के कारण लोगों की तल्खी का सामना करते विष्णु खरे की यह कविताएँ डॉ. जय नारायण बुधवार - संपादित पत्रिका "कल के लिए" में प्रकाशित हैं. इन कविताओं का यहाँ पुनर्प्रकाशन कवि और संपादक की सहमति से किया जा रहा है. इनसे अलग एक कविता "नई रोशनी" भी है, जो पहले सबद पर प्रकाशित हो चुकी है, उसे यहाँ नहीं दिया जा रहा है.] 



गोया - कोलोसस



असह्य

दुनिया भर की तमाम प्यारी औरतो और आदमियो और बच्चो
मेरे अपने लोगो
सारे संगीतो महान कलाओ विज्ञानो
बड़ी चीज़ें सोच कह रच रहे समस्त सर्जको
अब तक के सारे संघर्षो जय-पराजयो
प्यारे प्राणियो चरिन्दो परिंदो
ओ प्रकृति
सूर्य चन्द्र नक्षत्रों सहित पूरे ब्रह्माण्ड
हे समय हे युग हे काल
अन्याय से लड़ते शर्मिंदा करते हुए निर्भय ( मुझे कहने दो ) साथियो
तुम सब ने मेरे जी को बहुत भर दिया है भाई
अब यह पारावार मुझसे बर्दाश्त नहीं होता
मुझे क्षमा करो
लेकिन आख़िर क्या मैं थोड़े से चैन किंचित् शान्ति का भी हक़दार नहीं

तभी

सृष्टि के सारे प्राणियों का
अब तक का सारा दुःख
कितना होता होगा यह मैं
अपने वास्तविक और काल्पनिक दुखों से
थोड़ा-बहुत जानता लगता हूँ

और उन पर हुआ सारा अन्याय?
उसका निहायत नाकाफ़ी पैमाना
वे अन्याय हैं जो
मुझे लगता है मेरे साथ हुए
या कहा जाता है मैंने किए

कितने करोड़ों गुना वे दुःख और अन्याय
हर पल बढ़ते ही हुए
उन्हें महसूस करने का भरम
और ख़ुशफ़हमी पाले हुए
यह मस्तिष्क
आख़िर कितना ज़िन्दा रहता है

कोशिश करता हूँ कि
अंत तक उन्हें भूल न पाऊँ
मेरे बाद उन्हें महसूस करने का
गुमान करनेवाला एक कम तो हो जाएगा
फिर भी वे मिटेंगे नहीं
इसीलिए अपने से कहता हूँ
तब तक भी कुछ करता तो रह

संकल्प

सूअरों के सामने उसने बिखेरा सोना
गर्दभों के आगे परोसे पुरोडाश सहित छप्पन व्यंजन
चटाया श्वानों को हविष्य का दोना
कौओं उलूकों को वह अपूप देता था अपनी हथेली पर
उसने मधुपर्क-चषक भर-भर कर
किया शवभक्षियों का रसरंजन

सभी बहरूपिये थे सो उसने भी वही किया तय
जन्मान्धों के समक्ष करता वह मूक अभिनय
बधिरों की सभा में वह प्रायः गाता विभास
पंगुओं के सम्मुख बहुत नाचा वह सविनय
किए जिह्वाहीन विकलमस्तिष्कों को संकेत-भाषा सिखाने के प्रयास
केंचुओं से करवाया उसने सूर्य-नमस्कार का अभ्यास
वृहन्नलाओं में बाँटा शुद्ध शिलाजीत ला-लाकर 
रोया वह जन-अरण्यों में जाकर

स्वयं को देखा जब भी उसने किए ऐसे जतन
उसे ही मुँह चिढ़ाता था उसका दर्पन
अन्दर झाँकने के लिए तब उसने झुका ली गर्दन
वहाँ कृतसंकल्प खड़े थे कुछ व्यग्र निर्मम जन

उसाँस

कभी कभी
जब उसे मालूम नहीं रहता कि
कोई उसे सुन रहा है
तो वह हौले से उसाँस में सिर्फ
हे भगवन हे भगवन कहती है

वह नास्तिक नहीं लेकिन
तब वह ईश्वर को नहीं पुकार रही होती
उसके उस कहने में कोई शिकवा नहीं होता

ज़िन्दगी भर उसके साथ जो हुआ
उसने जो सहा
ये दुहराए गए शब्द फ़क़त उसका खुलासा हैं

पर्याप्त

जिस तरह उम्मीद से ज्यादा मिल जाने के बाद
माँगनेवाले को चिंता नहीं रहती
कि वह कहाँ खाएगा या कब
या उसे भूख लगी भी है या नहीं
वही आलम उसका है
काफ़ी दे दिया जा चुका है उसके कटोरे में
कहीं भी कभी भी बैठकर खा लेगा जितना मन होगा
जल्दी क्या है
बच जाएगा या खाया नहीं जाएगा
तो दूसरे तो हैं
और नहीं तो वही प्राणी
जो दूर बैठे उम्मीद से देख रहे हैं

और नाज़ मैं किस पर करूँ
(भगवत रावत और चंदकांत देवताले को)

बुजुर्गों के नाम पूछने का चलन अब जाता रहा

पहले कहीं भी जाओ
टिक्कू के यहाँ कटिंग कटाने
गफूर टेलर के पास कमीज़ सिलवाने
मोतीलाल सेठ की दूकान पर सौदा लेने
जमना की चक्की पर आटा पिसवाने
राशन से गेहूं-चावल लेने
नाजिम के टाल पर लकड़ी-फर्रे तुलवाने
गुप्ता या वर्मा बुक डिपो से कोई किताब-कापी खरीदने
बाबूलाल पेंटर की पान की गुमटी के सामने
सिवनी पिपरिया नागपुर की किसी गाड़ी में बैठने
या यूं ही किसी दोस्त के यहाँ भी
तो बस्ती का कोई न कोई ऐसा आदमी मिल जाता था
जो पूछ ही लेता था किसके लड़के हो

तुम उस अटपटाहट से पिता का नाम बतलाते थे
जो उनका नाम लेते या लिखते वक़्त अब तक नहीं गयी है

फिर वह कहता अच्छा तो सुन्दर के बेटे हो
और खेल स्कूल या कालेज में उनकी बड़ाई करता पूछता
अपने बाप पर गए हो या नहीं
क्लास में कौन सा नंबर आते हो
सुन्दर तो हाइस्कूल तक कभी सेकण्ड नहीं आया

अजीब लगता कि तुम्हारे पिता कभी छोटे भी थे
और स्कूल जाते थे और खेलते भी थे
और कुछ लोग ऐसे भी हैं जो उनके बारे में
सुन्दर ऐसा था सुन्दर यह करता था वह करता था
सरीखे लहजे में बात कर सकते हैं
फिर उनके पैर छूना पड़ता था
और वे और आशीर्वाद देते थे
लेकिन कहते थे
अब तुम्हारा बाप किसी से मेल-जोल क्यों नहीं रखता बेटे

तुम्हें यह बहुत अच्छा भी लगता था
तब तक माँ नहीं रहीं थीं
सो तुम अपनी बुआओं से बतलाते थे
और वे उदास कुंआरे गर्व से भरी एक सुदूर मुस्कान के साथ
अपने भाई तुम्हारे पिता के अतीत में खो जातीं
एकाध और अनजानी बात बतलाती हुईं

कभी कोई बुज़ुर्ग पकड़ लेते तो इसी खानदानी जिरह के बाद
देर तक देखते रहते और कहते
अच्छा तो मुरलीधर नाज़िर के पोते हो
अरे वाह अरे वाह
तुमने तो नहीं देखा होगा बेटे अपने आजा को
सारा शहर अब भी याद करता है उनको

रमेश सुरेश सुरेन्द्र निर्मल संतोष प्रमोद प्रेमकुमार हरिशंकर इंद्रवीर बरकत विष्णु
शेख नूर अशफाक हुसैन शेख इसहाक़ फ्रांसिस अलेक्सेंडर
यह सिर्फ हमारे आपसी नाम थे
वरना तो दरअसल हम किसी के बेटे थे या नाती थे या पोते थे
जो महज़ अपने शज़रे से जाने जाते थे
कम से कम तीन पीढ़ियों के नाम याद रखना फख्र की बात समझी जाती थी
फिर दूसरे असली और मुँहबोले रिश्तों की एक अलग फेहरिस्त थी
बीस हज़ार की आबादी में हर कोई हर किसी का कुछ न कुछ लगता था
कस्बा कहाँ था वह कुटुंब था

बरसों तक पिता या आजा को जाननेवाले
कभी न कभी मिलते रहे
पिपरिया जबलपुर बैतूल खंडवा इंदौर रायगढ़ अंबिकापुर में
एकाध तो दिल्ली तक में

आज किसी भी बच्चे किशोर युवक से उसके पिता या आजा का नाम पूछते डरता हूँ
अव्वल तो इसलिए कि मुझमें अब तक बैठा हुआ है वह लड़का
जो कभी अपने पिता या आजा के नाम के लायक हो नहीं पाया
जबकि उनके इस्म भी अब कितने अजीब लगते हैं
दूसरे न जाने अपरिचित नौउम्र वह क्या सोचे या क्या सुनने को मिले उससे
कई वजहों से अब वल्दियत बताई नहीं जाती
आज फख्र कुछ और बातों पर किया जाता है
किसके पास कितना है कौन किस-किस को जानता है
किस-किस तक पहुँच है किस की
सब यही दरियाफ़्त करते हैं अब
और पलटकर कहीं उसने मुझसे कुछ पूछ लिया
तो बताने को मेरे पास वैसा कुछ भी नहीं है

इत्तिफ़ाक़न

मूलतः दिया इसलिए जलता होगा
कि अपनी रोशनी में –
वह निष्कंप लौ हो या ज़र्द या आख़िरी भभक –
खुद कमोबेश अपना आसपास देख सके

यह कि उसके वैसे उजाले में
दूसरे भी देख सकते होंगे
इसमें शायद उसकी दिलचस्पी न रहती हो

यही क्या कम है
कि वह जान भी जाए
कि उसके उतने नूर का
लोग भी थोड़ा-बहुत इस्तेमाल कर लेते होंगे
तो भी तेज़तर जल कर
वह खुद को बुझा नहीं सकता –
अपने को फूँकने की भी एक गति होती है

और यूँ भी एक चिराग़ का उजाला आख़िर टिकता ही कितना है
और जाता भी होगा तो भला कितनी दूर

सरोज-स्मृति

वे मिले संयोग से उस सँकरी अदृश्य-सी गली के बीच
जो अब भी पाटनी सिनेमा तिराहे को जोड़ती है
छोटे राममंदिर वाले बुधवारी के ढलान से

किशोरी वह वही काम कर रही थी
जो उसकी माँ देउकी और बाप लक्खू गोंड करते थे
सिर या काँवड़ पर मीठे कुओं से
घरों में पीने का पानी भरने का

कनकछरी जैसी अब वह
उसका चेहरा और गर्दन कँपते थे हल्के-हल्के
चुम्हरी पर रखी भरी गगरी के छलकने से
किसी नर्तकी या गुड़िया सरीखे
हाँ में या ना में समझना मुश्किल था

पहचान लेने पर जो कुछ भी आँखों में आ जाता है
उससे उसने पूछा
कहाँ चला गया तू

पिपरिया और बैतूल तो वह जानती थी
खंडवा उसके लिए नया था
बहुत दूर होगा
इतना तो नहीं मगर आमला से दूसरी गाड़ी लेनी पड़ती है

तो तू नौकरी नहीं करता कालेज जाता है
हम तो अब धोबियों के मोहल्ले में चले गए
हौले से हाँफते हुए उसने बताया

कभी ये लोग उसके यहाँ पांच रुपए किराए से रहते थे
और वह पढ़ाने के बहाने उसे सरोता कहकर चिढ़ाता था

सिर पर कँसेड़ी रखे
जो हर बोल पर उसके माथे आँखों और पोलके तक छलक आती थी
उसे और उस लड़के को
अब चौराहे के नुक्कड़ों के पानवालों
और बनारसी होटल के गाहक
कुछ अजीब निगाहों से देखने लगे थे
कब तक इस तरह दोपहर बारह बजे बजार के पास बात करते

उसके मन में आया
कि चुम्हरी समेत उसकी गागर अपने सिर पर रख ले
और उसके साथ बरौआ बन कर उस घर तक चला जाए
जहां उसे यह पानी भरना था
लेकिन उससे तमाशा खड़ा हो जाता

आना उसने कहा था बऊ दद्दा अब भी तेरे को याद करते हैं
हाँ के सिवा वह और क्या जवाब देता

अपने पुराने घर की तरफ
जिसमें अब कोई नहीं रहता था
और जिस पर किसी और का ताला लगा रहता था
कुछ क़दम बढ़ा कर वह पलटा

दूसरे छोर पर वह भी थम गयी थी
उसे अपना सारा बदन घुमाना पड़ा था पीछे देखने के लिए
उसका मूरत-सरीखा चेहरा दुगना दमकता था कड़ी धूप में
दिवा का तमतमाता रूप
उसकी मुस्कान की चमक और ललाई उतनी दूर से भी झलकीं

दोनों को जाना ही था अपनी अपनी दिशा में

दुबारा वे कभी नहीं मिले

फिर भी इन पछ्पन बरसों में
वह अब भी वहाँ न खड़ी है न ओझल होती है
उसका गगरीवाला ललाट धीरे-धीरे हिलता जैसे चिढ़ाता बरजता या हाँ कहता हुआ
वह भी वहीं ठिठका हुआ है अब भी उसे देख सकता हुआ
जबकि उसका वह पुराना घर बुलाता रहा है
एक बार फिर सामने से गुज़र जाने को


सर्पसत्र

जिस परम्परा में
एक महादेवता के कंठ पर लिपटा रहता हो विषधर
और दूसरे की शय्या ही हो एक महानाग
जिसके फण पर टिकी रहती हो धरित्री
जिसमें पूजे जाते हों सर्प
उन्हें दुग्धानुपान करवाया जाता हो
वहां कोई अकारण क्यों शत्रुता करेगा भुजंगों से

हाँ यदि कोई कद्रू
अपनी भगिनी-सपत्नी को ही दासी बनाए रखने
और मानवता को हलाहल से आतंकित और निष्प्राण करने के लिए
सहस्रों नाग-पुत्रों को जन्म दे उन्हें प्रेरित प्रशिक्षित करे
तो वह चुनौती खड़ी होगी
जो विनतानंदन गरुड़ के समक्ष प्रस्तुत हुई थी

अपनी ही सौत-बहन की बाँदी थी विनता
तब भी अपने कुत्सित पुत्रों की सहायता से
कद्रू ने उसे और धोखा देना चाहा

नाग न केवल डस रहे थे अन्य प्राणियों को
अपितु स्वर्ग से अमृत पीकर अमर होना चाहते थे
किन्तु पक्षिराज ने पराभव किया स्वर्ग में ही देवेन्द्र का
फिर नष्ट किया नागवंश को
और अपनी माता और मानवता को
पन्नगों के भय और दास्य से मुक्त किया

सुदीर्घ और जटिल होते हैं ऐसे आख्यान
सारांश यह कि उसके पश्चात्
जनमेजय का सर्पयज्ञ भी निर्विघ्न संपन्न हुआ
अग्नि में गिरते गए हर प्रकार के उरग
वातावरण में व्याप्त हुए उनके चीत्कार और चिरायंध

महाभाग वैनतेय के नभचर वंशज
बने तब से अहिकुल के शाश्वत शत्रु
अज्ञात है कि उनमें कब और कैसे आ जुड़े
नकुल जैसे थलचर प्राणी भी
जिन्हें अब फणिधरों की किंवदन्तियों से भय नहीं लगता
कभी-कभी वे करालतम महानागों को
अपना आखेट बना लेते हैं
मुक्ति के किसी अभियान में उन्हें अपने नखों में जकड़ कर
आकाश या धरती के किन्हीं अदृष्ट ठिकानों से
उनपर छापा मारते हुए झपटते हुए

इसीलिए नाग बचते भागते रहे हैं खगेन्द्र के उत्तराधिकारियों से
मार्ग देते रहे हैं भूमिगत नकुलों
और अन्य सर्पाहारियों को
जब तक कोई आत्महंता प्रलोभन या विवशता ही न आन पड़े
कि अनचाहे उन्हें करना पड़े कोई अभिशप्त आक्रमण
अन्यथा सदा से जानते आए हैं वे
कि गरुड़ के वंशजों और सुह्रदों पर
असंभव है विषधरों की विजय

बजाए-ग़ज़ल
(शमशेर से मुतास्सिर एक ज़ाती हिमाक़त)

जो न झेले हरेक वार सीने पर
हज़ार लानतें हों ऐसे जीने पर

दिले-मजलूम को रफू न कर पाए
वो क्या फख्र करे अपने ज़ख्म सीने पर


नहाती मजदूरने पखारें एड़ियाँ जिससे
वो ठीकरा भारी है हर नगीने पर

हर कोई निराला हो नहीं जाता
लाख कड़ी मारें पड़ें सीने पर

ताउम्र पोंछती रही है अपने पल्लू से
तमाम शाइरी कुर्बान उस पसीने पर

कहीं मुझसे उनका बदन न छिल जाए
दीवार से सट के वो यूँ चढ़ते हैं जीने पर

हमें गाड़ी बदलनी थी बीना में
चढ़ी हुई थी उतर पड़े बबीने पर

निकलने हैं जिससे झूठे बुतो-फतवे
क्यों हो ग़ारत उस खूनी दफीने पर

नाख़ुदाओ बाज़ आओ तकरारो-बग़ावत से
टूटा चाहते हैं बर्को-तूफाँ इस सफीने पर


जो भूखों-बेघरों से उनके हक छीने
कभी रहम न हो उस निज़ामे-कमीने पर

बदन से उसके गमकता है जो अब तक
मैं रहा मस्त उसी इत्र भीने-भीने पर

कहीं से किसी मुआवजे की उमीद नहीं
ढूँढता हूँ नया पठान हर महीने पर


ताबीर

इसके आगे कुछ और नहीं कहना चाहूँगा

बस यह तसव्वुर किया था
कि पता नहीं क्यूँकर हम साथ बैठ सके हैं किसी जगह
जो मेरे लिए पुरआसाइश है
और हैरत यह कि दूर तक कोई और नहीं था

मैंने अनधिकार उसका हाथ अपने हाथ में ले लिया होगा
वह उसे छुड़ा नहीं रही थी यही क्या कम था
हम कुछ बोल भी नहीं रहे होंगे
मुझमें एक जगमगाता नक्षत्र रख देने के लिए
मैं उसका कितना एहसानमंद रहूँगा क्या बताता उसे
मेरे मन में जो रहा होगा उससे मैं रुंध चुका हूँ
जो मेरी आँखों में थे काश वे फ़क़त आँसू होते

किस बिलकुल सही लम्हे पर वह हौले से हाथ अलग कर
फिर वह कब लौट गयी
उस अपने दावेदार अविभक्त महापरिवार में
जहां उसकी कितनी दरकार और प्रतीक्षा रहती होगी
कोई जान नहीं पाएगा

लगता है मैं वहाँ देर तक वैसा ही बैठा रहा फिर चला भी आया
लेकिन वह मौजूद रही थी लिहाज़ा उधर अँधेरा न हुआ

पीछे मुड़ सकता तो पाता
किसी विग्रह की तरह वह अब भी वहीं सस्मित दिखती होगी
बड़ी आँखों में सरस करुणा सख्य संकल्प लिए
सिर्फ मेरे लिए ही नहीं
मुझसे कहीं परे देखती हुई


*****

8 टिप्पणियाँ:

कुमार अम्‍बुज ने कहा…

निश्‍चय ही इन कविताओं को पढ़ना एक अलग, विलक्षण अनुभव है जो इधर दुर्लभ है। अब इस बात को भी कहना दोहराव है: विष्‍णु जी हमारे समय के अद्वितीय रचनाकार हैं। लेकिन यह दोहराव हमारे लिए भी जरूरी है। 'कल के लिए' नहीं देख सका इसलिए आपने इन्‍हें यहॉं देकर मेरे जैसे पाठकों के लिए अच्‍छा किया है। धन्‍यवाद।

शिरीष कुमार मौर्य ने कहा…

सिद्धान्‍त

सिर झुका है हमेशा इन कविताओं और कवि के आगे....

abhilash ने कहा…

इसे अतिरेक मत समझियेगा लेकिन इन्हें पढ़ने के बाद मैं बस पागलों की तरह सोचता ही रह गया, क्या ऐसा भी लिखा जा सकता है? और सच में यह कविताएँ ऐसे ही वक्त में हमसे रूबरू होती हैं, जब हिन्दी में दुहराव की संभावनाएं लगातार बढ़ती ही जा रही हैं.
विष्णु जी को पढ़ना यानी हमेशा ही कुछ न कुछ नया सीखना है.

मंगलकामनाएँ

Pooja Pathak ने कहा…

Dhanywaad siddhant ji in kavitaaon ko yahan dene ke liye. aabhaari rhoongi.

Pooja Pathak,
Lucknow

baramasa ने कहा…

विष्णु खरे की इनमें से बेशतर कविताएँ लगता है अरसा दराज़ से दबी पड़ी थीं अपनी बारी के इंतज़ार में... और इनसे वाबस्ता मनुष्य भी। यकायक सामने आकर हैरान करती हैं और आपके वुजूद के ख़ाली गोशों को रिकवरी की ख्‍वाहिश से पुर कर देती हैं।

असद ज़ैदी

anil yadav ने कहा…

हे भगवन, हे विष्णु... हे भगवन हे विष्णु

Ashok Pande ने कहा…

संग्रहणीय पोस्ट. जानदार कवितायेँ. विष्णु जी की ये कवितायेँ जैसा कि असद जी ने कहा सचमुच हैरान कर देती हैं.

hemant shesh ने कहा…

विष्णु खरे अपनी इन कविताओं में भी वैसे ही मौलिक और आनंददायी हैं जैसे वह खुद हैं- एक कवि, आलोचक, पत्रकार, और मित्र के बतौर ! हमारे समय के सशक्त रचनाकार को अपने पन्ने पर ले आने की प्रसन्नता में आपका ब्लॉग अब देखता रहूँगा....