शुक्रवार, 20 जुलाई 2012

प्रभात की कुछ कविताएँ

[प्रभात का बुद्धू-बक्सा पर स्वागत. कविता समय के युवा-सम्मान से सम्मानित. प्रभात की कविताओं में भाषा का झमेला नहीं है, उनमें राजनैतिक अर्थों का जंजाल-सा भी नहीं है. ये क्षेत्र की भाषा है, आम आदमी की आवाज़ से प्रभात की कविताओं की पहचान है. झाड़ू जैसा मामूली और छिटपुट यंत्र अपने अनुप्रयोगों में कितना विराट हो सकता है, ये प्रभात की कविताओं का बिम्ब है. ये प्रकृति के सभी अवयवों की झाड़ुओं का चिंतन हैं, उनके तमाम संभव पहलुओं का एकाकी अध्ययन है जैसे चाँद की झाड़ू का चाकू-सा हो जाना. प्रभात की कविताओं का हमारे साथ होना, युवा कविता की समृद्धि की निशानी है. बुद्धू-बक्सा प्रभात का आभारी.]



झाड़ू: कुछ कविताएँ

धूप की झाड़ू
हवा की झाड़ू
बारिश की झाड़ू
पृथ्वी के पास है कितने रंगों की झाड़ू

एक विशाल फूल की पंखुंडि़यों की तरह
खुलती है दुनिया रोज सवेरे
फिर से शुरू होती है पृथ्वी पर नयी हलचल

कुछ लोग मगर रहते हैं विकल
बारिश में भी नहीं हटती उनके चेहरों की धूल
हवा नहीं ले जाती उनके फेंफड़ों में भर गए कचरे को बुहार कर
उनके अँधेरों को बुहारने नहीं आती कभी
गुलाबी किरनों की सींक की झाड़ू



जहाँ-जहाँ गया इंसान
वहाँ-वहाँ गई झाड़ू
इंसान को अकेला
और असहाय न पड़ने देने के लिए

कल ही गृहस्थ जीवन से छूटकर आये इस व्यक्ति ने
जो कि अब साधु हो गया है
जिसकी संगिनी मुँह ढाँककर विलाप करती है वहाँ
रात के आँगन में बैठी
गंगा जी के घाट पै सायब साधु होगो हो राम
लिख-लिख चिठिया दे रही बीरा बेगो सो आज्यौ हो राम

रातभर विचार किया साधु ने
असार संसार से छुटकारा पाया अब मैंने

जागा तो भोर में अपना आसपास बुहार लेने की
बेकाबू इच्छा जागी मन में
कुछ पल बाद पाया कि
एक हाथ में झाड़ू है
और मन में झाड़ू लगाने की तैयारी
और इससे उसे राहत मिली गहरी

एक-एक पल भारी है
इस क्रूर अकेलेपन में

  

उन्हें गाँव छोड़कर जाना पड़ा
वे चले गए घर को छोड़कर खुला

वे चले गए मुझे पड़ा छोड़कर कोने में
या यह कि मुर्गी की तरह कुट-कुट करती
मैं नहीं चल सकती थी उनके पीछे-पीछे

नहीं जा सकती थी तो नहीं जा सकती थी
उनकी झाड़ू उनके साथ
जैसे नहीं जा सकती थी उनके साथ उनकी जमीन



रात के अँधेरे में डूब गए हैं पृथ्वी और आकाश
ऐसे कायम है अँधेरा जैसे शैतान का विश्वास
फिर एक रात चाकू-सी दिखती है आकाश में
चाँद की झाड़ू



बारिशों की घास के विशाल मैदान में
उस गड़रिए को टोकते हुए
उस बच्चे ने कैसे कहा

उसने ऐसे कहा कि
घास चरे वहाँ तक तो ठीक है
लेकिन घास के इन
झाड़ू सरीखे सारे के सारे सफेद फूलों को
कहीं चर न जाए हमारा मेमना

क्योंकि फूलों से ही तो बीज झड़ेंगे
बीजों से घासें उगेंगी
घासों पर हिलेंगे-डुलेंगे हवा में
झाड़ू के फूल.


*****

4 टिप्पणियाँ:

अपर्णा मनोज ने कहा…

shandar prastuti..buddhu baxe ki post hamesha vishisht rahti hai..

Premchand Gandhi ने कहा…

वाह प्रभात... झाड़ू के इतने व्‍यापक संदर्भ और आयाम पैदा किये हैं कि सुबह सुबह मन बिल्‍कुल साफ हो गया... बधाई मेरे भाई।

बेनामी ने कहा…

aatmiya ssidhant,
aap ke yahan apne priya yuva lekhakon kii nayi rachnayein parhna hawa ke taaze jhonke-sa hai. : aap lagataar utkrisht kaam karte rahein, yahi prarthna hai.
ek kritgya paathak
piyush daiya

Vijay Kumar Sappatti ने कहा…

हर कविता , हा शब्द दिल को छूता हुआ ...मन में बसता हुआ भी और मन से कहता हुआ भी .