शुक्रवार, 7 सितंबर 2012

मार्टिन एस्पादा की कविता


[मार्टिन एस्पादा प्यूर्टो रीको मूल के अमरीकी कवि हैं. राजनीति से गहरे तौर पर जुड़े एस्पादा अभी मैसाचुसेट विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर हैं. उनकी कविताओं और उनके जीवन में उत्पीड़न के खिलाफ़, साम्राज्यवाद के खिलाफ़, वहशियाना ताक़तों के खिलाफ़ का स्वर पूरे वजूद में मिलता है. यहाँ जो कविता है, वह मुमिया अबू जमाल के लिए है. मुमिया अबू जमाल के बारे में तो लगभग सभी जानते हैं, जो नहीं जानते हैं उनके लिए मुमिया अबू जमाल एक एफ्रो-अमरीकन पत्रकार हैं, काली चमड़ी का पत्रकार. जिन्हें एक पुलिस अधिकारी डैनियल फॉकनर की हत्या के आरोप(जो अभी तक साबित भी नहीं है, और शायद हो भी न) में मृत्युदंड दिया गया, पूरे मामले की सुनवाई में किसी तरह की पारदर्शिता नहीं बरती गई. लेकिन अंतर्राष्ट्रीय दबाव के चलते, मुमिया को अभी तक फांसी नहीं दी जा सकी है. मुमिया के बारे में बाक़ायदा यहाँ पढ़ा जा सकता है. इस कविता और इसके अनुवाद के लिए बुद्धू-बक्सा भारतभूषण तिवारी का शुक्रगुजार है. ये एक संघर्ष की कविता है, ये हताशा का गीत भी है और व्यवस्था के नंगे नाच की नुमाईश भी है. ये कहती है कि फिलाडेल्फिया के समूचे ईकोसिस्टम तक को पता था कि क्या हुआ? सभी को ये पता था कि फॉकनर के शरीर से मिलने वाली गोली .४४ कैलीबर की थी, जबकि मुमिया के पास से मिली पिस्तौल .३८ कैलीबर की थी और सभी को ये पता था कि सच की लड़ाई लड़ रहा पत्रकार इतना घातक हो सकता है कि उसे फाँसी दे दी जानी चाहिए.]


एक और बेनाम वेश्या कहती है कि वह शख्श बेगुनाह है                        
मुमिया अबू जमाल के लिए, फ़िलाडेल्फ़िया, पेन्सिल्वेनिया/ कैमडन, न्यू जर्सी, अप्रैल १९९७


परदे लगी हुईं खिडकियों को था पता कि क्या हुआ;
भूतों से ग्रस्त अपनी नींदों में कराहते,  फ़िलाडेल्फ़िया के
फुटपाथों पर सोने वालों को था पता, कि क्या हुआ;
सोंटे की मार से भौंह के पास बने ज़ख्म से धन्य हुए 
हर काले आदमी को पता था क्या हुआ;
एक सदी पहले मर चुके कवि, पुल की दूसरी तरफ बनी
अपनी कब्र से चौकसी रखने वाले
वॉल्ट व्हिटमन तक को था पता कि क्या हुआ

पंद्रह से भी ज़्यादा बरस पहले,
पुलिसिया गाड़ी की हेडलाइटों की मोतियाबिंदी टकटकी
बन्दूक की गोली का असंभव कोण,
खून की छोटी नदियाँ और तालाब,
अधिकारी फॉकनर मृत, संशयित मुमिया ने छाती पर गोली चलाई.
वे बेनाम गवाह जिन्होंने बंदूकधारी को भागते देखा था, उसका दिल और कदम
दोनों धड़धड़ाते.

बेनाम वेश्याओं को पता है,
सड़क किनारे उकडूँ बैठीं, ठण्ड से जम गए नंगे पैर उनके.
धुँधली पड़ती चोटों की लाली से सजे, उनके चेहरों ने कनखियों से देखा उस रात.
अब चेहरे धुँधले पड़ते जाते हैं
शायद कोई चश्मदीद गवाह सड़ती है ज़मीन के बिस्तरे में खुली आँखों से,
या तिरती है अपने नशे के उष्ण प्रवाह में,
या पुलिस की विषदंती फुफकारों से बचने
जा छुपती है वाल्ट व्हिटमन की कब्र में
जहाँ ग्रैनाइट का दरवाज़ा खुला है
और सुस्ता सकते हैं भगोड़े दास.

मुमिया: पैंथर टोपी; सोचती जटाएँ,
असहमत शब्द जो टूट पड़ते माइक पर मधुमक्खियों के झुण्ड की मानिंद,
अफ्रीका नामक लोगों के साथ खाना खाते,
उनके काले शरीरों को झुलसा डालने वाली पुलिसिया बमबारी
के बाद भी उनके नामों को गाकर बुलाते हुए
तो गवर्नर ने कर दिए मौत के फ़रमान पर दस्तख़त.
जल्लाद की सुई मुमिया के लिखने वाले हाथ के
भीतर पहुँचा देगी ज़हर
ताकि उँगलियाँ मुड़ जाएँ जले हुए मकड़े की मानिंद;
सवाल पूछने वाला शांत सा उसका मुँह पड़ जाएगा सुन्न
और उसकी याद में, हर तरफ रेडियो बड़बड़ाते हैं ख़ामोश हो जाने को.

पर्दानशीं वेश्याएँ अब जा चुकी हैं,
नगरवधुओं की अलग-थलग अटरिया में
मगर अख़बार में ख़बर है कि एक और बेनाम वेश्या कहती है
कि मुमिया बेगुनाह है, कि अगली सुनवाई पर वह गवाही देगी.
अदालत से परे, बहुतेरे गवाह गुनगुनाते है, दुआ करते हैं,
चाहते हैं उनकी चीखों से क़ैदखाना ढह जाए, अंधड़ में फँसी एक झोंपड़ी की तरह.

मुमिया, आखिरी बेनाम वेश्या अगर
भाप की खुलती हुई पगड़ी बन जाए
हाकिमों के लबादे गर बन जाएँ
ऑक्टोपस के छलावे की तरह तरह चक्कर खाते
स्याही के बादल
कफ़न गर बन जाए तुम्हारी रजाई,
ऑटोप्सी के दौरान गर काट दी जाएँ तुम्हारी जटाएँ
तो बर्बाद आरसीए फैक्टरी के ऊपर
बह चलो
जो कभी रेडियो को जन्म देती थी
फिर बहो वॉल्ट व्हिटमन की कब्र की ओर
जहाँ ग्रैनाइट का है दरवाज़ा
सुस्ता सकते हैं जहाँ भगोड़े दास.

*****

1 टिप्पणियाँ:

anil yadav ने कहा…

कान्हा के सानिध्यकारों की छीछालेदरी अदाएं और इस कवि का कमिटमेन्ट...बहुत दूरी है और ब्रह्मांड निरंतर फैल रहा है।