शनिवार, 19 अक्तूबर 2013

युवा कविता पर अविनाश मिश्र

(यह लेख कई कारणों से ज़रूरी है. इसकी ज़रूरत पड़ने का सबसे मासूम कारण तो यही है कि समकालीन युवा कविता पर लिखने के दिन लद गए से लगते हैं. युवा-कवियों की फ़ेहरिस्त में शामिल होने की दौड़ अभी सबसे आगे चल रही है. उग्राग्र आलोचक अविनाश ने पाँच कवियों के ज़रिये बात की है. इन पाँच में एक नाम ऐसा भी है, जिसे न रखने से लेख का कोई नुकसान न होता. वह नाम है जितेन्द्र श्रीवास्तव. इसके साथ ही पुरस्कार, कवि और कविता में पर्याप्त अंतर व्याप्त रहना भी ज़रूरी है. हिन्दी में रचनाओं पर बात करने के बाद रचनाकार से सम्बन्ध बिगड़ने के खतरे हमेशा से मौजूद रहे हैं, इन खतरों में शामिल रचनाकार सबसे पहले गिरावट का शिकार होते हैं. यह लेख पहले सदानीरा में प्रकाशित, वहीं से साभार.)

कविगण कृपया ध्यान दें... 
अविनाश मिश्र

यहां हिंदी के चार युवा कवि हैं-- गीत चतुर्वेदी, निशांत, मनोज कुमार झा और व्योमेश शुक्ल। इनके एक-एक कविता संग्रह हैं। यहां कोई ‘वह’ नहीं है, बस एक ‘मैं’ है जो इन चारों को पढ़ रहा है। यह ‘मैं’ चर्चित युवा कवि-आलोचक जितेंद्र श्रीवास्तव हैं। इस ‘मैं’ में ‘मैं’ बहुत है। इससे पहले कि हिंदी आलोचना की ‘तिवारी-त्रयी’ जितेंद्र की कविताओं को केदारनाथ अग्रवाल और नागार्जुन से जोड़ने के बाद जल्द ही आक्टिवियो पॉज या पाब्लो नेरूदा से जोड़ दे, हिंदी साहित्य संसार में एक अनौपचारिक सहमति से भरे इस सच का सार्वजानिक प्रकटीकरण बेहद जरूरी है कि जितेंद्र श्रीवास्तव तैयार कवि नहीं हैं। बेहद मामूली कविताओं और जनसंपर्क का आधार लेकर जितेंद्र ने हिंदी से उठाए जा सकने वाले सारे फायदे उठा लिए हैं। अब बस उन्हें साहित्य अकादमी सम्मान और ज्ञानपीठ पुरस्कार की प्रतीक्षा है, बाकी जो कुछ भी है वे उसे ग्रहण कर चुके हैं और जो फिर भी शेष है वे उसे एक नैरंतर्य में चुंबक की तरह आकर्षित कर रहे हैं। यहां 1984 में आई एक हिंदी फिल्म याद आ रही है-- ‘आज का एम.एल.ए. रामावतार’। फिलहाल यहां प्रस्तुत लेख में काल्पनिक ‘मैं’ के रूप में मौजूद जितेंद्र श्रीवास्तव एक आलोचक की भूमिका में भी हैं और आत्मालोचक की भी। अब बस इसमें इतना और जोड़ देना चाहिए कि इस ‘मैं’ में उस गुण का नितांत अभाव है जिसे अंग्रेजी में ‘कॉस्मिक कांशसनेस’ कहते हैं...

इतनी गर्द भर गई है दुनिया में                                                    
कि हमें खरीद लाना चाहिए एक झाड़ू                                            
आत्मा के गलियारों के लिए                                                     
और चलाना चाहिए दीर्घ एक स्वएच्छ ता अभियान                                             
अपने सामने की नाली से उत्तएरी ध्रुवांत तक...

(केदारनाथ सिंह)  


हर आलाप में गिरह पड़ी है


...हालांकि यहां यह एक अलग बहस का विषय हो सकता है कि अब कितने लोग विष्णु खरे के लिखे को गंभीरता से ले रहे हैं, लेकिन यदि किसी कविता संग्रह की कविताओं के साथ 16 पृष्ठों का एक प्रशस्ति पत्र नत्थी हो, और वह भी विष्णु खरे का लिखा हुआ, तो उस कविता संग्रह की कविताओं पर एक आलोचनात्मक प्रयास के अंतर्गत बहुत कुछ कहने-करने को रह नहीं जाता।

दो सुपरिचित युवा रचनाकारों गीत चतुर्वेदी और व्योमेश शुक्ल के कविता संग्रहों क्रमशः ‘आलाप में गिरह’ और ‘फिर भी कुछ लोग’ में कई समानताएं हैं। जैसे दोनों ही कवियों के ये पहले कविता संग्रह हैं, दोनों ही कविता संग्रह ‘राजकमल प्रकाशन’ से प्रकाशित हैं, दोनों ही कविता संग्रहों के कवि ‘भारत भूषण अग्रवाल स्मृति युवा कविता पुरस्कार’ हासिल कर चुके हैं, दोनों ही कविता संग्रहों के अंत में विष्णु खरे रचित प्रशस्ति पत्र है और दोनों ही कविता संग्रहों के कवि अपने आस्वादक को यदि वह कहीं है तो अविश्वसनीय समझते हैं।

इन समानताओं को विष्णु खरे की कविता और गद्य के व्यवहार का अनुकरण करने वाली उस युवा पीढ़ी के संदर्भ में समझा जाना चाहिए जिसका उदय ‘बाबरी मस्जिद विध्वंस’ के आगे-पीछे के वर्षों में हुआ। इस कविता ने बहुत देर तक प्रभावित किया, लेकिन इस प्रभाव से आगे जाने की असल जद्दोजहद कई कवियों के लिए कविता में उनके इंतकाल का सबब बनी। इस दौर में कई कवि तारे की तरह टूटते हुए दिखाई दिए, लेकिन इस टूटन के बावजूद विष्णु खरे की कविता और गद्य के व्यवहार को फॉलो करने वाली युवा पीढ़ी हिंदी में लगातार विस्तृत होती रही, इस तथ्य के समानांतर कि विष्णु खरे के भाषिक व्यवहार के तेवर और उसकी काव्यात्मकता को बरतने की सलाहियत खुद विष्णु खरे में ही दिन-ब-दिन क्षीण होती गई। हालिया दौर में तो यह भाषा पूरी तरह से अपनी मारकता खोकर अविश्वसनीय और हास्यास्पद हो गई है। यहां यह भी गौरतलब है कि एक वक्त यही मारकता इस भाषा की अस्मिता थी।

विष्णु खरे के काव्य व्यवहार का अनुकरण करने वाली इस कथित युवा पीढ़ी के ही एक सदस्य हैं-- गीत चतुर्वेदी। इनके पहले कविता संग्रह ‘आलाप में गिरह’ की कई कविताएं बेहतरीन होने के बावस्फ इस दिक्कत से मुंसलिक हैं कि वे विष्णु खरे की कविताओं से आगे का फॉर्म नहीं खोज पा रही हैं। इस वजह इनमें व्याप्त सामयिक सरोकार और समस्याएं भी बेअसर हैं। यहां कोई नवाविष्कृत चमक नहीं है। कोई नया काव्य विवेक, नया काव्य विमर्श नहीं है। मैं हिंदी कविता के हित में ये जायज मांगें गीत के कवि से इसलिए कर रहा हूं क्योंकि गीत में इन्हें संभव कर सकने की सामर्थ्य है।

गीत के ही हर्फों में कहें तो कह सकते हैं कि बहुत ज्यादा खरा बोलना बहुत ज्यादा आपदाएं बुलाना है, लेकिन यह कहे बगैर रहा नहीं जाता कि कविता लिखते-लिखते लंबी कहानियों की ओर शिफ्ट हुए रचनाकारों ने हिंदी कविता को बहुत खराब किया है। कविताएं अंततः लय में लीन होना चाहती हैं, लेकिन उन्होंने इसकी लय, इसकी उदात्तता, इसके सौंदर्य और प्रभाव को सीमित या कहें समाप्त किया है।

यहां ऐसा इसलिए कहना पड़ रहा है क्योंकि इस कविता संग्रह में कई कविताएं ऐसी हैं कि इनकी पंक्तियों को कहीं से भी तोड़िए या जोड़िए, वे कविताएं नहीं हैं, लघुकथाएं हैं। और इस कदर होने पर इन्हें इस कविता संग्रह में नहीं होना चाहिए। इसके उदाहरण के लिए देखें: ‘पिथौरागढ़-दिल्ली डाइरेक्ट बस’, ‘अरब सागर’, ‘पांच रुपए का नोट’, ‘सिंधु लाइब्रेरी’, ‘साइकिल के डंडे पर बैठी लड़की’, ‘लुक्खे’, ‘मालिक को खुश करने के लिए किसी भी सीमा तक जाने वाला मानवीय दिमाग और अपनी नस्ल का शुरुआती जूता’।

शब्दों के क्रम को महज पलट देने भर से लघुकथाएं कविताएं नहीं बन जातीं। बतौर एक रचनाकार आपकी काव्य समझ लंबी कहानियां रचने में आपकी मददगार हो सकती है, लेकिन आपके कहानीकार होने का कोई फायदा आपकी उन रचनाओं को कभी भी नहीं मिलता है, जिन्हें आप कविताएं कहकर अपने आस्वादक को सौंपते हैं।

इसके बावजूद गीत के इस काव्य संग्रह को हम ‘सेब का लोहा’, ‘पोस्टमैन’, ‘मदर इंडिया’, ‘कागज’, ‘आलू खाने वाले’, ‘खुद-ब-खुद खत्म’, ‘ठगी’, ‘माउथ आर्गन’, ‘अनलिखी कविताओं में’, ‘अलोना’, ‘फीलगुड’ जैसी कविताओं के लिए याद रखेंगे। गीत की ही एक कविता में आए हर्फों के सहारे कहें तो कह सकते हैं कि इन कविताओं में वह कड़वाहट है जो जुबान को मीठे का महत्व समझाती है, एकदम नीम की हरी पत्तियों की मानिंद...।

यहां प्रेम पर, लड़कियों पर, अपरिचितों पर, हिंसा-प्रतिहिंसा पर और रोज प्रकट हो रहीं नई-नई लड़ाइयों पर जो कविताएं हैं, वे आज की युवा हिंदी कविता के मध्य अपने अलग और अनूठे स्वर के कारण बेहद मुतासिर करती हैं और साथ ही अपने पढ़ने वाले को भीतर तक भरती भी हैं।

इसके अतिरिक्त गालिब, व्हिटमैन, शिम्बोर्स्का, नेरूदा की याद में ले जाने वालीं और संगीत और संगीतकारों से संबंधित/समर्पित कविताएं भी उल्लेखनीय हैं।

हालांकि इस संग्रह से इतर इधर पत्र-पत्रिकाओं और ब्लॉग्स में प्रकाशित गीत की कविताएं उनके काव्यात्मक विकास के प्रति बहुत आश्वस्त करने वाली नहीं हैं, लेकिन यह बेहद खुशी की बात है कि उनके द्वारा किए जा रहे अनुवाद और उनका गद्य हिंदी को सतत सृमद्ध कर रहा है।
  
‘मैं आंखों पर विश्वास नहीं करता/आंखें सिर्फ फिल्म देखती हैं...’ और ‘ये दोस्ती बड़ी महंगी चीज है...’ और ‘खुद आग में ही होता है बुझ जाने का हुनर...’ और 'जिसके पीछे पड़ते हैं कुत्ते वह उसी लायक होता है...' जैसी और भी कई काव्य पंक्तियां हैं ‘आलाप में गिरह’ में जो स्मृति में स्थाई हो जाती हैं, लेकिन वे एक समग्र कविता में ‘पैच वर्क’ सरीखी जान पड़ती हैं। वे स्वयं में ही पर्याप्त दृश्य होती हैं, ऊपर-नीचे बुन दी गई समग्रता को निर्जीव और गैरजरूरी करती हुईं। यहां भी गीत के ही हर्फ लेकर कहें तो कह सकते हैं कि ये काव्य पंक्तियां उस गजल की शे’र हैं, जिसका काफिया टूटकर कहीं छूट गया है। और यहां अब अंत में यह भी जोड़ना चाहिए कि--

तीन शब्द में होना था काम 
तीन लाख शब्द जाया हो गए 
क्या मुझे जोर से चिल्लाना चाहिए ?


यह कवि क्यों लिख रहा है 


निशांत एक ऐसे कवि हैं जिन्हें कविताएं परेशान नहीं करती हैं। दो किताबों और लगभग इतने ही पुरस्कारों वाले इस कवि के काव्य-लोक में दस बेहतर कविताएं तक नहीं हैं। जो कुछ एक ठीक-ठाक कविताएं निशांत ने रचीं और जिनके आधार पर वे पुरस्कृत-चर्चित-प्रकाशित हुए, वे अब तक उनकी चौंध में हैं।

वे एक ऐसे व्यक्ति हैं जिसे लगातार यह महसूस हो रहा है कि वह कवि है। और संयोग से समग्र कविता न भी सही एकाध बेहतर काव्य पंक्तियां अब भी उससे गाहे-ब-गाहे संभव हो जाती हैं। लेकिन इन काव्य पंक्तियों का जो हासिल है वह बराबर उसके कवि को खारिज या कहें खत्म कर रहा है। वह कवि है महज यह सोचकर वह कविताओं पर कविताएं लिखता जाता है, लेकिन संभवत: वह इन्हें लिखकर इन पर लौटता नहीं है।

यहां यह इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि 'जवान होते हुए लड़के का कबूलनामा' में मौजूद खामियां कवि के दूसरे काव्य संग्रह में भी बरकरार हैं। इस कवि के अब तक शाया समग्र काव्य से वाकिफ होने के बाद, इसके दूसरे संग्रह का शीर्षक 'जी हां लिख रहा हूं' पढ़कर कोई भी पूछ सकता है कि भाई आप अब तक क्यों लिख रहे हैं?

निशांत जैसे तमाम युवा कवियों के यहां 'काव्यात्मक रियाज' जैसे कोई चीज नहीं है, बस है तो केवल एक गैरजिम्मेदार किस्म की जल्दबाजी। सब कवियों की रचना-प्रक्रियाएं अलग-अलग होती हैं... इस तथ्य में भले ही संशय की कोई गुंजाइश हो, लेकिन यह सामयिक तथ्य एकदम तर्कातीत है कि आज हिंदी के कई युवा कवि 'काव्यरचनाप्रक्रियावंचित' कवि हैं।

यदि आपके जीवनानुभवों से हम कुछ ग्रहण नहीं कर पाते, तो इन्हें काव्य रूप में अभिव्यक्त करने का अर्थ समझ से परे है। तब तो और भी जब ये संदेहास्पद जीवनानुभव अकविता के दौर और उसके बाद उभरे समस्त समर्थ हिंदी कवियों की याद दिलाते हों, साथ ही बारहा यह शक भी होता हो कि क्या वाकई ये कविताएं 2012 में आए एक काव्य संग्रह में संग्रहित हैं।

यह सचमुच दुर्भाग्यपूर्ण है कि ये कविताएं समय की बर्बादी हैं। निशांत जैसे कवियों को यह भी समझना चाहिए कि कविता में 'मैं' अब इतनी लंबी यात्रा कर चुका है कि थक कर बिलकुल चूर है। यहां यह भी गौरतलब है कि इस थकान में वह हिंदी के साठ पार आलोचकों की मानिंद ही गैरजरूरी हो गया है। 

मैं समझाने की लाख कोशिश करता हूं अपने आपको
और हर बार कुछ न कुछ छूट जाता है मेरे हाथ से... 
 ...

मैं मार्क्सवादी हूं
और मैंने पहली बार जाना है
कि पेट से बड़ा तो मार्क्स भी नहीं है
लेकिन क्या करूं थक गया हूं और समझ गया हूं
कि कुछ शब्दों के भरोसे नहीं काटी जा सकती जिंदगी...

'जी हां लिख रहा हूं' से ये ली गईं और ऊपर दी गईं काव्य पंक्तियां ऐसी हैं कि इन्हें उद्धृत करने के लिए इन्हें सुधारना पड़ता है। वहीं- 'एक 'किताब' लिखने से बेहतर है/एक 'लंबी कविता' लिखी जाए/और 'मर' जाया जाए...' जैसी पंक्तियां भी हैं जिनमें आगे कवि कहता है कि उसकी जिंदगी महज तीन शब्दों 'किताब', 'कविता' और 'मरना' से ही चल रही है। यहां अनुभव से ऊपर किताब, विचार से ऊपर कविता और जीवन से ऊपर मृत्यु को आंका गया है। ऐसी काव्य दृष्टि हिंदी के एक युवा कवि के जीवन व काव्यबोध को हास्यास्पद बनाने के लिए पर्याप्त है, इसके बावजूद भी कि 'कबूलनामा' शीर्षक इसी तवील कविता में कवि- 'मोटी-मोटी किताबों को पढ़ने से बेहतर है/पढ़ी जाए जिंदगी की मुकम्मल किताब/और इसके लिए लौटना पड़ेगा/सबसे पहले अपने 'मैं' के पास...' जैसी लाइनें भी ले चुका होता है। इस कबूलनामे का कमबख्त 'मैं' पांच लंबी कविताओं से 'रचे' गए इस दीवाने के दीवान में बेहद लंबा होकर अपने पढ़ने वाले को बेहद ऊबाता है। 
'मैं में हम-हम में मैं' कहने के बावस्फ निशांत के ही हर्फों में कहें तो कह सकते हैं कि इस कवि के पास सिर्फ 'मैं', सिर्फ 'मैं' है।

'नागार्जुन' को समर्पित कविता 'फिलहाल सांप कविता' सामयिक हिंदी कविता समय का अपठनीय रिपोतार्ज है... 'बहुत गर्मी पड़ रही है/जंगल में आग लग गई है/यहां कमरे में कविता मर गई है...' टाइप। इसमें रिपोतार्ज के साथ-साथ गौर से नहीं भी देखने पर पत्र, डायरी, संस्मरण और रेखाचित्र भी नजर आ सकते हैं, लेकिन कविता नहीं। 'दुनिया के सारे कवियों का भविष्य गद्य लेखकों के पास सुरक्षित है...' जैसी 'लाइन' भी इसी कविता में है।

‘कैनवास पर कविता' मशहूर चित्रकारों की पेंटिंग्स देखकर उपजे प्रभावों की कविता सीरीज है। वैसे अगर इस सीरीज की एक-दो कविताओं को त्याग दें, तो इस सीरीज की बाकी कविताओं का चित्रकला या चित्रकारों से कोई खास लेना-देना नहीं है, ये शीर्षक बदलने पर अलग-अलग छोटी कविताएं भी हो सकती थीं, लेकिन तब शायद कवि अमित कल्ला और कुमार अनुपम जैसे कवियों को चित्रकार न बता पाता और यह भी कि वह चित्रकला से ज्यादा चित्रकारों में गहन दिलचस्पी रखता है।

लंबी कविताओं के संग्रह के रूप में प्रचारित इस काव्य संग्रह के भीतर कई खराब लघुकथाएं हैं। वस्तुओं, मित्रताओं, संबंधों, नगरों और प्रेम को लेकर बुनी गई कविताओं में निशांत के कवि की समझ बेहद नाराज करती है।

कवि के पहले कविता संग्रह में मौजूद मध्यवर्गीय अनुभव, नगरबोध, प्रेम, संबंध, लड़कपन, बेरोजगारी से बुना हुआ काव्य संसार कुछ खामियों के बावस्फ अपने सादेपन में भी बेहद प्रभावी है, लेकिन दूसरे संग्रह में यह सादगी एक किस्म की चालाकी में बदल गई है। दूसरे संग्रह के बाद प्रकाशित हुईं निशांत की कविताएं भी बेहद सामान्य प्रभाव वाली हैं, हालांकि अपने काव्य विकास के प्रति छटपटाहट वहां देखी जा सकती है, लेकिन आस्वादक के लिए आश्वस्ति वहां नहीं है। 


हर कविता की तरह हर कविता से अलग 

जैसे सबकी तरह की मेरी नींद सबसे अलग
सबकी तरह का मेरा जागना सबसे अलग
रोज की तरह रहना यहीं पर 
हर रोज की तरह हर रोज से अलग
पर एक कांप अलग होने से जीने का मन नहीं भरता
कोई अंधड़ आए सारे पीले पत्ते झर जाएं पेड़ दिखे अवाक् करता अलग
मनुष्य होने का कुछ तो सुख मिले बसा रहूं मकई के दाने सा भुट्टे में
और खपड़ी में पड़ूं तो फूटूं पुराने दाग लिए मगर बिलकुल अलग

(मनोज कुमार झा के कविता संग्रह ‘तथापि जीवन’ की एक कविता ‘नया’) 


स्वरों को यात्राएं करने के लिए हवाओं की जरूरत होती है। इस तरह ही कुछ ऐसे काव्य स्वर भी होते हैं जिन्हें समझने के लिए भारमुक्त होने की जरूरत होती है। इस यात्रा में अगर ऐसा न किया जाए तब यात्रा का मूल आस्वाद खो जाता है। मनोज कुमार झा की कविताएं आस्वाद के इसी धरातल की कविताएं हैं। ये सामान्य में अलग से सामान्य हैं और असाधारण में अलग से असाधारण। इस तरह ये हर कविता की तरह और हर कविता से अलग हैं। यहां नयापन सायास नहीं है, यह युवा कवि व्योमेश शुक्ल के नएपन की तरह बहुत अध्यवसाय और श्रम से अर्जित किया हुआ भी नहीं लगता है। यह नयापन गहरी दृष्टि और जीवनानुभव से उत्पन्न हुआ है और कवि के काव्य लोक में अनायास विन्यस्त हो गया है। बहुत दार्शनिक या वैचारिक ढंग के साथ बहुत भाषा या बहुत कम भाषा लेकर, इन कविताओं पर समालोचनानुमा कुछ करने में इनकी मूल संवेदना और सौंदर्य की प्रखरता और सत्य के आगे समालोचकीय कर्म के अपाठ्य होकर नष्ट हो जाने का संकट है। ये खुद कहती हैं--

इस तरह न खोलें हमारा अर्थ 
कि जैसे मौसम खोलता है बिवाई 
जिद है तो खोलें ऐसे
कि जैसे भोर खोलता है कंवल की पंखुड़ियां


इन्हें पढ़ते हुए इन पर कुछ नोट्स जरूर लिए जा सकते हैं, लेकिन वे कतई काम नहीं आएंगे जब इन पर समालोचना कर्म में संलग्न होने की नौबत आएगी। ऐसा इसलिए है क्योंकि इन पर लिए गए नोट्स ही इनकी वास्तविक समीक्षा होंगे। ये नोट्स आस्वाद के जिस तात्कालिक प्रभाव में उत्पन्न होंगे, वह प्रभाव देने वाली कविताएं इधर की हिंदी कविता में दुर्लभ नजर आएंगी। इस काव्य-लोक में कुछ इस प्रकार की उदात्तता है कि वह कविता में रहने के लिए ज्यादा, उस पर कुछ कहने के लिए कम बाध्य करती है। इसलिए इन पर लिए गए नोट्स के बाहर के समग्र वाक्य कविता के अर्थ को खोलने के लिए नहीं हैं, वे इन नोट्स के जरिए इस काव्य स्वर को समझने की यात्रा में हवा की तरह हैं। इस अर्थ में ये वाक्य अनुपस्थित समझे जाएं और नोट्स उपयोगी। 

आंखें खुलती जाती हैं उस दुनिया की तरफ
जहां सर्वाधिक स्थान छेक रखा है 
जीवन को अगली सांस तक 
पार लगा पाने की इच्छाओं ने 

ये कविताएं सुंदर हैं, क्योंकि ये उन मूल उद्गमों से आई हैं जहां सारी स्थानीयताएं एक सार्वभौमिकता में स्वयं को व्यक्त करती हैं। ये आदर्श भी हो सकती हैं और जीवन भी। ये अपने आस्वादक के तलवों से झुरझुरी के रूप में उठती हैं और उसकी बेचैन आत्मा का एक अंश उसकी आंखों की कोरों से बह उठता है। कविता के अंतिम अक्षर से गुजर चुकने के बाद आस्वादक इधर-उधर देखता है और कुछ क्षण ठहरकर पुन: कविता पर वापस लौट आता है। वह ऐसी ही कविताएं कब से खोज रहा था, लेकिन इनकी दुर्लभता बढ़ती ही जा रही थी। 

मैं अपनी सांस किसी सुदेश को झुकाना चाहता था 
नहीं कि कहीं पारस है जहां मैं होता सोना 
बस, मैं अपना लोहा महसूस करना चाहता था        

निकृष्ट कविताएं संग्रहों में छूट जाती हैं, वे अपने आस्वादक के अंतर में प्रवेश नहीं करतीं, वे आस्वादक के साथ बाहर नहीं आतीं।

पृथ्वी घर है तो और क्या चाहिए किसी को एक घर से                                                       
मगर एक हाथ बढ़ाने में भी लगता है जोर कितना
  
‘तथापि जीवन’ की यात्रा में मनोज कुमार झा की कविताएं अपने आस्वादक के अंतर में प्रवेश पाती हैं, उसके साथ बाहर भी आती हैं। ये संग्रह में ही छूट जाने वाली कविताएं नहीं हैं। प्रस्तुत संग्रह के बाद प्रकाशित हुई कविताएं भी कवि के काव्य विकास के प्रति बेहद आश्वस्त करती हैं, जहां कवि कह रहा है- 

लुप्त होना दृश्य से घर ने सिखाया मुझको 

और यह भी- 

कभी आना इस पार                                                                   
जब कोई राह फूटे                                                                  
देखना तब इन शब्दों की नाभि में कितनी सुगंध है...
 

बिलकुल बदल गया है बिलकुल बदलना 


इस पंक्ति को यदि अतिशयोक्ति न समझा जाए तब यह कहने में कोई उज्र नहीं है कि व्योमेश शुक्ल के पहले कविता संग्रह ‘फिर भी कुछ लोग’ की सारी कविताएं यादगार हैं। इनसे गुजरना एक बेहतर सफर की स्मृति है। ये कविताएं घोषित प्रगतिशीलों और घोषित कलावादियों के बीच से राह बनाती हुई कविताएं हैं। ये अपने कला और वस्तुपक्ष दोनों के प्रति सजग हैं। इस तरह ये एक पैमाना बनती हैं आगामी हिंदी कविता के लिए जिसमें खुद इनके कवि की भी अगली कविताएं शरीक होंगी। इस अर्थ में इन्हें पढ़ना आधुनिक हिंदी कविता के विकास व विस्तार को पढ़ना है। 

स्मृति रशेज की तरह बची रहती है 
विस्मरण उसे एडिट कर डालता है 
फिर असंबद्ध तर्कातीत फ्रेम बचे रहते हैं 
जिनमें कल्पना की मदद से
और स्मृति पर जोर डालने से हम कुछ जोड़ते हैं  


स्मृति इन कविताओं में एक अनिवार्य तत्व है, इतना अनिवार्य की कवि की काव्य पंक्तियों से कवि की स्मृतियों को अलग नहीं किया जा सकता। ऐसा करने पर उनका संप्रेषण समाप्त होगा और वहां जो शेष बचेगा वह केवल कला होगी, वहां जीवन नहीं होगा। यहां अगर रघुवीर सहाय अपनी बहुउद्धृत काव्य पंक्तियों के साथ याद आते हैं, तो यह कोई संयोग नहीं है, बल्कि उद्देश्य है। भाषा का वैभव कैसे स्मृतियों को एक विन्यास में सृजित करता है और कैसे इस विन्यास में सार्वभौमिकता प्रवेश पाती है और कैसे यह सार्वभौमिकता राजनैतिक चेतना संपन्नता के साथ मानवीयता के पक्ष में संवेदित व प्रतिबद्ध होती है, इस प्रक्रिया को समझने के लिए इन कविताओं को पढ़ा जाना चाहिए।


ये कविताएं इस अर्थ में भी प्रभावी है कि इनमें बहुत सारी कला और भाषा के बावस्फ समयहीनता नहीं समय है।

बाएं से चलने के नियम से ऊबे हुए लोग दाहिने चलने की मुक्ति चाहते हैं बाएं से काफी शिकायत है सबको इस पुराने नियम से होकर वहां नहीं पहुंचा जा सकता जहां पहुंचना अब जरूरी है 


यहां कला बहुत क्यों है इसे इस सरलीकरण से समझा जा सकता है कि व्योमेश की कविता मुक्तिबोध, शमशेर, रघुवीर सहाय के प्रभाव से कुछ बाहर निकलने की कोशिश में कलावादियों के असर में आ जाती है। वह इस असर से कुछ बच सके इसके लिए विष्णु खरे, विनोद कुमार शुक्ल, मंगलेश डबराल और देवी प्रसाद मिश्र के सामीप्य से भी बहुत कुछ ग्रहण करती है, लेकिन अंतत: वह कलावादियों के तेवरों के भी नजदीक है। ऐसे में इन कविताओं के आस्वादक को कभी-कभी ऐसा भी लग सकता है कि कवि दो कठिन पाटों के बीच पिस रहा है। यह त्रासदी कवि ने खुद क्रिएट नहीं की है। यह कृत्रिम कवियों की देन है। छद्म वैचारिक-विमर्शों के बीच सर्वथा परंपरावंचित और भाषा व शिल्पमुक्त काव्य व्यवहारों से उत्पन्न होकर लगातार सार्वजनिक होती कविता का प्रतिपक्ष रचना भी कवि-कर्म का अनुषंग है।  व्योमेश बेहद सलीके से यह प्रतिपक्ष संभव करने की कोशिश करते हैं। वे इस मायने में उस परंपरा के कवि है जिसके कवि अपने बारे में कोई राय बनाने की छूट नहीं देते। लेकिन व्योमेश के पहले कविता संग्रह के बाद प्रकाशित हुई कविताओं और उसके बाद आए एक काव्यांतराल में लोग उनके बारे में राय बनाने लगे हैं। 

यदि स्मृति के रशेज से फिल्म बनानी है तो नैरंतर्य लाने के लिए 
कल्पना का इस्तेमाल करना होगा नहीं तो
ऊटपटांग दृश्यों का कोलाज बन जाएगा 
जिसे खुद के अलावा कोई समझ नहीं पाएगा 
यह फिल्म बहुत अमूर्त हो जाएगी 
क्योंकि इसके मूर्त दृश्यों का तात्पर्य नहीं होगा 
या उतना ही मूर्त होगी जितना ऊटपटांग में ऊंट        


ऊपर दी गई काव्य पंक्तियों में जहां-जहां ‘फिल्म’ है यदि वहां-वहां ‘कविता’ रखें और फिर इन पंक्तियों को व्योमेश की संग्रह पश्चात प्रकाशित कविताओं के संदर्भ में पढ़ें, तब व्योमेश के बारे में इन दिनों बन रही राय के मंतव्य स्पष्ट होते हैं। व्योमेश की इधर की कविताओं में आए ‘ऊटपटांग’ में कल्पना का हाथ कितना बड़ा है, इस पर फौरी तौर पर कुछ भी नहीं कहा जा सकता। इसके लिए खुद व्योमेश को एक कल्पनातीत और लंबा अनुच्छेद रचना होगा।

और अंत में ‘मैं’

कल हमारे बच्चे हमसे हमारी कविताओं का अर्थ पूछेंगे                                   
(संजय चतुर्वेदी एक कविता में) 


मैं तार्किकता के आगे नतमस्तक हूं। मैं बहसों में हार जाता हूं। मैं शर्त लगाता हूं और शर्तिया हार जाता हूं। मैं वहीँ बेहतर महसूस करता हूं जहां हार-जीत की कोई गुंजाइश नहीं। यहां इम्बर्तो इको की वह बहुउद्धृत पंक्ति याद आती है कि पराजित नायक अच्छे विचारक हुआ करते हैं। लेकिन मैं विचारक नहीं हूं, मैं तो नायक भी नहीं हूं। व्यंग्यकार शरद जोशी के शब्दों में कहूं तो मैं बगैर कविता के कवि हूं।  इस तरह मैं ‘रचना’ के मूल आस्वाद को पाता हूं। मैं रचना पढ़कर रचना नहीं बन जाता, क्योंकि मैं जानता हूं कि तार्किकता कभी रचना में लीन नहीं हो सकती। ये मेरी ही पंक्तियां हैं--

चुप रहो, बस चुप रहो                                                             
यह रात की धुन है इसे यूं ही बजने दो                                                    
आहिस्ता चलो इस बेला में                                                            
समय को मौन का उपहार दो                                                               
छू सको तो छुओ उसे त्वचा की तरह                                                     
पर चुप रहो                                                                    
तुम्हारी इस चुप्पी में                                                               
दूसरे के अस्तित्व का सम्मान है   


मैं आज का कवि हूं, कल नहीं रहूंगा। मैं उस युवा पीढ़ी का प्रतिनिधि हूं जो कविता में कुछ अचीव करने के लिए कविता नहीं लिखती है, कविता से कुछ अचीव करने के लिए कविता लिखती है। मैं सबसे तुच्छतम अर्थों में खुद के लिए और पुरस्कारों के लिए लिखता हूं। मैं कवि हूं और कविता में गद्य रच रहा हूं। मैं नहीं जानता काव्य पंक्तियों को कहां ब्रेक किया जाए, कहां कॉमा, कहां तीन डॉट्स और कहां पूर्ण विराम देना है... मैं नहीं जानता। कहां कविता को खत्म कर देना चाहिए और कहां से वह शुरू हो तो कुछ बेहतर बनेगी इस संसार में इस संसार के लिए इस संसार की तरह... मैं नहीं जानता। प्रेम कविताएं, पक्षधर कविताएं, वैचारिक-विमर्श वाली कविताएं, आंचलिक शब्दों का आश्रय लेकर अपने स्थानीय परिवेश का छद्म रचने वाली कविताएं, घर-नदी-चिड़िया-बच्चों-सड़कों वाली कविताएं सबकी कलई खुल गई... नई सदी में मैं क्या रचूं मैं नहीं जानता।

मैं जानता हूं मैं जो कविता रच रहा हूं, मेरे सिवाए कोई अन्य उससे हार्दिक तादात्म्य स्थापित नहीं कर पाता। अगर कोई कविता पढ़ना जानता है तो वह यह भी जानता होगा कि एक बेहतर कविता लिखे से ज्यादा अनलिखे में वास करती है। फिर ये प्रवचनात्मकता क्यों है मेरे पड़ोस में और मुझमें भी क्यों है इतना अनलिखा कि जो है लिखा वह भी पढ़े जाने के काबिल नहीं...। यह जानने मैं ‘जरूर जाऊंगा कलकत्ता’ और लौटूंगा नहीं दिल्ली...।

7 टिप्पणियाँ:

nikhil anand Giri ने कहा…

अगर इस लेख को लेखक की उम्र मुझे मालूम नहीं होती तो मैं इसे एक अनावश्यक-सा प्रवचन समझ बैठता मगर..

सुधा अरोड़ा ने कहा…

बेहतरीन और बेबाक विवेचन !

DrKavita Vachaknavee ने कहा…

कविताओं पर अविनाश को यों लिखते देखकर और अन्य स्थलों पर भी इसकी कलम को देखने-पढ़ने के बाद हिन्दी साहित्य के भविष्य में एक प्रखर निष्पक्ष आलोचक की उपस्थिति का भरोसा होता है, जो इतना सुखद है कि मैं स्वयं ही उसकी सीमा आँक नहीं पाती। घर परिवार में अपने बच्चों के आचरण से जैसी आश्वस्ति माता-पिता को होती होगी कुछ-कुछ वैसा भाव हर बार मन में जगता है। इतनी अल्पायु में अविनाश रचना के विखण्डन की जो दृष्टि रखता है वह दृष्टि ही यह आश्वस्ति देती है। सच कहूँ तो बहुधा इस बच्चे पर गर्व होता है।

नीलिमा शर्मा ने कहा…

सुधार की गुंजाईश भी वही होती हैं जहाँ गलतिया होती हैं और अगर उन्हें सकारात्मकता के साथ इगित किया जाए तो एक प्रेरणा मिलती हैं

उम्दा आलोचनात्मक लेख

GGShaikh ने कहा…

Gyasu Shaikh:

नई कविता पर विवेचना - अविनाश मिश्र …!
'सदानीरा' वाला लेख…

कम-अज़-कम हम यहां अविनाश जी को बेदखल या नज़रअंदाज़ तो नहीं कर सकते। उनकी काव्य अपेक्षाएँ विशोधित है। उनके सूचन तथ्यात्मक मित्रतापूर्ण व संभावनापूर्ण है। कविता को
पढ़कर सभी को कविता के पक्ष-विपक्ष में जो विडम्बनाएं फील होती है उन्हीं विडंबनाओं को अविनाश जी यहां शब्द दे रहे हैं, अपनी इस
विवेचना में। जहां लोग कविता के मुताल्लिक 'वाह-वाह' करने लगते हैं या फिर चुप हो जाते हैं उससे आगे की बात अविनाश जी यहां करते हैं। यह विवेचना एक तरह की गलत मुग्धता को या
कांय-कांय को तोड़ती है।यहां'काव्यरचनाप्रक्रियावंचित' कुछ कवियों
पर उनकी टोकाटाकी ठीक ही है, जहां सतहीपन है नई कविताओं में। तब कोई अपनी इन कविताओं के ज़रिए अपनी ग़लतबयानी भी थोपने
लगे । कितनी ही कविताओं में व्यक्त उनकी ऊब यहाँ महसूस हुई है।

अविनाश जी की यह विवेचना हमारी काव्य सोच को पुख्ता करे । यहाँ कुछ निर्ममता है तो उदारमनस्क दिलसोज़ी भी है। स्थानीयता और सार्वभौमिकता में ही कवि और कविता के आविर्भाव की बात में समग्रता भी खूब है…

साहित्य की काव्य विधा के संदर्भ में यहां कुछ तो है ही फिर भले ही अपर्याप्त सा हो। अविनाश जी ने कविताओं की विभावनाओं के तहत इन पंक्तियों में कहा है, 'बेहतर कविता लिखे से ज्यादा अनलिखे में वास करती है…!'

काव्य विधा को समझाते मंतव्य अपूरक से रहते आए हैं, पर अविनाश जी ने यहाँ धुंध को छांटने की एक अच्छी और भरसक कोशिश ज़रूर की है।

रविन्द्र आरोही ने कहा…

सुंदर

शायक आलोक ने कहा…

सुरसुरी प्रकरण में अविनाश के माफीनामे के साथ यह तो प्रकट हो गया था कि तेजवीर बालक है यह .. किन्तु युवा कवियों के प्रति उसके पूर्वाग्रहों को अगर मगर के साथ स्वीकृत रखा था मैंने .. ये उल जुलूल लेख पढ़कर हालांकि अब वह स्वीकृति भी गई भले वह इसकी परवाह न करे .. और प्लीज़ कोई मित्र कविता आंटी को गूगल का वह लिंक फॉरवर्ड करे जिसे पढ़कर आलोचना विधा का कम से कम बुनियादी पाठ उन्हें मिल जाय .. कुछ भी बोलती हैं ..