मंगलवार, 8 सितंबर 2015

प्रो. वीरभद्र मिश्र बरास्ते व्योमेश शुक्ल



कहीं साफ़ नदी-जल चाहिए   
(प्रसिद्ध पर्यावरणविद प्रो़फेसर वीरभद्र मिश्र के साथ व्योमेश शुक्ल की बातचीत के आधार पर तैयार लेख)



लाखों-करोड़ों लोगों के लिए गंगा जी का सर्वोत्तम इस्तेमाल भक्त कवि तुलसीदास की इस पंक्ति की राह पर चलकर संभव हुआ है :

‘‘दरस परस मज्जन अरु पाना। हरइ पाप कह वेद पुराना।।’’

हमारी सभ्यता में नदी जल की शुद्धता और उसके उपयोग के मानक यही हैं दर्शन, स्पर्श, स्नान और पान। मैं आस्तिक हूँ। गंगा माता से मेरी प्रार्थना यह है :

‘‘तुलसी तव तीर तीर सुमिरत रघुबंस वीर।
विचरत मति देहि मोह-महिष-कालिका ।।’’

वह हमें जीवन के चारों पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्रदान करती हैं। ब़गैर किसी भेदभाव के, वह हमें भक्ति का तत्व देती हैं। लेकिन, अगर शहरों के सीवेज को यों ही नदियों में गिराया जाता रहा तो गंगा जी को जीवन का माध्यम मानने वाले मुझ-जैसे न जाने कितने श्रद्धालु मनुष्यता की एक संकटग्रस्त प्रजाति हो जाएंगे और उनकी संस्कृति का शीघ्र पटाक्षेप हो जायेगा।

पेस्टीसाइड्स और बैक्टिरियोफ़ाज वगैरह पश्चिमी पैमाने हैं। पश्चिम के जीवन में नदियों का आध्यात्मिक महत्व नहीं है। वहाँ स्वीमिंग पूल के पानी के लिए अलग, पीने के पानी के लिए अलग और समुद्र-जल के लिए अलग-अलग स़फाई के मानक हैं। नदी के लिए भी एक ढीला-ढाला सफ़ाई-पैमाना बना लिया जाता है। हमें उतना नहीं, उससे कहीं साफ़ नदी-जल चाहिए। विडंबना यह है कि फ़िलहाल हमारी नदियाँ पश्चिम के पैमानों पर भी खरी नहीं उतरतीं।

सीवेज और औद्योगिक अवशिष्ट-मिश्रित गंगाजल के प्रयोग से शहरों में कुछ गम्भीर स्वास्थ्य समस्याएँ पैदा हुई हैं। मैं ख़ुद पोलियो, टायफाइड और पीलिया का शिकार रहा हूँ; लेकिन मुझे गंगा जी से अलग नहीं किया जा सकता, जैसे मछली को जल से। यदि गंगा जी के किनारे बसे 114 शहर यों ही अपना सीवेज गंगा जी में गिराना जारी रखेंगे तो गंगा बेसिन में निवास करने वाले 40 करोड़ लोगों को ताज़ा पानी नहीं मिल पाएगा। इस प्रकार, गंगा-प्रदूषण विश्व-भर में स्वच्छ जल के प्रदूषण की एक अभूतपूर्व समस्या बन गई है।

अगर अचानक भूकंप आ जाये तो लोग कुछ न कुछ तो करेंगे! जान बचाने की कैसी भी कोशिश। वैसा ही नदियों के मामले में क्यों नहीं होता?

बंगलुरु के किनारे कोई गंगा जी नहीं बहतीं। पैसठ लाख से कम आबादी वहाँ की नहीं है। पूरे शहर के मल-मूत्र की निकासी का, उसकी रिसाइकिलिंगका एक सिस्टम बनाया गया है। तब हम अपना सीवेज क्यों नदी में गिराते हैं? मान लीजिए गंगाजी बनारस के किनारे नहीं हैं। मल-मूत्र के निस्तारण का कोई और इंतज़ाम कीजिए। बहस सिर्फ़ एक बात पर हो गंगा जी में सीवेज गिरेगा कि नहीं। सीवेज मत गिराओ, तब देखो कोई प्रदूषण नहीं है।

कोई भी काम किसी अकेले का नहीं होता। एक थे बाबू रघुनाथ सिंह बनारस के पहले सांसद। बाबू साहब कहते थे कि जिस काम को अकेले किया जा रहा हो वह बड़ा काम हो ही नहीं सकता। जिसमें बहुत से लोग न लगे हों वह काहे का काम! इस ऩजरिये से गंगा-प्रदूषण का काम अभी छोटा ही है। अपनी किताब इंटरवल ड्यूरिंग पॉलिटिक्समें राममनोहर लोहिया ने नदियों के हाल पर लिखा है। वे कहते हैं कि प्रदूषण-मुक्ति का कार्य, दरअसल, शंकराचार्यों और दूसरे धर्माचार्यों का है। लोहिया का काम भी कबीर को याद किये बग़ैर नहीं चलता

‘‘माया महा ठगिनी हम जानी।
केसव के कवला होइ बैठी, सिव के भवन भवानी।
पंडा के मूरति होइ बैठी, तीरथ हूँ मैं पानी।।’’

माया बड़ी भारी ठगिनी है। यह भगवान विष्णु के घर में लक्ष्मी, शिव के यहाँ पार्वती, पंडे के यहाँ मूर्ति और तीर्थों में पानी बनी बैठी है।

लोहिया कबीर की कविता को याद करते हुए कहना चाहते हैं कि तीर्थ तीर्थ इसलिए है कि वहाँ जल है। बिना पानी के किसी जगह का तीर्थ होना संभव नहीं। यह महज़ संयोग नहीं कि सभी तीर्थों के किनारे नदियाँ हैं। उसी पुस्तक में लोहिया ने यह भी कहा है कि नदियों की शुद्धि के लिए ग़ैरराजनीतिक आंदोलन चाहिए।

रामराज्य स्थापित करने की गाँधी जी की योजना में, श्री रामचंद्र जी की सरकार ने यह सुनिश्चित किया था :

‘‘सरिता सकल बहहिं वर बारी।
सीतल अमल स्वाद सुखकारी।।

आज भारत सरकार भी ऐसा कर सकती है। लोगों को शामिल करके, समूहपरक समाधानों के साथ लोक को आगे आने के लिए प्रेरित करके, नयी सूझ और उसे कार्यरूप में ढालने वाली इच्छाशक्तियों को प्रोत्साहित करके।

सौभाग्यवश, तर्क और विवेक में प्रशिक्षित आस्थावान लोगों के एक छोटे-से समूह ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी के साथ बनारस में गंगा जी को साफ़ करने का अभियान शुरू किया है और नदियों को स्वच्छ करने की अनोखी मिसाल पेश की है।

यह समूह ज़िद्दी और लचीला, एकसाथ है। पिछले 28 वर्षों में यह समूह बग़ैर बिजली के अवजल की सफ़ाई, गंगा जी की ओर आते उसके मैले प्रवाह को दूसरी दिशा में मोड़ देने और शैवाल और सूर्य की रौशनी के ज़रिये प्राकृतिक अभियांत्रिकी से नदी को शुद्ध करने में मुब्तिला रहा है।

समाज ने इस समाधान को स्वीकार कर लिया है और बनारस में प्राथमिकता के आधार पर लागू करने के लिए, आख़िरकार, भारत सरकार भी इस पर राज़ी हो गयी है।

[इस पोस्ट के लिए एक लंबा इंतिज़ार करना पड़ा. हमें और आप सभी को भी. यदि काशी में गंगा रोजनामचा है तो परिदृश्य में उसका प्रदूषण. वीरभद्र मिश्र से शायद ही कोई अपरिचित हो. यदि परिचय दरकार भी है तो जान लेना चाहिए कि जब नदियों के इंटरलिंकिंग की एक बेवकूफी भरी परियोजना प्रस्तावित और प्रायोजित है, ऐसे समय में गंगा को वैज्ञानिक और सांस्कृतिक, दोनों ही पैमानों से देखने का कार्य जिन दो-तीन लोगों ने किया, वीरभद्र मिश्र उनमें से एक हैं. इस लिखे को बेहद संजीदगी से समझना होगा, कोई समीकरण नहीं बनाने की कोशिश करनी होगी. इस बातचीत का एक विस्तृत अंश भी हम आगे पढ़ेंगे. इस पोस्ट के लिए बुद्धू-बक्सा व्योमेश शुक्ल का आभारी. प्रो. वीरभद्र मिश्र को हमारी श्रद्धांजलि. तस्वीर एबीसी न्यूज़ ऑस्ट्रेलिया से साभार.]

1 टिप्पणियाँ:

सज्जन धर्मेन्द्र ने कहा…

इन्हें टाइम मैगज़ीन ने ‘one of the seven heroes of the planet' कहा था। ये मेरे विभागाध्यक्ष थे और इन्होंने हमें दो सेमेस्टर तक पढ़ाया भी था। इनके घर पर कुछ बैठकों में भी मैं शामिल हुआ था। अगली पोस्ट का इंतज़ार रहेगा।