गुरुवार, 21 जून 2012

महेश वर्मा की नई कविताएँ

ये हैं महेश वर्मा की कुछ नई कविताएँ. बुद्धू-बक्सा पर पहले भी एक दफ़ा महेश यहाँ प्रकाशित. महेश वर्मा की कविताओं पर क्षेत्रीय प्रभाव गहरे रचते-बसते हैं. कविताओं का साफ़ शिल्प और अविरल व्यवहार महेश की सबसे बड़ी शक्ति है. अधूरे मसलों से उपजी कविताएँ हैं ये, जिनके लिए हम शुक्रगुज़ार हैं.

शागल - आई एंड द विलेज

क्या थी 

वह इतनी सरल बात थी कहने में
कि मुझे भाषा की शर्म थी उसे लिखने में
वह पानी थी अपनी सरलता में
और हवा थी अपनी पुकार में, साफदिली में
इसके रेशे सुलझे हुए थे
होने के कारण भी साफ़ थे

अगर दुःख थी यह बात तो
यह संसार के सबसे सरल आदमी का दुःख था
यह भूख थी अगर तो उन लोगों की थी
जो मिट्टी के बिस्कुट गढ़कर दे रहे थे अपने बच्चों को
जो बीच बीच में देख लेते थे आकाश

अगर यह हत्या थी
तो यह एक आदिवासी की ह्त्या थी.


नीला छाता 

कल सपने में आकर मेरा एक मृत दोस्त मुझे वैकल्पिक आकाश की आवश्यकता समझाता रहा. उसने कपड़ों की अनिवार्य जगहों पर पत्ते बाँध रखे थे और शायद आदम की तरह दिखना चाहता था. मेरे घर में बाइबिल थी बचपन में ; मैं यह कहना चाहता था सपने में और इसमें गला रूंधने जैसी कोई बात भी नहीं थी तो भी मैंने नोट किया है कि सपने में मेरा गला अक्सर रुंधा ही रहता है.

सपने में तो मैं दोस्त की लगभग नग्नता के रूपक ही में मारा गया लेकिन वैकल्पिक आकाश का उसका यह विचार अब भी मेरे पास है. पता नहीं क्यों मैं यह मानना ही नहीं चाहता कि इसे धूल , रौशनी और उदासी के बिना नहीं बनाया जा सकता. इसके बारे में सोचते हुए अधिक से अधिक मैं एक बड़े से नीले छाते के बनने में लगने वाले सामानों के  बारे में सोच पा रहा हूँ.


बोलो 

हम उससे कम चुप्पी वास्तव में अपने लिए चाहते है जितने की इच्छा करते हम दिखाई देते हैं. कोलाहल हमें मृत्यु के विचार से दूर रखता है. सच तो ये है कि चुप्पी को न वस्तुओं की ज़रूरत होती है न जंतुओं की. लंबा एकांत पहले हमारे सपनों पर अन्धकार की तरह उतर आता है फिर हमें मदद करता है कि हम अपना चेहरा याद रखने की ज़रूरत ही न समझें .
कई बार बेज़रूरत भी कुछ बोल पड़ना चाहिए, भले ही इससे हमारी छवि थोड़ी बिगड़ती हो.


हंसी 

फूलों को सबसे अधिक अभिमान अपनी आकृति में आने वाली आवृत्तियों को लेकर है . हमारी आम समझ के विरुद्ध अपनी गंध को तो वे बंधन समझते हैं और अपने अपमान का स्थायी कारण भी . मनुष्य देह की अनगढ़ता और आवृत्तिहीनता फूलों के हास्यबोध और दर्प को ज़िंदा रखती आई है. पुराने कवियों की यह बात बेशक सही है कि मनुष्यों को देखकर फूल हंस पड़ते हैं , लेकिन उसके कारण दूसरे हैं. 

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7 टिप्पणियाँ:

neelotpal ने कहा…

* मुझे भाषा की शर्म थी उसे लिखने में *लंबा एकांत पहले हमारे सपनों पर अन्धकार की तरह उतर आता है *सपने में तो मैं दोस्त की लगभग नग्नता के रूपक ही में मारा गया. बेहतर पंक्तियां. उम्दा कविताएँ

मुकेश पाण्डेय चन्दन ने कहा…

सुन्दर अभिव्यक्ति ........नये भावो के साथ

kumar anupam ने कहा…

besq Siddhant, Yh Kavitaein Apni Srlta Aur Sahajta Ka Jatil Shastr Rchti Hai. Inmein Aai sthitiyan Bahut Vichlit Krti Hain. Mahesh Bhai Yuva Kaviyon Mein Khas Hain, Apni Aam Upasthiti ko Srlta Se Mahattvpurn Siddh Krte Huye. Bahut Badhi.

शिरीष कुमार मौर्य ने कहा…

प‍हली ही कविता में बंधा रह गया। अद्भुत....सिद्धान्‍त क्‍या कविता लगाई है भाई।

अभय तिवारी ने कहा…

मैंने महेश वर्मा की जितनी भी कविताएं पढ़ी हैं.. हमेशा अच्छी लगी हैं.. उनकी कविता की ख़ास बात ये है कि वे जटिल भावों को सरल शब्दों और सरल सरंचना में बयान करती हैं.. महेश वर्मा को बहुत शुभकामनाएं!

मनोज कुमार झा ने कहा…

सुन्दर और अलग स्वाद की कविताएँ.

Vijay Kumar Sappatti ने कहा…

एक अच्छा ब्लॉग , जिससे बहुत कुछ सीखा तो जा ही सकता है .. आभार आपका . हमारे समय के कवि और लेखकों के बारे में बताने के लिये .

आज आपके ब्लॉग में आकर बहुत सुख मिला , दुःख तो इस बात का है कि , मैंने पहले क्यों नहीं आ पाया .
अब आते रहूँगा .